रेडियो के लोहा सिंह – पद्मश्री रामेश्वर सिंह कश्यप

आज रेडियो के मशहूर नाटक ‘तसलवा तोर की मोर’ के रचयिता आ लोहा सिंह जइसन अमिट छाप छोड़ने वाला किरदार के अपना आवाज से जनमानस के स्मृति पटल पर अंकित करें वाला सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर सिंह कश्यप जी के जन्मदिन बा, एह अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी आ पत्रकार के संगे संगे साहित्यकार श्री लवकांत सिंह लव जी अपना लेखनी का माध्यम से रामेश्वर जी के श्रद्धासुमन दे रहल बानी।

रेडियोके लोहा सिंह – पद्मश्री रामेश्वर सिंह कश्यप

 

 

अध्यात्म से लेके विज्ञान तक, जवान से लेके किसान तक, कलम से लेके तलवार तक आ कला से लेके कलाकार तक, बिहार के माटी हर क्षेत्र खातिर एक से बढ़के एक रतन पैदा कइले बा। शेरशाह के नगरी के नाम से प्रसिद्ध सासाराम जइसन एगो छोट जगह के लईका अपना कलम, कला आ रेडियो के दम पर दुनिया भर में एगो अलग पहचान बनावल आ उ रहलें प्रो. रामेश्वर सिंह कश्यप। रामेश्वर सिंह कश्यप भी ‘‘शेरलॉक होम्स’’ आ ‘‘जेम्स बांड’’ के जइसे अपना नाम से कम आ अपना नाटक लोहा सिंह के कारण लोहा सिंह नाम से जादा प्रसिद्ध भइलें।ं कश्यप जी के जनम सन 1927 में 12 अगस्त के सासाराम के नजदीक सेमरा गांव में भइल रहे। इनकर बाबूजी के नाम राय बहादुर जानकी सिंह रहे आ माई रामसखी देवी रहली। इनकर बाबूजी अंग्रेजी सरकार में डीएसपी रहनी। 1950 में पटना के बिहार नेशनल कॉलेज से उन्हां के हिन्दी में एमए कइनी आ ओही साल पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी के व्याख्याता बन गइनी बाकी बाबूजी के निहोरा पर 1968 में पटना के साहित्यिक माहौल के छोड़के सासाराम आवे के पड़ल आ कुछ दिन के बाद उन्हां के शांति प्रसाद जैन कॉलेज, सासाराम के प्रचार्य हो गइनी।

आकाशवाणी पटना के शुरूआत 1948 में भइल आ ओकरा बादे ओहपर एगो कार्यक्रम चालु भइल चौपाल, एहमें रामेश्वर जी तपेश्वर भाई के रूप में भाग लेवे लगनी। कश्यप जी के कलाकार मन अब अपना रफतार में आ गइल रहे। इन्हां के लिखल एगो नाटक रेडियो पर प्रसारित भइल जेकर नाम रहे ‘‘तसलवा तोर कि मोर’’। एही नाटक में एगो पात्र रहे लोहा सिंह जेकरा के बहुत जादा पसन्द कइल गइल आ आकाशवानी केन्द्र में बहुत लोग के चिट्ठी आइल जवना में लोहा सिंह वाला नाटक फेर से सुनवावे के आग्रह रहे। असल में लोहा सिंह एगो अलग आ आकर्षक किरदार रहे जवना के कश्यप जी अपना असल जिनगी से लेले रहनी।
बाबूजी के डीएसपी रहला के कारण घर में नोकर-चाकर के कवनो कमी ना रहे। ओहीमें से एगो नोकर के भाई रिटायर्ड फौजी रहले आ उ शहर में रह के अइला के कारण गलत-सलत अंग्रेजी, हिन्दी आ भोजपुरी के मिला के खिचड़ी भाषा बोलत रहले जवना के कारण गांव के लोग पर उन्हां के बहुत रोब पड़त रहे। उनके देखा-देखी इनकर नोकर भी उहे भाषा बोले, कश्यप जी एही किरदार के अपना टोन आ चरित्र में उतार लेहलें।

‘‘ अरे ओ खदेरन को मदर… जब हम काबुल का मोरचा में था नु’’ श्रोता लोग में ई संवाद सबसे प्रसिद्ध आ प्रभावी रहे। खदेरन के मदर बनत रहली प्रो शांति देवी, शत्रुध्न बाबा , प्रो एनएन पाण्डे – फाटक बाबा आ लोहा सिंह के सार बुलाकी जइसन लोग एह अमर नाटक श्रृंखला के पात्र रहले। लोहा सिंह के मुंह पर जब काबुल का मोर्चा पर सार्जेण्ट का मेमिन के जिकीर आवे त लोग हंसत-हंसत लोटा जाए। एक समय टीवी पर रामायण-महाभारत के चर्चा रहे कि जब एकर प्रसारण के समय होखे त गली सब सून हो जाए ओहूसे बेसी नामी रेडियो कार्यक्रम रहे लोहा सिंह। कहल जाला कि जब लोहा सिंह के प्रसारण के समय होखे त पुरा बिहार थथम जाए…. सभे अपना- अपना रेडियो से कान सटा के बइठ जाए। शहर में सब गली सुनसान हो जाव… काहे कि सभे अपना-अपना घर में पुरा परिवार के साथे बईठ के एह कार्यक्रम के आनन्द लेवे आ गांव में जेकरा-जेकरा लगे रेडियो रहे ओकरा दुआर पर भीड़ जामा हो जात रहे। ओकर बाद भर हफता ओही अंक के संवाद लोग के जबान पर चढ़ल रहे। एह कार्यक्रम के सबसे खास बात ई रहे कि ई एकदम खांटी भोजपुरी में रहे, खाली लोहा सिंह ही खिचड़ी में बतियावस। एकरा अलावा जवन भी मुद्दा उठे उहो आम लोग से जुड़ल रहत रहे। एह धारावाहिक के एगो बड़ खूबी इहो रहे कि ई समाज में प्यार, भाईचारा आ मेलजोल के संदेश देत रहे।

धारावाहिक गांव के कवनो न कवनो समस्या के लेके शुरू होत रहे आ अंत में लोहा सिंह जी के अक्लमंदी से सब समस्या हल हो जाए। सभे से कवनो ना कवनो जुमला जुड़ल रहे जइसे लोहा सिंह के हमेशा शिकायत रहे कि खदेरन के मदर आप बुझती काहे नहीं है आ फाटक बाबा आपहूं काहे नहीं समझावत हैं। संवाद एकदम अपनापन लेखा आ गुदगुदावे वाला रहत रहे। फाटक बाबा, मेमिन माने अंग्रेज मेम, बेलमुंड माने जेकर कपार छिलाइल होखे, बिल्डिंग माने खून बहना। लोहा सिंह के एकहक गो डायलॉग पर लोग लोटा-लोटा के हंसे जइसे ‘‘ऐसा फैट मारे हम उसको कि उसका नाक से बिल्डिंग होखने लगा आ उ घिरनई लेखा नाच के गिर गिया’’। उन्हां के धरावाहिक के एगो आउर अंश बहुत मशहुर भइल रहे जेकर अभियो कई आदमी चर्चा करेले -‘‘ जानते हैं फाटक बाबा एक हाली काबुल के मोर्च पर, हमरा पास एगो बाबर्ची सिकायत लेकर आया। उसका पट्टीदारी में कोई मू गया था इसलिए उ माथा मुड़ाए हुए था, हमको बोला -बाबू लोहा सिंह , बताइए त, आपका होते हुए करनैल हमरा माथा पर रोज तबला बजाता है, हम बोले कि हम बतियायेंगे। हम जाकर करनैल को बोले कि उसका घर में मौत हो गया है अउर आप उसका बेलमुंड पर घिरनई जईसा तबला ठोंकते हैं ई बात ठीक नहीं है। करनैल बोला कि ठीक है हम नहीं करेंगे। जानते हैं फाटक बाबा जब ई बात हम उ बाबर्ची को बताए त का बोला उ, कि ठीक है बाबूसाहेब उ तबला नहीं बजाएगा त हम भी उसका मेमिन का नहाने का बाद जो टब में पानी बच जाता है उससे चाह बनाकर नहीं पिलाएंगे उसको।’’

कश्यप जी सोभाव से भी बहुत सज्जन, दयालु आ मीठ बोले वाला आदमी रहनी। लोग के सहायता खातिर हमेशा तईयार रहे वाला कश्यप जी कभी केहू के आलोचना ना करस आ हास्य त उन्हां के सबसे बड़ पूंजी रहे। उन्हां के सरल सोभाव के झलक ‘‘पांचवा सारन जिला भोजपुरी कवि-सम्मेलन’’ के सभापतिय भाषण के कुछ अंश के माध्यम से देवे के चाहेम -‘‘ भोजपुरी के नेही भाई सभे! अपने सभे हमरा के जवन आदर देल गइल, ओकरा खातिर धनवादे देत ढिठाई बुझाता। हम नवहा, अबूझ अदमी, अबहीं त डैना खोल के आपन बउसावे तउलत रहीं कि अपने सभे सनेह के डोरा में पांख बान्ह देलीं। हम एह बोझा के जोग बूझल गइलीं, एकरा में अपनेहीं सभे के बड़वारगी बा, हमार कवनो गुन नइखे। हमरा त बुझाता कि राजा महाराजा लोग के सजल-संवरल सभा में हम लेदरा लपेट के, चिरकुट ओढ़ले चल आइल बानी। जवना सभा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डाक्टर ब्रम्हचारी आ प्रिंसपल मनोरंजन जी जइसन सउंसे भारथ में नामी आलोचक, विचारक आ कवि आइल बानी ओहिजा हम, अपने सभ के, आ बिसेस कर के महेन्द्र शास्त्री जी के छोहे से हीरा के ढ़ेरी में कांच के टुकड़ा लेखा चल आइल बानी। अपने सभे धर बान्ह के हमरा के फेंड़ा पर चढ़ा देले बानी – आदर, सरधा आ संकोच से हमार मूड़ी नवल जात बा।’’ एह कवि सम्मेलन में कश्यप जी सभापति रहनी बाकी भाषण के माध्यम से उन्हां के उदारता आ ज्ञान के साफ-साफ दर्शन होता साथे साथ इहो लउकत बा कि उन्हां के केतना लमहर शब्दशिल्पी रहनी। उन्हां के विचार गंगा के पानी लेखा निर्मल आ पूज्य रहे। एही सभा में भोजपुरी संस्कृति पर उन्हां के कहनी -‘‘भोजपुरी संस्कृति लाठी आ हिरदे के गंगा-जमुनी संगम ह। पुराना जबाना से भोजपुर रन में दहाड़त आइल बा, रूप पर ढ़रत आइल बा। मरे से हमनी का कबो ना डेरइलीं, चाहे रूप पर होखे चाहे रन में।’’ कश्यप जी के बारे में इहो कहल जाला कि अंग्रेजी सरकार के पुलिस अधिकारी के लड़िका भइला के बादो उन्हां के क्रांतिकारियन के मदद करत रहनी आ ऐकबेर त पटना छोड़ के भागे के पड़ल जब पुलिस के गोली चोरा के ओह लोग के देवे के मामला सामने आइल रहे। शुरू से ही क्रांतिकारी विचार के रहला के बादो सोभाव के बहुत ही विनम्र रहनी।

लोहा सिंह नाटक पहिले सप्ताह में एक दिन ही आवत रहे बाकी सन् 1962 के अचानक भइल चीन के लड़ाई में भरतीय सैनिक हारत रहलें, ओही सैनिकन के मनोबल बढ़ावे खातिर कश्यप जी रात-दिन मेहनत करके ‘‘लोहा सिंह’’ नाटक के रोज प्रसारित करववनी। ओकरा बाद त ई नाटक भारत ही ना बलुक दोसर देश में भी लोकप्रिय होखे लागल। ई नाटक अमीरी-गरीबी, शिक्षा-अशिक्षा के सीमा से बाहर निकल चुकल रहे आ हर आदमी ऐकरा के बहुत पसन्द कइलक। एगो प्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर निशांतकेतु एह नाटक के बारे में लिखले बारन कि – ‘‘लंदन काउंटी काउंसिल, नेपाल, जोहानिसबर्ग आ मॉरीशस के सरकारन के मांग पर भारत सरकार एकर कैसेट बना के भेजत रहे।’’ ऐतने ना लोहा सिंह नाटक के लोकप्रियता से प्रभावित होके यूनेस्को द्वारा प्रकाशित ‘‘रूरल ब्रॉडकास्टर’’ नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘‘लोहा सिंह’’ नाटक के बारे में लिखे खातिर कश्यप जी से निहोरा कइले रहे। बाद में ओमे एगो लेख प्रकाशित भइल जेकर नाम रहे -‘‘अबाउट लोहा सिंह’’। देश के लगभग हर नामी पत्र-पत्रिकन में उन्हां के निबंध, कहानी, कविता, आलोचना आ एकांकी छपत रहे। भोजपुरी के अलावा हिन्दी में भी इन्हां के बहुत रचना कईनी – बुलबुले, पंचर (बाद में – बेकारी के इलाज संग्रह), बस्तियां जला दो, रॉबर्ट, आखरी रात, कलेंडर का चक्कर, सपना, रात की बात, अंतिम श्रृंगार आ ऐकरे जइसन कईगो आउर रचना के साथ लोहा सिंह नाटक श्रृंखला प्रमुख रहे जेकर मंचन भारत के कईगो प्रमुख शहरन में भइल। पंचर आ आखिरी रात के अखिल भरतीय नाट्य प्रतियोगिता में भी पहिलका स्थान मिलल रहे।

भारत सरकार भी उन्हां के साहित्यकर्म से प्रभावित होके सन् 1991 में ‘‘पद्मश्री’’ से सम्मानित कइलक आ ओकरा बाद बिहार सरकार भी उन्हां के ‘‘बिहार गौरव’’ सम्मान देलक। इन्हां के लगभग नौ गो उपन्यास, काव्य रूपक, नाटक, एकांकी संग्रह जइसन किताब के छोड़ के जादातर छपबे ना कइल। एगो साक्षत्कार में उन्हां के कहले रहीं -‘‘हमार बहुत रचना भुला गइल, बहुत रचना अप्रकाशित बा। असल में हमरा किताब छपावे के विद्या ना आइल।’’ एक बात के मलाल उन्हां के हमेशा रहल कि लोहा सिंह के लोकप्रियता के चलते उनकर गम्भीर साहित्य दब गइल। लोहा सिंह नाम से एगो फिलिमो बनल जेकर कहानी, पटकथा, संवाद आ गीत सब कश्यप जी ही लिखनी आ लोहा सिह के किरदार में भी इन्हें के रहनी बाकी उ प्रयोग सफल ना भइल आ फिलिम ना चलल। कश्यप जी सांचो के लोहा सिंह रहनी काहे कि एगो बड़ असफलता के बादो उन्हां के हार ना मननी आ अपना अगिला तईयारी में लाग गइनी बाकी ई अध्याय के इहईं समाप्त होखे के रहे आ 24 अक्टूबर 1992 के अचानक उन्हां के मृत्यु हो गइल। हास्य, व्यंग्य आ गंवई परिवेश के छोट-छोट बात पर हंसा के रोआवे वाला कलाकार हमेशा खातिर शांत हो गइल। सबसे दुख के बात त ई बा कि एह महान भाजपुरिया के बारे में आज बहुत कम लोग जानेला। सासाराम में इन्हां के नाम पर बनल सड़क ‘‘लोहा सिंह मार्ग’’ के जानेवाला अब कम भइल जा रहल बारें जबकी उनका के भुला गइला पर इतिहास हमनी के कबो माफ ना करी। लोहा सिंह के नाटकन के प्रकाशन 1962 में राष्ट्रीय प्रकाशन मंडल,पटना के द्वारा कइल गइल रहे बाकी अब इहो मिलत नइखे। ओइसे त लोहा सिंह हमेशा अमर रहीहन बाकी सरकार के चाहीं कि एह महान विभूति के नाम पर स्कूल-कॉलेज के नाम रखे, नाटकन के दुबारा से प्र्रकाशन करावे, इनका नाम पर नाट्य प्रतियोगिता करावे ताकी लोहा सिंह खाली इतिहास बनके मत रह जास।

लव कान्त सिंह

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