बसंत के नांवे पाती

बीतत जाड़ के संगे संगे प्रकृति में, ऋतु में बदलाव आवे लागेला। ई बदलाव माघ के अंजोरिया में पंचमी जवना के बसंत पंचमीयो कहल जाला के संगे आउर जादा लउके लागेला। बाकिर आजकाल ई बदलाव गांव जवार से लगभग नदारद हो गइल बा। त आईं आज भोजपुरी समय पर पढ़ीं भोजपुरी आ हिन्दी के छंद विधा के सशक्त नांव अमरेंद्र कुमार सिंह के बसंत से ई निहोरा भरल पाती।  हरियर धरती के दगदग पीयर रंग में रंगेवाला, ठूँठ फेंड़ में पचखी फेकावेवाला, सकल चराचर में नया जोस खरोस भर देबेवाला…

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बसंत माने प्रकृति के उत्सव

माघ सुदी पचिमी के हमनी सँ सब्द, नाद, सुर, लय, ताल, छंद, राग के धात्री, माता ब्रह्मचारिणी, शिवानुजा, हंसबाहिनी, प्रज्ञा प्रदायिनी, मइया सारदा भवानी के आहवान करेनी जा। आ एकरे संघे सुभागमन हो जाला “रितुपति राज बसंत के।” बसंत के आवते पूरा चराचर चहक उठेला। बसंत के पहुँच हर जगे रहेला। माँ इड़ा के बीणा के तार के झंकार कन-कन में गुँजे लागेला। चाहे ब्रह्म नाद हो चाहे उमाशंकर के डमरू के नडह निनाद हो चाहे राधाकृस्न को मोहिनी मुरली के सुरली रव हो चाहे पवनसूत के जय सियाराम के…

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