” शिक्षक दिवस ” आ हम शिक्षक – प्रो. ( डॉ. ) जयकान्त सिंह ‘जय’

शिक्षक दिवस पर पढीं प्रो. ( डॉ. ) जयकान्त सिंह ‘जय’ जी के लिखल ई आलेख

May be an image of Ram Pratap Singh and text that says "HAPPY TEACHERS DAY शिक्षक दिवस के सभे के अशेष बधाई आ सुकामना WWW.BHOJPURISAMAY."

                                                  ” शिक्षक दिवस ” आ हम शिक्षक– प्रो. ( डॉ. ) जयकान्त सिंह ‘जय
जब से कुछ टेवलगर भइनीं आ इस्कूल में पहुँचावल गइनीं तबे से ०५ सितम्बर के ‘ शिक्षक दिवस ‘ मनावे के बात भुलाये ना। हमार गाँवो किसान, सैनिक जवान आ सही में देखीं त शिक्षके के गाँव ह। घर पीछु एगो-दूगो शिक्षक जरूरे मिल जइहें। जब हमरा के सन् १९७३-७४ ई. के गाँव के इस्कूल में पहुँचावल गइल तवने घरी हमरा घर में बाबूजी, चाचा लोग आ भइया के मिला के चार जने शिक्षक रहलें। गाँव में प्राइमरी इस्कूल त सन् १९२४-२५ ई. का पहिलहीं से रहे जवन देस के आजाद होखे का पहिलहीं मध्य विद्यालय बन गइल रहे। सन् १९६६ ई. एगो आउर प्राथमिक कन्या विद्यालय खुल गइल। सन् १९७० ई. आवत आवत बाबा के नाम पर श्री अवध सिंह उच्च विद्यालय खुलल। जवन कुछ साल से उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के रूप ले लेले बा। फेर एने सन् २०१३ ई. में एगो आउर इंटर कॉलेज खुलल ह। जब देस आजाद भइल त गाँव के शिक्षाविद् आ जागरूक नवही समाज ‘ नवयुग पुस्तकालय ‘ खोलल आ खूब ढ़ंग से चलावल। खैर, हमरा त ‘शिक्षक-दिवस’ के जानकारी अपना प्राइमरी इस्कूल का गुरु जी ( मास्टर साहेब ) लोग से मिलल। तब शिक्षक- दिवस पर ऊ लोग हर लरिका से पचीस पइसा लेके एगो टिकट देवे आ ऊ सब पइसा जोड़ के कहीं ऊपर के शिक्षा विभाग का जाए। अइसे तब एह सब बात के जानकारी हम लरिकन का ना रहे आ ना गुरु जी लोग से एह सब चीज के तहकीकात करे के रिवाज रहे।
ओही प्राइमरी इस्कूल के गुरु जी लोग से शिक्षक-दिवस के बारे में सुनले रहीं आ जइसे-जइसे आगे का इस्कूल-कवलेज में पढ़त-बढ़त गइनीं तइसे-तइसे एह शिक्षक-दिवस के मान-मरजादा के ग्यान आ भान होत चल गइल। अपना ओही गुरु जी लोग से मिलल ग्यान आ शिक्षक का दायित्वबोध के भइल भान के साझा करे जा रहल बानी।
शिक्षक-दिवस बिद्यार्थी आ बुद्धिजीवी समाज के ओर से शिक्षक मतलब आचार्य लोग के प्रति आभार जतावे आ सरधा-सम्मान के भाव उजागर करे के दिन ह। भारतीय समाज में शिक्षक भा आचार्य के पदवी शासक-प्रशासक से ऊँच रहल बा। आचार्य के त देवता कहल बा – ‘ आचार्य देवो भव।’ बाकिर आचार्य खाली किताबी ग्यान देवे वाला के नइखे कहल गइल। आचार्य ओकरे के कहल बा जे अपना आचरन से उपदेस दे – ‘ आचारे शासयेत् यस्तु स आचार्य उदाहृत:।’ मतलब जिनका उपदेश के उदाहरन उनकरे आचार-बिचार-बेवहार होखे। जे शिक्षक मुँह आ मन – मिजाज के एक होखे। ई शिक्षक-दिवस एगो अइसने ग्यानवान , चरित्रवान , क्रियावान आ उर्जावान संवेदनसील आचार्य डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जयंती के अवसर पर मनावल जाला। अब ई सवाल आम जन का मन में पैदा हो सकेला कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी शिक्षक के अलावे देस-बिदेस के आउर कई-कई ऊँच ओहदन ; जइसे- कुलपति, कुलाधिपति, राजदूत, उपराष्ट्रपति आ राष्ट्रपति आदि पर रह के अपना जस के डंका बजवा चुकल रहलें त उनका जयंती के मामूली शिक्षक के दिवस के रूप में मनावे से उनका कवन सम्मान मिलेला। इहे त सोचे-बिचारे के बिचार बा। एह कुल्ह ओहदन के हासिल कइला के बादो उनकरे दिली इच्छा रहे कि हमार जयंती ‘शिक्षक-दिवस’ के रूप में मनावल जाए। ऊ एह से कि उनका मालूम रहे कि समाज आ राष्ट्रे ना सउँसे दुनिया खातिर एगो शिक्षक भा आचार्य के महत्व अतुलनीय होला। उनका एह बात के ग्यान-भान रहे कि शिक्षक हर छोट-बड़ ओहदा वाला के गढ़ सकेला। बाकिर कवनो आन ओहदा वाला आदमी एगो शिक्षक भा आचार्य के ना गढ़ सके। हर ओहदा वाला के गढ़े वाला शिक्षके होला आ जवना समाज भा देस में ग्यानवान, चरित्रवान, क्रियावान आ उर्जावान संवेदनसील शिक्षक के सम्मान ना होखे ऊ समाज भा देस कबो सभ्य, सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सबल आ सम्पन्न ना हो सके। उहाँ अराजकता बनल रहेला आ दबंग आ निहायत दबंग किसिम का लोगन के दबदबा बनल रहेला।
सन् १९६२ ई. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी भारतीय महागणराज्य के राष्ट्रपति हो गइलें त बिद्यार्थी लोग उनकर जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनावे के प्रस्ताव राखल। एह पर कुल्ह बिद्यार्थी लोग के भारतीय आ पच्छिमी जगत के सुप्रसिद्ध आचार्य आ शिक्षक लोग के महिमा बतावत अपना जन्मदिन के ‘शिक्षक-दिवस’ के रूप में मनावे के बिचार देत कहलें कि जदि हमरा जन्मदिन के तोहनी शिक्षक-दिवस के रूप में मनाव त हमरा अपार आनंद के प्राप्ति होई आ ई हमरो ओर से भारतीय आ पच्छिम के आचार्य कुल-परम्परा के प्रति सरधा-सम्मान उजागर करे जइसन होई। तब से उनका जयंती के राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक-दिवस के रूप में मनावे के स्वस्थ आ सार्थक परम्परा बन गइल। अपना सउँसे जीवन यात्रा के सभ्य, सुसंस्कृत , सुशिक्षित समाज आ राष्ट्र खातिर आदर्श आ उदाहरन बना देवे वाला ओह महामानव का अनुकरनीय जीवनवृत्त का एक-एक पन्ना पलटाए के चाहीं।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जनम ०५ सितम्बर, १८८८ के तब के मद्रास आ अब के तमिलनाडु के तिरूमनी गाँव के धार्मिक दम्पत्ति सर्वपल्ली विरास्वामी आ सिताम्मा किहाँ भइल रहे। ऊ चार भाई आ एक बहिन रहलें। उनकर परिवार अपना नाम के आगे ‘सर्वपल्ली’ एह से लगावत रहे कि उनकर पूरखा लोग अठारहवीं सदी का मध्य में ‘सर्वपल्ली’ गाँव से तिरूतनी गाँव में आके बस गइल रहे। बाकिर उनकर पूरखा अपना पहिले के गाँव ‘सर्वपल्ली’ के सम्मान देवे आ खुद का पीढ़ी के अपना पूरखन से जोड़ले राखे का भावना से अपना नाम के आगे ‘सर्वपल्ली’ जोड़त आइल रहे लोग।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सुरूआती शिक्षा इसाई मिशनरी संस्था के लुथर्न मिशन इस्कूल, तिरूपति में भइल। इहाँ से ऊ सन् १९०० ई. मैट्रिक क के बेल्लूर का कवलेज से सन् १९०२ में इंटर कइलें। एकरा बाद ऊ मद्रास क्रिश्चियन कवलेज से मनोविज्ञान, इतिहास आ गणित बिसय में बी. ए. कइलें। हर इम्तिहान में उनकर अस्थान अउवल रहत रहे छात्रवृत्ति का संगे। तब उनका बाबूजी का परोहिताई-पंडिताई आ कथा बाचन से परिवार के खेवा-खरच चलत रहे। उनका बाबूजी के इच्छा रहे कि ऊ मंदिर में पूजेरी होके घर के आर्थिक मदद करस। बाकिर ऊ जइसे-तइसे ट्यूशन पढ़ा के आ मित्र लोग का मदद से आपन पढ़ाई आगे जारी रखलें। एम. ए. के किताब खरीदे खातिर उनका पाले पइसा ना रहे त ऊ एकरा ला एगो तरकीब निकललन। उनका पड़ोस के बड़ भाई दर्शन शास्त्र से एम. ए. के परीक्षा देत रहस। फेर उनका एम. ए. करे खातिर उनकरे दर्शन शास्त्र के किताब मिल गइल आ ऊ सन् १९०६ ई. विश्वविद्यालय में सबसे अउवल अस्थान ले आके दर्शन शास्त्र से एम. ए. कर लिहलें।
सन् १९०९ ई. में दर्शन शास्त्र से एम. ए. करते सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के मद्रास प्रेसीडेंसी कवलेज से प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति के नेवता मिलल आ ऊ उहाँ प्राध्यापक के रूप में जोगदान दिहलें। उनका बिद्वता आ कार्य-पद्धति से प्रभावित होके अंगरेजी सरकार सन् १९१३ ई. में ‘ सर ‘ का उपाधि से सम्मानित कइलस।एही दरम्यान दक्छिन अफिरका से लौटल मोहन दास करमचंद गांधी से सन् १९१५ ई. में मिले आ संबाद करेके मौका मिलल। फेर ऊ गाँधी जी का बिचार आ भावी जोजना से प्रभावित होके भारतीय स्वाधीनता संग्राम के लेके कई गो आलेख लिखलें आ भारतीयता आ स्वाधीनता का दार्शनिक पक्षन पर आपन बिचार प्रस्तुत कइलें।
एकरा बाद सन् १९१६ ई. में मद्रास रजिडेंसी कवलेज में सहायक प्राध्यापक ( असिस्टेंट प्रोफेसर ) नियुक्त होके चल गइलें। एकरा बाद उनका के मैसूर यूनिवर्सिटी द्वारा दर्शन शास्त्र के आचार्य ( प्रोफेसर ) के रूप चुन लिहल गइल, जहँवा ऊ सन् १९१८ ई. से १९२१ ई. तक खूब मनोयोग से अध्ययन, अध्यापन आ अनुसंधान के काम में लागल रहलें। बिद्यार्थी बर्ग आ यूनिवर्सिटी के अलावे उनका बिद्वता, सक्रियता आ संवेदनसीलता के चर्चा प्रांत आ प्रांत के बाहर का विश्वविद्यालयन होखे लागल। सन् १९१८ ई. में उनका तब के महान शिक्षाशास्त्री आ दार्शनिक साहित्यकार रवीन्द्र नाथ टैगोर से मिले के मौका मिलल आ ऊ उनका से प्रभावित होके सन् १९१८ ई. में ही ‘ द फिलासफी ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर ‘( रवीन्द्रनाथ टैगोर का दर्शन ) नाम के किताब लिखलें। सन् १९२१ में ऊ कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में जोगदान दिहलें। जब ऊ मैसूर विश्वविद्यालय से बिदा होके कलकत्ता विश्वविद्यालय जाए लगलें त बिद्यार्थियन के हूजूम उमड़ पड़ल। यूनिवर्सिटी के बिद्यार्थी लोग फूल से सजल सवारी पर बइठाके आ खुद अपने खींचत रेलवे इस्टेशन पहुँचावल। कलकत्ता विश्वविद्यालय में ऊ सन् १९२१-१९३१ आ सन् १९३७ -१९४१ तक प्रोफेसर के पद पर रह के एगो आर्दश शिक्षक के रूप में काम कइलें। इहँवे ऊ सन् १९२३ ई. में ‘ इंडियन फिलासफी ‘ ( भारतीय दर्शन ) नाम के गुरु गम्भीर ग्रंथ के रचना कइलें। सउँसे दुनिया स्वामी विवेकानंद जी के बाद एक बार फेर राधाकृष्णन जी का एह गुरु गम्भीर ग्रंथ के माध्यम से भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित भइल। ऊ स्वामी विवेकानंद जी बीर सावरकर जी से बहुत प्रभावित रहलें। जवना के चर्चा ऊ कई बार कइले बारन।
सन् १९३६ ई. में ऊ इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय दर्शनशास्त्र, धर्म आ नैतिकता के प्रोफेसर बनलें। जहँवा से ऊ सन् १९५२ तक जुड़ल रहलें। ऊ जवना यूनिवर्सिटी से एम. ए. कइले रहस उहाँ के ऊ उपकुलपति भइलें। बाकिर एके बरिस का भीतर सन् १९३९ ई. में ‘कासी हिन्दू विश्वविद्यालय’ में कुलाधिपति होके बनारस (उत्तर प्रदेश ) आ गइलें आ सन् १९४८ ई. तक एह पद पर कार्यरत रहलें। एह दरम्यान ऊ दर्शनशास्त्र के कई एक ग्रंथन के लेखन आ प्रकाशन कीलें आ करवलें। सन् १९५३ ई. से १९६२ ई. तक दिल्ली विश्वविद्यालय के भी चांसलर के दायित्व सम्हरलें। एह तरह से ऊ भारते ना दुनिया का कई देसन में एगो आदर्श शिक्षक आ दार्शनिक के रूप में अतुलनीय ख्याति अर्जित कइलें आ भारतीय आचार्य कुल परम्परा के महिमा अस्थापित कइलें।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी एगो महान आदर्शवादी शिक्षक, शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक, धर्म आ मूल्य आधारित जीवन शैली जीये वाला के रूप में देस-दुनिया का मानस पर त अमिट छाप छोड़बे कइलन, एगो स्वस्थ, सार्थक आ प्रभावी भारतीय राजनयिक आ राजनेता के रूप में भी कम ख्याति ना अरजलें। ऊ पं. जवाहरलाल नेहरू जी का आग्रह पर सन् १९४७ ई. से १९४९ ई. तक भारत के संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में कई गो महत्व के काम कइलें। सन् १९४९ से १९५२ तक सोवियत संघ के विशिष्ट राजदूत रहलें। स्टालिन उनका के गुरुवत सम्मान देत रहलें आ ऊ निर्मल मन से उनका कंधा पर हाथ रखके टहलत-टहलत बहुते उपयोगी बिचार साझा करस। सोवियत संघ से लौटला के बाद पं. नेहरू भारत जइसन महान गणराज्य खातिर एगो उपराष्ट्रपति के पद के सिरजन कराके उनका के भारत के पहिला उपराष्ट्रपति के पद पर आसीन करवलें। जवना पर ऊ १३ मई सन् १९५२ से सन् १९६२ तक रहके देस खातिर कई गो महत्व के काम कइलें। एही बीच उनका के भारत सरकार द्वारा ‘ भारत रत्न ‘ के सर्वोच्च सम्मान सन् १९५४ ई. में देस के पहिल ऐतिहासिक राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी के हाथ दिहल गइल। ओह समय इहो अजगूत संजोग रहे के देस के एगो आउर महान शिक्षक आ बैग्यानिक माननीय चन्द्रशेखर वेंकटरमन जी के भी ‘ भारत रत्न ‘ सम्मान से सम्मानित कइल गइल। ओही साल महान कानूनविद् आ भारत के डोमिनिक के अंतिम गवर्नर सी. राजगोपालाचारी जी के भी ‘भारत रत्न ‘ से सम्मानित कइल गइल। एह तीनों विभूति के सम्बन्ध मद्रास से ही रहे।
एकरा बाद महान स्वतंत्रता सेनानी, कानूनविद् आ अपना धवल राजनीतिक जीवन खातिर ख्याति प्राप्त देस के पहिल यशस्वी राष्ट्रपति देस रतन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के राष्ट्रपति का पद से मुक्त भइला के बाद १३ मई १९६२ के दूसरका राष्ट्रपति के रूप में पदासीन भइलें। जवन भारत के एगो महान आदर्शवादी शिक्षक आ दार्शनिक के देस के ओर से बहुते सराहनीय सम्मान आ दायित्व सउँपल रहे। उनका राष्ट्रपति बनला पर विश्व के महान दार्शनिक बर्ट्रेंड रसल आपन प्रतिक्रिया देले रहस कि ‘ ई विश्व का दर्शनशास्र के सम्मान बा कि महान भारतीय गणराज्य डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के राष्ट्रपति का रूप में चुनलस आ हम एगो दार्शनिक भइला के नाते बहुते खुस बानी।’ ऊ पच्छिम के महान शिक्षाविद् आ दार्शनिक सुकरात के सिस्य आ अरस्तू के गुरु प्लेटो के बिचार साझा करत कहलें कि ‘ दार्शनिक के ही राजा होखे के चाहीं आ भारतीय गणराज्य एगो दार्शनिक के राष्ट्रपति बना के प्लेटो के सही सरधांजलि देले बा।’
राधाकृष्णन जी जबले राष्ट्रपति रहलें, हप्ता में दू दिन कवनो ब्यक्ति बिना कवनो पूर्व अनुमति ( एप्वाइंटमेंट ) के उनका से राष्ट्रपति-भवन में मिल सकत रहे। भारत के दूसरका राष्ट्रपति बनला के बाद उनकरे हेलिकॉप्टर सीधे अमेरिका का ह्वाइट हाउस में उतरल रहे। एकरा से पहिले कवनो ब्यक्ति के हेलीकॉप्टर ह्वाइट हाउस ना गइल रहे। इहो एगो विश्व बिख्यात शिक्षक आ दार्शनिक के दुनिया के ओर से दिहल असाधारन सम्मान रहे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी सन् १९६२ ई. से सन् १९६७ ई. तक देस के राष्ट्रपति रहलें। उनका कार्यकाल के दरम्यान १९६२ में ग्रीस के राजा भारत के राजनयिक दौरा पर अइलें त ऊ उनकर भरपूर स्वागत करत कहले रहस कि रउरा ग्रीस के पहिला राजा बानी जे भारत में अतिथि बन के आइल बानी। सिकन्दर तो बिना बोलवले मेहमान बन के आ गइल रहलें। राधाकृष्णन जी के कार्यकाल बहुत उथल-पुथल वाला रहे। देस का सन् १९६२ में चीन से आ सन् १९६५ में पाकिस्तान से जुद्ध लड़े के पड़ल। देस के दू दू प्रधानमंत्री के मृत्यु देखे के पड़ल। पं. नेहरू जी के मृत्यु २७ मई १९६४ के लालबहादुर शास्त्री जी अप्रत्याशित मृत्यु ११ जनवरी १९६६ के सोवियत संघ का तासकंद में हो गइल। तीन तीन गो प्रधानमंत्री के कार्यकाल के देखे के पड़ल। आखिर में ऊ २६ जनवरी, १९६७ के देस के राष्ट्रीय झंडा फहरावे के बाद अपना उद्बोधन में आगे के कार्यकाल खातिर खुद मना कर दिहलें।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रमुख पुस्तक बाड़ें स, जवना से उनकर आ एह देस का सभ्यता, संस्कृति, धर्म आ दर्शन के सउँसे दुनिया में ख्याति आ सम्मान बढ़ल- द एथिक्स ऑफ वेदांत, द फिलासफी ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर, दि रिन ऑफ कंटेम्पररी फिलासफी, रिलीजन एंड सोसायटी, माई सर्च फार ट्रूथ, इंडियन फिलासफी, द एसेंसियल ऑफ सायकलोजी आदि।
कृतज्ञ देस आ दुनिया एगो महान शिक्षक, बिचारक, शिक्षाविद् आ दार्शनिक के रूप में उनका द्वारा कइल अतुलनीय आ ऐतिहासिक महत्व वाला कार्य खातिर लगातार सम्मानित आ पुरस्कृत करत रहल। जवना में कुछ प्रमुख सम्मान आ पुरस्कार के उल्लेख जरूरी बुझात बा ; जइसे – सन् १९१३ ई. में इंग्लैंड सरकार द्वारा ‘ सर ‘ के उपाधि प्रदान कइल, यूनेस्को द्वारा सन् १९४६ से १९५२ तक भारत के बिद्वान प्रतिनिधि बनावल, शिक्षा आ राजनीति के क्षेत्र में उत्तम जोगदान खातिर भारत सरकार के द्वारा सन् १९५४ ई. में ‘ भारत रत्न ‘ सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कइल, सन् १९६१ ई. जर्मन बुक ट्रेड के सांति पुरस्कार, सन् १९६२ ई. में ब्रिटिश एकेडमी के सम्मानित सदस्य भइल, सन् १९६२ में ही उनका जनम दिन के राष्ट्रीय स्तर पर ‘शिक्षक-दिवस’ के रूप में मनावे के निर्णय, इंग्लैंड सरकार द्वारा ‘ आर्डर ऑफ मेरिट सम्मान, पोप जॉन पॉल द्वारा ‘ गोल्डन स्पर भेंट ‘, सन् १९६८ ई. में साहित्य अकादमी फेलोशिप पावे वाला पहिल व्यक्ति, सन् १९७५ में मृत्यु के बाद अमेरिका सरकार द्वारा धर्म का क्षेत्र में काम करे खातिर पहिला बेर कवनो गैर इसाई ब्यक्ति के रूप में ‘ टेम्पलटन पुरस्कार ‘ से पुरस्कृत , उनका मृत्यु के बाद इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी उनका के सरधांजलि देवे के निमित्त सन् १९८९ ई. से राधाकृष्णन छात्रवृत्ति के सिरी गनेस कइलस जवन बाद में राधाकृष्णन चिवनिंग स्कालरशिप के नाम में बदल गइल।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी १७ अप्रिल १९७५ ई. में देहांत हो गइल। उनका जीवन काल में उनका पास उपलब्धियन के ढ़ेर लाग गइल रहे। बाकिर ऊ कुल्ह उपलब्धि उनका मगज का ऊपर कबो ना बइठल। काहे कि उनकर कुल्ह उपलब्धि उनका मेहनत, मेधा आ मानवीय मूल्यन के आधार पर अरजल रहे। ओकर उपलब्धि मगज पर चढ़ेला जे पैरवी, पइसा, परिकरमा, परसंसा आ प्रलोभन का जोगाड़ू जंत्री से पाके माथे रखले रहेला। उनका के त बिद्या बिनयी बना देले रहे। अद्वैत बेदांत दर्शन के अगाध बिद्वान, ब्याख्याकार, बिचारक, चिंतक आ उपदेसक शिक्षक के रूप में सुख्यात राधाकृष्णन जी खुद निरमल-निस्छल आ सादगी का संगे जीये वाला धार्मिक महामानव रहस। उनकर कहनाम रहे कि केवल निरमल मन के ब्यक्ति ही आध्यात्मिक अर्थ के समुझ सकेला आ ओकरा के जी सकेला। खुद का संगे ईमानदारी आध्यात्मिक अखंडता के जरूरत ह। ग्यान आदमी के बल देला आ प्रेम परिपूर्णता। एक बेर ऊ सह अस्तित्व पर बात करत सहज आ निरमल भाव से माओ के गाल थपथपा दिहलें। माओ के ई बात बुरा ना लागल बाकिर उनका अगल बगल रहे वालन का ठीक ना बुझाइल। एह चीज के भाँप के ऊ बोललें कि चिंता मत कर लोग। हम अइसे स्टालिन आ पोप का संगे भी कर चुकल बानी। एतना निरमल आ एतना आत्मबिश्वासी रहलें राधाकृष्णन जी।
धर्म, शिक्षा आ शिक्षक बर्ग के बिसय में उनकर साफ मत रहे कि धर्म के बिना आदमी बेलगाम के घोड़ा जइसन होला। जवना शिक्षक का परिवेस आ परिस्थिति के परख ना होई , पुस्तक, पुस्तकालय आ पाठ्यक्रम से खुद के जोड़ के ना राखी, अपना शिक्षकीय दायित्व के प्रति लापरवाह रही, नैतिक मूल्यन आ खुद का आचरन के प्रति सजग ना रही ऊ कबो विद्यार्थी, समाज, देस आ मानव मात्र खातिर उपयोगी ना हो सकी। एकरा अलावे शिक्षक ऊ ना ह जे बिद्यार्थी का दिमाग में तथ्यन के जबरन ठूँसत रहे, बल्कि असली शिक्षा त ऊ ह जवन बिद्यार्थी के आवे वाला काल्ह का चुनौतियन खातिर तइयार करे। शिक्षक के देस के सबसे उत्तम दिल आ दिमाग वाला होखे के चाहीं। सुयोग्य शिक्षक बिद्या ब्यसनी के अलावे स्वाभिमानी आ अभियानी दूनों होला। कवनो शिक्षक के आदर्श केहू कुसल ग्यानवान, चरित्रवान, क्रियावान आ उर्जावान संवेदनसील शिक्षक हो सकेला, दोसर केहू धनाढ्य पूँजीपति भा सुविधाभोगी ब्यक्ति ना।
आज हमनीं तमाम शिक्षक समाज का उनका ब्यक्तित्व आ बिचार के कसउटी मान के खुद के कसे के चाहीं। आज हमनीं कहाँ खड़ा बानी। समाज भा देस हमरा बारे में का सोचऽता। हम शिक्षक बर्ग का डॉ. राधाकृष्णन के जीवनी जरूर पढ़े के चाहीं। एने उनकर पुत्र डॉ. एस गोपाल सन् १९८९ ई में उनकर बहुते पोख्ता जीवनी के प्रकासन करवले बारन।
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– प्रो. ( डॉ. ) जयकान्त सिंह ‘जय’

‘ प्रताप भवन ‘ महाराणा प्रताप नगर, मार्ग सं.-१(सी), भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर (बिहार)
पिनकोड – ८४२००१

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