संतकवि कबीर के जनम आ मृत्यु के तिथि बिचार- डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

संतकवि कबीर के जनम आ मृत्यु के तिथि बिचार – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’
उत्तर भारत के मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के क्रांतिकारी संतकवि कबीर के जनम तिथि, जन्म स्थान, परिवार, भासा, मरन तिथि आदि के लेके बिद्वान लोग के एकमत नइखे। आ जदि कबीर अपने चाहे उनका समकालीन उनकर केहू भक्त नइखे लिखले त जनम तिथि, जनम स्थान, परिवार आ मरन तिथि के लेके ठोस सबूत जुटावल कठिन बा। अइसहूं पहिले सम्पन्न परिवार का लरिका के जनम पतरी ना बन पावत रहे। विरले केहू का घरे लरिका पैदा होखे त उपरोहित आके ओकर जनम पतरी बनावस। बहुत बूढ़ लोग के कहत सुनले बानी कि जब इस्कूल में नांव लिखावे गइनी तो मास्टर साहेब पूछलें कि भूकंप इयाद बा त कहनी कि थोड़ा-थोड़ा इयाद बा। एह से ऊ अनुमान लगवलें कि सन् १९३४ के भूकंप में ई जरूरी पांच साल के रहल होई। तब सन् १९२८ भा २९ के कवनो महीना आ कवनो तारीख के जनम तिथि लिख देलें। एह स्थिति में ओह कबीर के जनम दिन आ तिथि के सवाल बा जेकरा बारे में कहल गइल कि कासी का लहर तारा तालाब के किनारे पुरइन का पता पर केहू छोड़ गइल रहे भा बिधवा भइला के बाद लरिका भइला के चलते लोक लाज बस कवनो ब्राम्हनी उनका के पुरइन के पता पर रख के चल गइल रहे। अइसन स्थिति में कबीर त आपन जनम तिथि आ दिन बतावे से रहलें। जदि उनकर पालन-पोसन करेवाला नीमा-नीरु नाम के जुलाहा परिवारो कुछ बतवले रहित त उहो भला। बाकिर उनका जनम तिथि, दिन आ बरिस के लेके दूगो दोहा प्रसिद्ध बा। जवना में एगो के बारे में बतावल जाला कि ऊ दोहा उनकर प्रसिद्ध चेला आ संतकवि धनी धरमदास के लिखल ह। दोसरा के चर्चा धरमदास का दोहा का संगही परशुराम चतुर्वेदी जी संवत् २०११ के इलाहाबाद से छपल पोथी ‘ कबीर साहित्य की परख ‘ के पन्ना – २६८ पर कइले बाड़न-
‘ संवत् बारह सौ पांच में ज्ञानी कियों विचार।
काशी में परगट भयों शब्द कहो टकसाल।।’

‘चौदह सौ पचपन साल गए चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी परगट भए।।’
एह दूनों दोहा में दूसरका – ‘ चौदह सौ पचपन साल गए– ‘ वाला पर अधिका बिद्वान लोग राजी बा। जवना के अनुसार संवत् चौदह सौ पचपन बितला ( गए ) के बाद मतलब संवत् चौदह सौ छप्पन छप्पन का जेठ महीना का पूरनमासी सोमार (चन्द्रवार) के कबीर दास के परगट भइल रहलन। अब परगट भइल रहस के मतलब जनम भइल रहे कि संत का रूप में सभका सोझा प्रस्तुत भइल रहस। आ कि ओह दिन कहीं से कासी में पहुंचल रहस। काहे कि खुद कबीर कासी में परगट होखे के बात बोलल बाड़ें। बोलल बाड़ें एह से कि ऊ कबो कलम-सियाही त कबो छूअबे ना कइले रहस। दूनो बात उनकरे कहल ह-
‘ कासी में हम परगट भये, रामानंद चेताये।’

‘ मसि कागद छूओ नहीं कलम गही नहीं हाथ।
चारों जुग को महातमा मुखहिं जनाई बात।।’
अब कबीर से सम्बन्धित जनश्रुतियन से एह दोहा के मिलान कइला पर बात कुछ आउर साफ हो जाता ; जइसे –
१. कबीर का दोहा आ पद के अनुसार ऊ कासी के वैष्णव संत रामानंद के चेला अथवा उनका समय में रहलें आ रामानंद के समय संवत् १३५६ से १४६७ बतावल जाला। एह तरह से रामानंद के मरन साल कबीर के उमिर एगारह साल के रहे। जवन संभव हो सकऽता। बाकिर दस-एगारह साल के उमिर में एगो जोलहा परिवार में पलल बच्चा के रामानंद आपन चेला बनवलें होइहें। ई सोचे वाला बात बा।
२. आसाम के प्रसिद्ध भक्त शंकर देव अपना उत्तर भारत के बारह साला तीर्थ यात्रा ( संवत् १५४०-
१५५२ ) के समय कबीर का समाधि के दर्शन कइले रहस। शंकर देव के समय संवत् १५०६-१६८५ बतावल जाला। एहू तरह से उनका जनम तिथि के सही मानल जा सकेला। अबहीं मरे का तिथि पर बाद में बिचार कइल जाई।
३. कबीर के झूंसी वाला तकी के समकालीन बतावल जाला। जेकर मृत्यु संवत् १४६६ बतावल जाला जवना से कबीर के जनम वाला साल संवत् १४५६ दस साल पहिले साबित होता। बाकिर जे कुछ लोग तकी के गुरु बतावेला ऊ सही साबित नइखे हो पावत। काहे कि तकी के मरहूं के समय कबीर लगभग दस साल के होइहें।
४. नानक के समय संवत् १५२६ से १५९६ लिखल बा। ई साबित कइल जाला कि नानक सताइस बरिस का उमिर में संवत् १५५३ में कबीर से मिलल रहलें। एह मुताबिक ओह समय कबीर के उमिर संतानवे साल ठहरऽता।
५. ऐतिहासिक तथ्य दिहल जाला कि संवत् १५५१ में कबीर के इस्लाम धर्म के आलोचना करे खातिर सिकन्दर लोदी दंडित करे का खेयाल से हाथी से कुचलवावे के प्रयास कइले रहे। एकरा अनुसार उनकर उमिर पंचानवे साल साबित होता।
एह जनश्रुतियन आ ऐतिहासिक तथ्य के उल्लेख
परशुराम चतुर्वेदी के पुस्तक ‘ कबीर साहित्य की परख ‘ के पन्ना २७० से २९२ तक में भइल बा।
अब तक का अध्ययन से ई साबित होता कि कबीर के जनम से जुड़ल संवत् बारह सौ पांच वाला दोहा से अधिका तर्कसंगत संवत् चौदह सौ पचपन साल गए वाला दोहा बा। अब रहल जेठ पूरनमासी के परगट होखे के बात त जइसे बुद्ध आ गोरखनाथ के जनम बइसाख पूरनमासी आ नानक के जनम कार्तिक पूरनमासी बतावल जाला ओइसहीं कबीर के जनम जेठ पूरनमासी बतावल गइल होई। काहे कि अइसन मान्यता बा कि पूरनमासी के जनमल जातक प्रायः महामानवे होलन। अइसे अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के संवत् २०१५ में नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से छपल पुस्तक ‘ कबीर वचनावली ‘ में दिहल कबीर के जनम संवत् से संबंधित आउर पुस्तक के विवरन के अनुसार कई तरह के मतभेद बा ; जइसे- कबीर कसौटी के अनुसार जनम संवत् १४५५ ( सन् १३९८ ), भक्ति सुधा बिन्दु संवाद के अनुसार संवत् १४५१ ( सन् १३९४ ), कबीर एण्ड दी कबीर पन्थ के अनुसार संवत् १४९७ ( सन् १४४० ) आ सम्प्रदाय के अनुसार संवत् १२०५ ( सन् ११४९ )। बाकिर तमाम बिद्वान आ कबीर पंथी लोग संवत् १४५५-५६ के जेठ पूरनमासी के ही समर्थन कइले बाड़न।
अब जहाँ तक कबीर के मृत्यु तिथि के बात बा त ओकरो के लेके चार तरह के दोहा प्रचलित बा; जइसे-
१. पन्द्रह सौ औ पांच में मगहर कीन्हो गौन।
अगहन सुद एकादसी, मिल्यो पौन में पौन।।
२. पन्द्रह सौ उनचास में मगहर कीन्हों गौन।
अगहन सुदि एकादसी मिलो पौन में पौन।।
३. समन्त पन्द्रा सौ उनहत्तरा रहाई।
सतगुर चले उठी हंसा ज्याई।।

४. संवत् पन्द्रह सौ पचहत्तरा किया मगहर को गवन
माघ सुदी एकादसी रलो पवन में पवन।।
एह चारो दोहा में मगहर जाए, एकादसी के तिथि आ पवन में पवन के मिल जाए के बात समान बा। बाकिर संवत् आ महीना के लेके अलग-अलग बात बा। एह में कवनो एके ठीक हो सकेला। आ इहो कुल दोहा उनकर चेला भा अनुयायी लोग लिखले होई। एकरा में बिद्वान लोग संवत पन्द्रह सौ पचहत्तरा पर जादा जोर देला। जवना के अनुसार उनकर आयु १२० साल ठहरता। जवना पर कुछ बिद्वान लोग के आपत्ति बा कि १२० साल केहू खातिर जीअल बेवहारिक नइखे लागत आ कबीर के त कई तरह के संकट, अभाव आ बिरोध झेले के मिलल रहे। लेकिन चुकि रामानंद के आयु १२० साल बतावल बा त कबीरो के आयु १२० साल बना दिहल बा। हरिऔध जी के ‘ कबीर वचनावली ‘ में दिहल पुस्तकन के विवरन के मुताबिक मृत्यु के संवत् भी अलग-अलग बा ; जइसे – कबीर कसौटी के अनुसार संवत् १५७५ ( सन् १५१८ ), भक्ति सुधा बिन्दु संवाद के अनुसार संवत् १५५२ ( सन् १४९५),
कबीर एण्ड दी कबीर पन्थ के अनुसार संवत् १५७५ ( सन् १५१८ ) आ सम्प्रदाय के अनुसार संवत् १५०५ ( सन् १४४८ )। एकरा में कबीर कसौटी आ कबीर एण्ड दी कबीर पन्थ के संवत् के बा। एह आधार पर आ आउर बिद्वान के मत के समर्थन से संवत् १५७५ के माघ एकादसी वाला दोहा के मानल जा सकेला।

डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

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