भोजपुरी क्षेत्र कऽ बेरोजगारी आ ओकर समाधान

Unemployment in bhojpuri speaking beltबेरोजगार कहते आँखि के सोझा पढ़ल लिखल नौजवान क चेहरा झलके लगेला। सामान्यतः जनमानस में चाहे सरकारी तंत्र खाली पढ़ल लिखल मध्यम श्रेणी के युवा लोग के तब्जो देला। लेकिन बेरोजगार क दंश त सब केहू झेले के मजबूर बा उ चाहे जाड़ पाला में आपन हड्डी गलावत।, तिखर घाम में चाम जरावत आ बरसात क पानी में भीजत खेतिहर होखे। चाहे खेत में काम करे वाला बनिहार मजूर होखे। बेरोजगारी सब जगह सुरसा नियर मुँह बा के खाड़ बिया।

भोजपुरीया  समाज के बनावट में गावं केंद्रीय तत्व बा। भोजपुरी आ गावं एक दूसरा के पर्याय हऽ। गावं त खेती पर निर्भर रहबे करेला। हमनी कऽ देश गावँन कऽ देश हऽ। कुल आबादी क 70  % आबादी खेती से आपन जिनगी चलावेला। शुरू से ही भारत कऽ आर्थिक स्थिति कऽ आधार खेती ही रहे। खेती से ही हमनी के पुरखा पुरनिया आपन जिनगी चलवला के साथे साथे समाज क पेट भरत रहे लोग। आजो हमनी के आधा से अधिक आबादी खेतीए पऽ निर्भर बा। खेती में बड़का बदलाव देखे के मिलता। पहिले खेत के अनुपात में आदमी कम रहे आ जिनगी के जरूरत भी सिमित रहे तऽ जीवनयापन हो ज़ात रहे। खेत तऽ सिमिते बा लेकिन जनसंख्या कहाँ रुके वाली बिया ई तऽ दिन पऽ दिन बढ़बे करी। कम खेत से अधिक  फसल लेवे के जरूरत महसूस भईल। आ एकरा खातिर हर तरफ से प्रयास होखता चाहे उ बैज्ञानिक होखे, चाहे सरकार बा साधारण किसान। निक फसल खातिर जरूरी होला उत्तम बीज, कीटनाशक, उर्वरक, उचित सिचाई आदि। हमनीके देश के 80 प्रतिशत किसान छोटका किसान बाड़न जेकरा लगे एक एकड़ भा एकरा से कम खेत बा। कम खेत में खेती कइला पऽ लागत ढेर लागेला आ फसल के उचित दाम ना मिलला से खेतिहर के घाटा लागल लाजमी बा। उ जिनगी चलावे बदे  कर्जा लेवे के मजबूर हो जाला। दुसरका बरियार कारण बा हमनी के देश के खेती मानसून पर निर्भर खेती होला। कबो बरखा ठीक से ना भइल बा अधिका  भईल तऽ खेती प्रभावित होला | ओकर खामियाजा खेतिहर के उठावे के पड़ेला। हमनी क देश में खेतिहर के पास कुछे महीना खेती के काम होला। बाकी समय खलिहर रहल ओकर मजबूरी बा। लाख मेहनत के बावजूद भी खेतिहर क आपन जीवन यापन करे में बड़ा कठिनाई के सामने करे के पड़ता। ई कुल देख के नवहा खेती से आपन मुँह मोड़ता। बड़ा असमंजस के स्तिथि बा। अईसही नवहा खेती से मुँह मोरिहे तऽ समाज पऽ संकठ गहरा जाई। जवन हमनी के देश खाद्य में आत्म निर्भर बा ओकरा के आयात के बारे में सोचे के पड़ जाई। सरकार खेतिहर से सौत वाला ब्यवहार करत लउकेला। सरकारी कर्मचारी के सैकड़ो भत्ता मिलेला ओहिजे देश के पेट भरेवाला अन्नदाता के ख़ाली न्यूनतम समर्थन मूल्य वाला लमचूस धरा देहल जाता। एकर फ़ायदा केवल 30  प्रतिशत किसान के ही मिल पावता। बाकि 70 प्रतिशत किसान आपन फसल खुला बाज़ार में औने पौने दाम में बेचे के मजबूर बा। सरकार के पक्षपात पूर्ण रवइआ आ खेती क नुक्सान वाला रूप युवा लोग के खेती से बिमुख करता। उ लोग रोजी रोजगार खातिर शहर के और पलायन करे के मजबूर बा।

इ बेरोजगारी के दूर करे के खातिर हमनीके जनसंख्या बृद्धि के रोके खातिर प्रयास करे के पड़ी। ई तबे रुकी जब लोग शिक्षित होइहे। शिक्षा के उचित बिकाश खातिर स्कुल कॉलेज के जरूरत पड़ेला। उ कुल बड़ले बा लेकिन उचित देख भाल के कमी के कारण आपन मकसद में कामयाब नइखे। खेती के अलावा पशु पालन, खेती प आधारित कुटीर उद्योग जवन बदहाली के जीवन जिए के मजबूर बा। सरकार बहुत योजना बनवले बिया लेकिन जमीनी स्तर पऽ उ कायम नइखे हो पावत, उ कागजे में सिमट के रह गईल बिया। हमनीके देश में लाखो हेक्टेयर जमीन परती पड़ल बिया ओकरा के बैज्ञानिक के सहायता से खेती लायक बनावे के जरूरत बा। सहकारी खेती समय के मांग बा, ओके अपनावे खातिर खेतिहर के समझवला के काम बा। सहकारी मतलब किसान आपन आपन खेत के एके में मिला के समिमलित रूप से खेती करो। लाभ बा नुकसान में सब लोग अनुपातिक रूप में सहभागिता निभावे। छोटका खेतिहर के मिल के सहकारी समिति बना के खेती कइले से लागत कम लागी आ सरकारी सहायता मिले में आसानी रही। सरकार के गावं के तरफ ध्यान देवे के जरूरत बा। अगर किसान के सस्ता बिजली आ निक सड़क यातायात के साधन भेटा जाव त आधा समस्या ओइसही सुलझ जाई। किसान आपन उत्पादन मंडी तक सीधे ले के जाए में सक्षम होइ आ ओके निक दाम भेटाई, बिचौलिया से छुटकारा मिली आ उपभोक्ता के सस्ता उत्पाद  मिली। अनुबंध खेती के भी जमीनी धरातल प उतरला के जरूरत बा। ई ख़ाली सरकारी फाइलें में न दबल रह जाव। एकरा से बड़हन फायदा ई होइ की छोटका खेतिहर जवन की आपन फसल क उचित मूल्य ना मिलला से कर्जा में दबा जाला। आ कर्जा के चुकावे खातिर ओके आपन जमीन बेचे के मजबूर होखे के पड़ेला। भूमि बीच के उ भूमिहीन आ मजूर बने के मजबूर बा। कबो कबो आत्महत्या जइसन बड़हन कदम उठावे के मजबूर हो जाला। अनुबंध वाला खेती में कम्पनी बैज्ञानिक तरीका से खेती करी परम्परागत फसल के अलावा नया नया फसल के ईजाद होइ। एकरा से खेतीहर के सालो भर काम मिली। संबंधित कम्पनी खेतिहर के नई नई तकनीक के साथ उत्तम बीज आ सिचाई के साधन उपलब्ध कराई ऐसे बंजर जमीन भी उपजाऊ बन जाई। कम्पनी भंडारण खातिर आधुनिक साधन उपलब्ध कराई जेकरा से ढेर समय तक अनाज के धराये में सुविधा मिली। सरकार अगर अनुबंध वाला खेती के बढ़ावा देहल चाहतिया तऽ उचित कानून बने के चाही ताकि खेतिहर के कम्पनी दबा न सके। सरकार किसान खातिर बहुत योजना बनवले बिया जिसे फसल बिमा योजना, कॉल सेण्टर के स्थापना, डी डी चैनल क शुरुवात इत्यादि। जरूरत बा येकर प्रचार प्रसार के आ सच्ची लग्न एकरा के लागू करे के। जब शिक्षित युवा खेती के तरफ मुड़ीह आ उकर झुकाव तबे होइ जब खेती से लाभ होखे। परम्परागत फसल के अलावा जड़ी-बुट्टी, सब्जी, फूल, फल आ कवनो अन्य फसल के खेती पऽ बिचार करे के जरूरत बा। एकरा खातिर पठन पाठन अवलोकन जरूरी बा। बात तबे समझ में आई जब लोग शिक्षित होइ। सरकार के भी अस्पताल, बैंक एकरा अलावा पेंशन के ब्यवस्था के तरफ ध्यान देवे के परी। ग्रामीण रोजगार योजना, जवाहर रोजगार योजना, आंगन बाड़ी जइसन सैकड़ो योजना बाली से लेकिन कूल भ्रस्टाचार के भेट चढ़के अपना मकसद से भटक गइल बाली सऽ। कहल जाला न इच्छा शक्ति मजबूत रही तऽ कवनो बाधा इंसान के रोक ना पाई। जरूरत बा दृढ इच्छा शक्ति के। हमनीके देश में युवा शक्ति के कमी नइखे जरूरत बा उचित मार्ग दर्शन के उनकर ऊर्जा के सही दिशा देवे के।

 

 

 

तारकेश्वर राय “तारक”

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