पूर्वी के जनक महेंद्र मिश्र के नमन

पूर्वी के जनक महेंद्र मिश्रभोजपुरी में पूर्वी के जनक महेंद्र मिश्र जी के जन्मदिवस पर श्रद्धांजली अर्पित करत भोजपुरी के विद्वान आ कवि गीतकार संगीत सुभाष पांडेय जी के लेख

मिश्रवलिया जलालपुर की धरती के नमन, जहाँ आजुए का दिन भोजपुरी भासा में एगो जबरदस्त, अदभुत आ अनूठा गायनशैली पुरूबी के जन्मदाता महेन्दर मिसिर जी के जनम भइल। उहे महेन्दर मिसिर जेकरा में कविता आ गायन का अलावा देसभक्ति कूट- कूटके भरल रहे।

देस की आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी लो के जाली नोट छापके धन से मदद करेवाला मिसिर बाबा के नमन करत ओहदिन के त हम बस कल्पना कर सकतानीं कि कइसे अपने नोकर उहाँके अंगरेज पुलिस से पकड़वा देहलसि।

कहल जाला कि अंगरेज शासक लो का ए बात के पता चलि गइल रहे कि महेन्दर मिसिर सासन से बगावत करेआला लो के धन देतारें। लेकिन, कब, कहाँ आ कइसे- ई पता ना लागे? गोपीचन्द नामके इन्सपेक्टर के ई पता करे के जिम्मेदारी दिआइल। गोपीचन मिसिर जी के सेवक बनिके तीन साल रहलें आ सब पता लगाके पकड़वा दिहलें। मोकदमा चलल। मिसिरे बाबा का गीतन का तरे गोपीचन गवाही दिहलें-

“नोटिया के छापि- छापि गिनिया भँजवल ए महेन्दर बाबा।
बिरटिस के कइल हलकान, ए महेन्दर बाबा।
ई सुनते बाबा कहनीं- ‘पाकल- पाकल पनवाँ खिअवले गोपीचनवा,
पिरितिया लगाइके भेजवले जेहलखनवा।

लोअर कोट से हाई कोट ले लड़त दस बरिस के सजाइ भइल, बाकी बाबाके सब खेतबारी बिक गइल। अइसन रहे देसभक्ति बाबा के।

केहू अदिमी का गुजरि गइलाका बाद (ओइसे कवि कबो मुएला ना), ओकरा गुन- दोस पर बतकही जरुर होला। लेकिन, अपनी संसकिरति के ई बहुत बड़हन बाति ह कि ओकरा अँजोर पक्षके जिआदे चरचा कइल जाला आ अन्हार पक्षके भुलवावे के कोसिस कइल जाला। लोग महेन्दर बाबा का बारे में कई तरह के अंटसंट चरचा करेलें, एपर ना जाके, उहाँके गुन पर चरचा होखे के चाहीं।

ए बेरा कवनो गवइया भा बजवइया एगो राग बना देता त हाला मचि जाता आ महेन्दर बाबा त पुरूबी का रूप में एगो दमदार गायनसैली के बनवले हईं, जवना थाती से धरती- आसमान रही तबले माई भोजपुरी के भंडार भरल रही। हमरा त नइखे इयादि कि ए समयके कवनो गवइया भा बजवइया एको सैली बनवले बाड़ें। आजो भोजपुरी छेत्र में ओकरे के निमन गवइया मानल जाला जे पुरूबी गावे में निपुन होखे। लेकिन, हम छमासहित कहल चाहबि कि जातिबाद के राजनीति जवन ना करावे। एकरे चलते महेन्दर बाबा ऐयास हो जातानीं आ बाकी लोग गंगा जइसन पबित्तर। ए राजनीति से भोजपुरी के केतना भला होई, रउरा अन्दाजा लगा सकतानीं।

महेन्दर बाबा कवनो दोसरा भासा के कवि रहितीं त लोग माँथके ताज बना लित, एगो खाली पुरूबी की धुन खातिर। कबिता त अलगे बा। पुरूबियो में एगो धुन ना, कई तरह के धुन आ सगरी धुनन के जनमदाता- महेन्दर बाबा।

त, हमरा कहे के मतलब ई कि देसभक्ति आ उहाँके संगीत में जोगदान के मन पारीं। हमेसा गुनगुनात रहीं, महेन्दर बाबाके पुरूबी धुन- एके मटियाके बने दू- दूगो खेलवना से ननदिया मोरि रे गढ़ेवाला एके गो कोंहार।

सब भोजपुरिया का ई जानिके खुसी होई कि उहाँके लिखल अपूर्व रामायण आ अउर बहुत बिनछपाइल रचना राष्ट्रभाषा परिषद का नजर में आइल बा आ हो सकेला छपियो जा। एसे कुछ आसा बा कि उहाँके रचना सुरक्षित हो जाई।

संगीत सुभाष

गोपालगंज

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