का ह कजरी?

चित्र गूगल से साभार

सावन के एगो पख बीत रहल बा आज, मने सावन के आज अमावस ह। सावन में अइसे त धरती हरियराइल रहेली आ धरतीए ना बलुक पूरा संसार हरियर भइल रहेला। एह दौरान गांव जवार में पहिले नया उमिर के लइकिन आ नया नोचर कनिया लोग झिलुआ लगाई लो आ कजरी गाई लो। अबहूंओ कतहीं कतहीं ई सुना जाला, त आखिर का ह कजरी? एकर का कहानी ब आईं कजरी के बारे में कुछ जानकारी लिहल जाउ प्रसिद्ध लोकगीत गायक श्री शशि अनाड़ी ब्यास जी के लिखल एह आलेख से-

कजरी एक तरह के भोजपुरी लोक गीत ह।ई सावन के महीना के गीत ह जेकरा के लइकी अउर मेहरारु लोग झुलुआ खेलत समय गावेली। कजरी गा-गा के झुलुआ खेलला के कजरी खेलल कहल जाला। ई उत्तर प्रदेश अउर बिहार के प्रमुख लोकगीत ह। भोजपुरी के अलावा ई गीत मैथिली अउर मगही में भी गावल जाला। हालांकि कजरी के मुख्य क्षेत्र भोजपुरी इलाका ह।आ एहू में बनारस आ मिर्जापुर के एकर मुख्य क्षेत्र मानल जाला ‌।

कुछ विद्वान लोग कजरी के उत्पत्ति बनारस मिर्जापुर के इलाका में होखे वाली शक्ति पूजा भा गौरी पूजा से जोड़ेला। जबकि कुछ वैष्णव लोग एकरा के कृष्ण के पूजा आ लावनी से जोड़ेला। मिर्जापुर के परंपरागत लोक कलाकार लोग एकरा के विंध्यवासिनी देवी के देन माने ला।

भोजपुरी क्षेत्र में अलग-अलग मौसम मे गावल जाए वाला तरह तरह के गीत पावल जाला। जवना में कजरी के आपन एगो अलगे महत्त्व बा। कजरी गावे के मौसम बरसात के होला जब सावन के महीना में एह तरह के गीतन के गावल जाला।

कजरी के गीत गावे वाली अधिकतर नया उम्र के लइकी अउर कनिया लोग होली।एह गीतन के सावन में झुलुआ खेलत घरी दू गोला बना के गावेली लो। कजरी गीत में सावन के महीना के हरियाली, रिमझिम बरखा के फुहार, खनक, खेल-खिलवाड़, किशोरावस्था के उछाह, चंचलता, अठखेल,अउर आपस में छेड़छाड़ वाली बातचीत के सरसता झलकेला।

कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया,बदरिया घेरि आइल ननदी।तू त जात हउ अकेली, केहू संग ना सहेली। छैला रोकी लिहै तोहरी डगरिया।बदरिया घेरि आइल ननदी।

इ पारंपरिक कजरी ह एहमे ननद भउजाई के आपसी संवाद बा।जे में भउजाई ननद एक दूसरे के छेड़ तारी लो।भउजाई ननद से कहतारी कि बदरी घेरले बा तू कजरी खेले कइसे जइबू?
एक त तू अकेले जाता रु उपर से केहू संगी सहेली नइखे ,कवनो छैला राहि में रोकि लीहे त का करबू?

सावन के मौसम अउर गावे वाली के उमर के हिसाब से कजरी के गीतन में बिबिध बिषय मिलेला। गीतन में अधिकतर चंचलता आ प्रेम भरल विषय, पति पत्नी के प्रेम संवाद आ विरह वर्णन,ननद भउजाई के छेड़छाड़,सास पतोह के नोक झोंक, राधा कृष्ण के प्रेम, श्री रामचंद्र के जीवन के घटना अउर नया कनिया लोग के पति के साथ प्रेम भरल बातचीत कजरी के सबसे चलनसार विषय ह।

कजरी गावे वाली में बहुत ल इकी अइसनो होखेली जवन बियाह गौना के बाद पहला सावन में अपना नइहर रहली जेकरा वजह से वियोग रस से भरल कजरी गीत भी मिलेला। एकरा अलावे जीवन के हर बात से जुड़ल कजरी के गीत छिट फुट पावल जाला। भारत के आजादी के लडाई के घड़ी देशभक्ति वाला कजरी बहुत गावल जात रहे।जवना के सुराजी कजरी कहल जात रहे।

एकरा अलावा खेती किसानी से लेके विविध अन्य विषय के वर्णन कजरी के गीतन में मिलेला।

गीत के विधा के अलावा कजरी नाम के त्यौहार भी मनावल जाला।

ई त्यौहार भोजपुरी इलाका बुंदेलखंड में मामूली हेर-फेर के साथ मनावर जाला। सावन के पूर्णवासी के *सावनी* के साथ-साथ
*कजरी पूर्णिमा* भी कहल जाला‌।

भोजपुरी क्षेत्र में ई त्यौहार जेठ के पहिला अतवार जेकरा के परावन पूजा कहल जाला से शुरु होके भादो के अंजोरिया के बावनी दुआदसी तक ले चले ला।

एह दौरान बनारस आ मिर्जापुर में दुगोला कजरी के आयोजन भी होला।

*कजरी नवमी* आ *कजरी पूर्णिमा* के एह त्योहार के बुंदेलखंड के लोक जीवन में खास महत्व हवे।

सावन के अंजोरिया के नवमी के कजरी बोअल जाला।जे में मेहरारु लोग बाहर से माटी ले आके घर के अन्हार कोना में रख के ओमे जौ बोवेली। पूरनमासी के एही जइके लेके कजरी के जुलूस निकलेला आ सांझ के घर-घर कजरी गावल जाला।

शशि अनाड़ी (ब्यास)
बलिया

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