‘संत कबीर के सगुनोपासना’ – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

महान संत कवि कबिर दास जी के जयंती पर पढ़ीं डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ के कबिर दास के सगुनोपासना पर लिखल ई आलेख

‘संत कबीर के सगुनोपासना’ – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’
संत कबीरदास के बारे ई आम राय बा कि ऊ उत्तर भारत में निरगुन भक्ति धारा के पहिल संतकवि हवें।
बाकिर हमरा समझ से कबीरदास खाली निरगुनिए भक्ति धारा के संत नइखन। ऊ सुगुन भक्ति धारा के भक्तो बाड़न। बाकिर ओह तरह से ना जइसे सगुन भक्ति धारा के संतकवि तुलसीदास बाड़न। तबो जे अपना नाम के पाछे दास लगवले बा ओकर केहू ना केहू नाथ, साईं भा अराध्य होई। ऊ ओकर दास्य भाव से भक्ति जरूर करत होई। कबीरो दास करत रहलें। बाकिर ऊ हरसट्ठे सगुन साकार अवतार के रूपक कथानक नइखन गढ़ले। बाकिर बार-बार ओह अवतार के फूल-फल से पूजा करत समर्पित भाव से उनका जोति में विलीन होखे के बात करत बाड़न-

‘ ऐसी आरती त्रिभुवन तारे,
तेज पुंज तहाँ प्रान उतारे।

 

पाती पंच पुहुप करी पूजा,
देव निरंजन अउर न दूजा।

तन मन सीस समरपन कीन्हाँ,
प्रगट जोति तहाँ आतम लीनाँ।।’
केहू सगुन के उपेक्षा भा नजरअंदाज कर सकऽता, पूरा तरह से नकार नइखे सकत। इहाँ अवतार के बिरोधी अवतारी बन के पूजाए लागेलें। मूर्ति बिरोधी के मूर्ति संसार में सबसे जादे भेंटालें। जेकरा पूर्व जनम में बिस्वास ना होखे उहे अपना बीस जनम के कथा सुनावे लागेलें। ओइसहीं ई निरगुन आ सगुन के मामला बा। जइसे निर्गुट के एगो गुट बन जाला ओइसहीं निरगुनो का भीतर सगुन आकार लिहले रहेला। बिना सगुन के केहू निरगुन के कहिए ना सके। हं, निर

 

गुन के अलम-आधार ह सगुन त सगुन आकारो लेवेला निरगुने से। बिना सगुन-साकार देह के निरगुन आत्मा कहाँ रही आ का करी? ई देह निरगुन आत्मा के सगुन आवरने नू ह। एह निरगुन आत्मा से हीन सगुन साकार देह के कवन मोल? खुद कबीर सगुन साकार देहधारी होइए के नू निरगुन निराकार पर बोलत रहलें। कबीर के अनुभूति निरगुन बा। बाकिर अभिव्यक्ति त सगुने नू बा। ऊ बार-बार राम के चर्चा करत बाड़न। केहू कह सकेला कि उनकर राम निरगुन निराकार बाड़न। ठीक बा त निरगुन राम राजा राम कइसे? उनका आत्मा रूपी दुलहिन के भतार कइसे? बारात कइसे? भाँवर घुमाई कइसे? इहाँ रूप खड़ा हो जाता आ निरगुन निराकार के भाव तिरोहित हो जाता-
‘ दुलहिन गावहु मंगलचार,
मोर घर आए राजा राम भतार।’
कबीर सगुन साकार भगवान खातिर दीनदयाल, कृपालु, दामोदर, भक्तवत्सल, भयहारी मतलब सरनागत के भय हरेवाला, बैकुंठवासी, समुन्दर का पानी में अपना प्रभाव से पत्थर तैरावे वा ला, अधम भिलनी सबरी, कुजाति अजामिल, गनिका के तारे वाला, दुर्बासा का कोप से अपना भक्त अम्बरीस के बचावे वाला, हरनाकुस से भक्त पहलाद के बचावे वाला आदि के बार बार गोहरा रहल बाड़न –
‘दीनदयाल कृपालु दमोदर, भगतबछल भयहारी।
सरनाई आयो क्यूँ गहिये, ई कौन बात तिहारी।
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चलु रे बैकुंठ तुमहि लै तारउं,
हियहि त प्रेम ताजनैं मारउं।’
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है हरि भजन को परवांन
नीच पावें ऊंच पदवी, बाजे निसान।।
भजन के परताप अइसो, तिरे जल पासान।
अधम भील अजामिल गनिका, चढ़े जात बिमान।।
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राजा अम्बरीस के कारन चक्र सुदरसन धारे।
खंभा ते परगटयो गिलारि,

हिरनांकस मारयो नख बिदारी।
परम पुरुख देवाधिदेव, भगति हेत नरसिंह भेव।
कहे कबीर कोई लहे न पार,
पहलाद उधारे अनिक बार।।
कबीरदास एही खुलल आँख से तीनो लोक के एक स्वामी भगवान का सुन्दर रूप निहार के हँसत आ आनंदित होत बाड़न जे सभका के नचावेला-
‘ खुले नयन में हँस हँस देखू, सुन्दर रूप निहारूं।’
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‘तीन लोक पूरा पेखनाँ, नाच नचावे एक जना।
कहे कबीर संसा करि दूरी,त्रिभुवन नाथ रहा भरपूरि’
एकरे के ‘ राम चरित मानस ‘ में तुलसीदास लिखलें – ‘ सबहिं नचावत राम गोसाईं, नाचत नर मर्कट की नाईं।’
कबीर के ध्यान बार-बार भगवान का अवतार रूप का कृपा-दया पर जाता। जब सिकन्दर लोदी उनका के हाथी के आगे फेंकवा के कुचलवावे के प्रयास कइलस आ हाथी उनका पास आके उनकर अहित ना कइलस त उनका एक बेर फेर भगवान का महिमा पर भरोसा बढ़ गइल-

‘ भुजा बाँधि मेला करि डार्यो,
हस्ती कोटि मूंड मंहि मार्गों।
भाग्यौ हस्ती चासी मारी,
या मरलीधर की बलिहारी।
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हस्ती न तारे धरै ध्यान,बाके हृदय बसे भगवान।’
कबीर राम के ‘सारंगपानि’ कहके संबोधित करत के याचना करत बाड़ें कि हमरा के अभय पद के दान दिहल जाव-
‘ जौ जाचउँ तौ केवल राम।
कहै कबीर सुनि सारंगपानि,
देहु अभै पदु मांगउ दान।।’
ऊ अपना ईश्वर के अपना आँख में बसाके झाँप लेवे के चाहत बाड़न ताकि उनका अराध्य के केहू ना देख सके आ उनकर अराध्यो उनका सिवा केहू दोसरा के ना देखस-
‘नैना अंतरि आवतू नैन झांपि तोहि लेउं।
ना हौं देखौं और कूं ना तोहे देखन देखीं।।’
निरगुन निराकार ब्रम्ह के उपासक कबीरदास सगुन साकार ब्रम्ह का अवतारी-लीलाधारी रूप के उपेक्षा आ नजरअंदाज करियो के पूरा तरह से मुक्त नइखन हो पावत। तब फेर बोलत बाड़ें-
‘ सगुन कहब त झूठ निरगुन कहल न जाय।
अगुन सगुन का बीच में कबिरा रहा भरमाय।।’

– डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

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