वैलेंटाइन डे – एगो नवका तेवहार

एगो नावा टटका पढल लिखल एडभांस युवा होखत समाज में छुवा छूत के बीमारी नीयन फइलत सात दिन से चले वाला प्रेम के समर्पित तेवहार के 14 फरवरी के दिन “वेलेंटाइन डे” के रूप में मनावे के परिपाटी जोर पकड़ रहल बा अपना देश मे। प्यार के समर्पित ई जश्न के ई स्पेशल ऑकेजन अब सप्ताह भर के उत्सव बन गइल बा जेकरा के वेलेंटाइन वीक के नाँव दिहल गईल बा। वेलेंटाइन डे के केहुके प्रति भी अपना प्रीत के दरसावे के परम्परा रहे यूरोपीय देश मे। जरूरी ना रहे उ प्रेमी प्रेमिका ही होखस, रिश्ता कवनो हो सकत बा। लेकिन भारत मे ई प्रेमी प्रेमिका के प्रेम के इजहार करेके दिन के रूप में ही मनावल जाता ,एक दूसरा के प्रति आपन प्रेम के इजहार  वैलेंटाइन  कार्ड भेजके, फूल देके, उपहार देके करेलन प्रेमी लोग।

हर साल 7 फरवरी से एकर शुरुआत होला चुकी ई अंग्रेजी बोले वालन के तेव्हार ह त नामो अंग्रेजीये में लिहल ठीक रही 7 फरवरी के Rose Day, 8 फरवरी के Propose Day, 9 फरवरी के Chocolate Day, 10 फरवरी के Teddy day, 11 फरवरी के Promise Day, 12 फरवरी के Hug Day, 13 फरवरी के Kiss Day, 14 फरवरी महापर्व Valentine Day पड़ेला। अलगा अलगा दिन अलग अलग ढंग से प्रेम के प्रदर्शित कइल जाला प्रेमी प्रेमिका द्वारा।

कुछ साल पहिले तक वेलेंटाइन डे सेलिब्रेशन के भारत में कवनो नाम निशान ना रहे। क्रय शक्ति में बढ़न्ती संचार के बढ़त प्रभाव अउरी यातायात के उन्नत साधन तक आसान चहुँप के चलते पूरा विश्व ग्लोबल गाँव के रूप अख्तियार क लेले बा। एह आर्थिक उदारीकरण के युग मे बिज्ञापन के बहुते प्रभाव बा समाज पर। सोशल मीडिया, टीवी विज्ञापन, अउरी रेडियो कार्यक्रम के जरिए एकर फैलाव शहर में भइल अब संचार के साधन के पहुंच गाँव तक बा त अब गाँव भी धीरे धीरे लपेटे में आ रहल बा। बजार त ओहिके बढ़ावा देला जेमा ओके फायदा नजर आवेला।

सभे जानता वेलेंटाइन डे क सबसे बड़ फायदा गिफ्ट आइटम अउरी एहि से सम्बंधित समान, कार्ड बेचे वाला के होला। त उ त एकर प्रचार प्रसार में आपन एड़ी चोटी के जोर लगइबे करी। धंधा खातीर माँग चाही। मांग पैदा करे खातीर जरूरी बा एकर प्रचार प्रसार, एके बढ़ावा देवे खातीर डिस्काउंट के साथे साथ बहुते लुभावना ऑफर के भी भरमार लगा देला बजार।

प्यार जइसन पवित्र भावना के अभिव्यक्ति बरिस के कवनो दिन भी कइल जा सकता कवनो खास दिन के जरूरत ना पड़े ई समय घरी देख के ना होला। लेकिन आजकाल बराबरी के जवन वेस्टर्न चस्का लागल बा उ बहुते खतरनाक आ घातक बा समाज खातीर। पश्चिमी विचारधारा हमनीके असभ्य आचरण करे खातीर उकसा रहल बा। व्यावसायिकता के दौर में सामाजिक दायित्व कहीं न कहीं पाछे छूटत नज़र आवता | मन के लगाम ना मन भावेला लेकिन अपना आचरण पर अंकुश जरूरी बा।

प्रेम निवेदन के अइसन रिवाज भारतीय संस्कृति के हिस्सा त नाहीये ह। इहवाँ के युवा वर्ग पर भी वेलेंटाइन डे के रंग चढ़ रहल बा जवन सँस्कृति के रक्षक लोग के स्वीकार नइखे उनके पहरेदारी करे के परता। बिरोध के खबर मीडिया में सुने के मिलेला।

हमनीके भारतीय संस्कृति अउरी सभ्यता विश्व के सबसे धनी अउरी पुरान सभ्यता हिय। एकराके विश्व के सब संस्कृतियन के जननी मानल जाला। जीये के कला होखे, विज्ञान होखे भा आपन राजनीति के क्षेत्र भारतीय संस्कृति के हरमेसा से ही विशेष स्थान रहल बा । अन्य देशन के संस्कृति त समय के धारा के साथ-साथ नष्ट होत रहेला लेकिन भारत के संस्कृति अउरी सभ्यता आदिकाल से ही अपना परंपरागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनल बिया। सैकड़ो बारिश के गुलामी के बाद भी संस्कृति मुवल ना । सबसे अधिका प्रभाव अंग्रेज के लउकेला अपना सभ्यता पर।

सभ्यता के संबंध बाहरी जीवन के ढंग से होला जइसे खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल आदि जबकि संस्कृति का संबंध हमनीके सोच, चिंतन अउरी विचारधारा से बा ।सभ्यता के अनुकरण कइल जा सकता, लेकिन संस्कृति के अनुकरण नइखे कइल जा सकता । धर्मनिरपेक्ष होखे के सिद्धांत धर्म के पाछे धकेल दिहलस। विज्ञान ज्ञान के अपेक्षित स्वरूप के नकार के भौतिकवाद उभरके सोझा आइल अउरी हमनीके सांस्कृतिक दृष्टिकोण अपना मूल लक्ष्य से भटक गइल ।

संस्कृति के नवका स्वरूप में गाँवन के छोड़ के शहरीकरण के छाप लउके लागल । गाँव मे भी शहरी होखे के उन्नति के निशानी के तौर पर देखल जाये लागल। गाँव के भोलापन गवइपन खत्म होखत जाता। सन्युक्त परिवार दरक रहल बा, पुरान आपन संस्कृति के छोड़के आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति के अपनावे के होड़ लागल बा। बिना सोचे समझे आन्हर हो के नकल करे में धरे में लागल बा समाज ।

परिवार समाज शिक्षा जवना मरज के दवाई रहे सबपर असर नइखे करत बदले के जरूरत बा। कवन चीज नीक बा कवन चीज बाउर उ चिन्हे वाली नजर त रखही के चाही । पश्चिमी विचारधारा कुल्हिये खराब नइखे ओके अपनाइ विज्ञान के क्षेत्र में, तकनीक के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में अउरी आपन संस्कृति से सीखि प्रेम के परिभाषा, सभकर सम्मान, प्राकृतिक संसाधन परिवार के साथे जिये, पर्यावरण के साथे जीव के भी चिन्ता करे। साँच मन से लोगन में प्यार बाँटब त साँच पियार दुलार जरूर भेटाई। जीन्दगी हंसी खुशहाल रही। प्रेम त पवितर होला शारिरिक आकर्षण के ऊपर।

तारकेश्वर राय ‘तारक’

तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

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