“माई-भउजी” भोजपुरी कहानी

“माई-भउजी”

“दीपक अपना घर के दलानी में बइठल ,बैलवन के गर के घण्टी सुनत रहलन। मन अकुलाए–चल जाईं आ तनी बैलन के सुहरा आईं। पर लगले फेरु से बइठ जास,,,,,एहि उहापोह में रहलन की सामने से भउजी आवत लउक गइली आ इनकर रहल-सहल हिम्मत भी जबाब दे देलख। उ पाछा से उनका के जात देखत सोंचे लगलें,,इ उहे भउजी हई जे गोदी में खेलवले रहली ???
दीपक चारी बरिस के रहलें त उनकर भउजी बियाहे अइली।उ हरमेशा बइठल भउजी के निहारत रहस,उनके गोदी में सुतस, उनके से खाना खास,,उनके जरे रहस,,भउजी,मज़ाक में कहस कि ए बबुआ,,हमरा से बिआह करेम ? आ उ चुप बइठल मुँह निहारत रहस,,,त माई कहस कि तुहीं त एकर माई बाड़ू,, इनका के तुहीँ त पोसत बाड़ू,,,,
साचहुँ त रहे–उनका गोदी में डाल के माई चल गइली आ ऊ इनकर माई-भउजी बन गइली आ ऊ दीपक के अइसे अँकवारी में धइली कब मायी बन गइली,,पते ना चलल। गांँव जवार के लोग कहे कि ए दुलहिन–जब तहार लइका आई त कइसे दुनो के सम्भरबु ?? ओह दिने ई किरिया खा गइली कि हमार लइका ना आई,, इहे हमार लइका बाड़न आ हम इनकर माई। आ तहिया से ऊ कवनो कमी ना रखली आ उहे आजु ई भउजी ?? उफ! ई का हो गइल!!
छव महीना पहिले गवना कराके ऊ इंदु के ले आइल रहलन आ भाई-भउजी लगे छोड़ के महीने भर पहिले त नोकरी पर गइल रहलहन।भउजी कहस कि ए बबुआ-कनियो के ले जा,,पर ऊ ना मनलन,,बाहर के बात बा,अपना रहेके ठिकाने ना, इनका के कहवाँ ले जाईं ? इंदु भी मचलत रहस,,,हमरो के ले चलीं ।थाकि के उ कहलन कि ए भउजी,,तनी जमे द उहँवा त सभका के ले चलेम ,आ ऊ चल गइलें। सभ त ठीके रहे,,भउजी वह घड़ी कहस कि कनिया कइसे रहीहन,,त उ इहे कहस कि तूँ कइसे रहलु ??आपन गुण सिखावऽ,तनी सेवा करावऽ,, फेरु सभके ले चलेम।आ ऊ चल गइलन। मनवा त उनको रहे इंदु के संगे ले जाएके, नया नया बिआह भइल रहे,,पर लगले भउजी के त्याग-तपिसवा लउके लागल,,उनका के छोड़ी के भाई-भउजी के रहे,,तनी भउजी के आराम मिले,, इहे सोंचि के ऊ चली गइलन।
उनका खतीरा,भउजी आपन कोख़ बांँझ क लिहली,,आ उहे आजु मुँह फेर के चल गइली,का इहे दुनिया ह ? बुझाता साँचहुँ नु इंदुआ कहत रहे कि भउजी बड़ गजन करतारी, पटीदार बन गइल बाड़ी, तोहार भेजल रुपिया से खेत ,बैल किनऽतारी अपना नावें,,आ हमरा पेटो पर आफत बा,भरल पेट लइका लेहले सगरो कार करतानीं आ भरपेट दाना नइखे भेंटत।हम त इंदुआ के ही बाउर सोंचत रहनी हँ,,इहाँ त बाते उलिट गइल बा!!
दीपक के ध्यान टूटल,,इंदुआ कराहत रहे, दरद से छपिटात रहे आ माई बाबू चिचिआत रहे।धउरल ऊ भीतरी गइलें,ना बुझाइल त बहरा अइलें,,का करस आ का ना करस,,,एहि असमंजस में रहलें कि तले भउजी धउरल घर में ढुकि गइली ।आ ऊ नजरि चोरइले बहरा आके बइठ गइलन।घड़ी भर बीतल ,लइका के रोएके आवाज पर चिहुँक गइलें,,,आय,,,इ लइका होखे के दरद रलऽ !!!भउजी ना आइल रहती तब??अभी सोंचते रहुएँ की भउजी ,निकलली आ चल गइली।क्षण भर में रुक्मी चाची लइका लगे चल अइली।तले चंपवा आइल आ हरदी मीठा दे के चल गइल,,आधा घण्टा बाद फेरु आइल आ कथि दूनी के हलुआ धर गइल।रुक्मी चाची आ चंँपवा मिली के इंदु के सम्भार लिहली लोग।उ बुझत रहलन की बहरा से सरजाम सभ के करऽता,,पर उनकर हियाव ना होखे कि भउजी लगे जास।अभी दसो दिन त ना भइल,,फोन कइके उनका के बहरा से बोलावल गइल रहे,,अभी ऊ नीमन से घर-जवार घुमबो ना कइलन की भउजी आके खाड़ हो गइली अँगना में रस्सी तान के,आजु से तू ओने रहबऽ आ हमनी ऐने रहब,,तहरा से हमनी ना, आ हमनी से तू ना,, कहत जे भीतरी गइली,,फेरु दीपक के हिम्मत ना भइल की ऊ पूछसि कि का भइल हऽ, ऊ भउजी के ई रूप कहियो ना देखले रहलन।
आजु लइका के बरहिया बा,,गाँव जवार के केहू नइखे आवत,भउजी भी नइखी लउक़त,,उ इंदु के डांँट डपट के,आ भउजी के मनावे खतीरा लइका लेके चललन,,पीछे इन्दुओ चलली,,उनका दुःख त रहे कि भउजी पर झूठ साँच लगा के हम अलगा त हो गइनी पर गलती अब बुझात रहे।
इ का !!!!!! उ चिहुँकि गइलें,  ई त अजबे भइल बा!! सजल-धजल भउजी चटइया पर नीचे सुतल बाड़ी आ लोग-बाग अँगना- दुअरा घाटे ले जाए के तइयार बा!!!भाई कोना धइले बइठल बाड़न,,दुनो बेक़त आगा पीछा ताकत आ बात बुझे के कोसिस में लागल,,बुझते ऊ धड़ाम से भउजी के गोड़ पर गिर पड़लें ,,,इन्दुओ लइका के भउजी के अंँकवारि में सुता के रोए लगली,,गलती के माफी मांँगे लगली,,अलगा रहे के सवख में इ कुल्हि गलती हो गइल ए दिदिया,,माफी दे दऽ,,, दीपक पर त मानो पहाड़े टूट गइल रहे–ए भउजी,,माफियो माँगे के मौका ना देहलु,,,
भाई,,धीरे से उठि के लइका के गोदी में उठा लिहलन आ लिहले भीतरी चल गइलन,,लवटलन त एगो कागज के पुलिंदा रहे,,दीपक के दे के कहलन,,-” तहार अमानत ह, तहार सब कुछ लइका के नामे बा। तहार भउजी माई के अंतिम चाह रहल ह कि उनका मुंँह में अगिन देबे के अधिकार लइका के तूँ देबऽ”।
दीपक ,दहाड़ मारि के भउजी माई के गोड़ पर गिर गइलें–माई,सभ के बदला एके बेरि आई के माफ क देहतु,,काश!!!काश!!!काश!!!

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डॉ मधुबाला सिन्हा
मोतिहारी,चम्पारण

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