जो रे करोना- लघुकथा

फगुआ से कुछे दिन पहिले के बात हऽ, जाड़ अब धीरे-धीरे आपन बोरा-झोरा बान्ह के जाए के तइयारी करत रहे। मौसम में तनी तनी ठंडा रहे आ तनी तनी गर्मी भी। एही में एक रात घर के बहरी कुकुर के भूँकला से आज़िज आ के बिशेसर बाबू अपना कोठरी में से बहरा निकलनी कि तनी ताजा हवा खा लीहीं आ इहो देखीं कि कुत्तवा काहे भूँकत बा। अबहीं ऊ अपना घर के बहरी निकलबे कइले कि तबले उनकर नजर सड़क पर मुंहकुरिये गिरल आदमी पर गइल। ई देखते बिशेसर बाबू…

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