जो रे करोना- लघुकथा

फगुआ से कुछे दिन पहिले के बात हऽ, जाड़ अब धीरे-धीरे आपन बोरा-झोरा बान्ह के जाए के तइयारी करत रहे। मौसम में तनी तनी ठंडा रहे आ तनी तनी गर्मी भी। एही में एक रात घर के बहरी कुकुर के भूँकला से आज़िज आ के बिशेसर बाबू अपना कोठरी में से बहरा निकलनी कि तनी ताजा हवा खा लीहीं आ इहो देखीं कि कुत्तवा काहे भूँकत बा। अबहीं ऊ अपना घर के बहरी निकलबे कइले कि तबले उनकर नजर सड़क पर मुंहकुरिये गिरल आदमी पर गइल। ई देखते बिशेसर बाबू झटकारे चाल में ओकरा लगे जाके ओह आदमी के सोझ कऽ के देखे लगनी। जइसहीं ईहां के नजर ओह आदमी के मुंह पर पड़ल त ऊंहां के आँख फाटल के फाटल रह गइल।

सड़क पर गिरल ऊ आदमी आउर केहू ना ऊंहाके आपन छोट भाई फूलेसर रहले। फूलेसर के एह हाल में देखते बिशेसर बाबू सोंचे लगनी कि ई कइसे गिर गइले? आ कब से गिरल बाड़ें? एह रात के ई कंहवां से आवत रहले? आदि-आदि कइगो सवाल ऊंहां के मन में आइल। बाकि ऊ एह सभ सवालन के एक ओर छोड़के अपना भाई के निहुर के उठावे के कोशिश कइलें आ जइसहीं ऊ अपना भाई के मुंह के नियरा भइले बस भक से दारू के गंध उनका नाक में समा गइल।

फुलेसरा के मुंह से दारु के गंध मिलते बिशेसर बाबू के मुंह से निकल गइल कि “अरे फूलेसरा त दारू पियले बा। राम राम ई खानदान के नाक कटवाई। आज ले जे कोई ना कइलस, ऊ काम ई आज कऽ दिहले बा। ऊहो घरके जरी आ के ढ़िमलाइल बा। एकरा के पियले कोई देखले होई त का कहत होई”। खैर ऊ आन नाक दाबत फुलेसर के कइसहूं घर का भीतर ले गइले आ ओकरा के नीमो चटा के आ पानी के छपका मुंह पर मार के होश में ले अइलन।

बाकि फुलेसर आधा बेहोशी में बड़बड़ाये लगले। ई देख के बिशेसर बाबू ओकरा बड़बड़ईनी के धेयान से सुने लगनी। ऊ कहत रहे –“अब हमरो लगे करोना ना आई। करोना ना आई।“ ई सुनते बिशेसर बाबू आपन कपार धऽ के पीटे लगलें आ कहलें कि “जो रे करोना हमार खानदान बिगाड़ देहले”।

 

 

 

गणपति सिंह गीत

छपरा, बिहार

 

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