“हमार बबुनी “

हमनी के आजी बहुत पढ़ल लिखल त ना रहली बाकि ठेठ भोजपुरी बोलत रही , हमार गांव गंगा के किनारे बा, जब हमनी सभे गांवे जाईं जा,  त गांव के शंकर के मिठाई, लकठो ( मीठा(गुड़) से निर्मित) , बताशा, फरही, भुंजा खाईं जा , जवन स्वाद एह सभ चीझन के खाए में आवत रहे , ऊ स्वाद चाऊमिन , बर्गर, पिज्जा में कहां?

ई वाकया आज से चालीस बरिस पूर्व के बा, गरमी के छुट्टी में गांवे निकल जात रहनी हमनी सभ, ऊंहा पहुंचला के बाद हम दिन-रात धमाचौकड़ी मचावत रहीं, मस्ती में कूदत,फांनत गांव में निकल जात रहनीं, कबो आम के बगइचा में , कबो खेत में चल जात रहीं , कद्दू (कोहड़ा) तोड़ के ले आवे खातिर। गांव में का स्वादिष्ट भोजन बनत रहे ओ समय में (कद्दू- कोहड़ा की छौंकुआ सब्जी , न तेल न मसाला )

हमरा पापा से दादी बोलस — “एकर त गोड़े नइखे टिकत घर में ,जब देख त खाली घुमत रहत बिया”।

त पापा बोलस — का करे के बा छोड़s न , खेले कूदे के उमिर बा , खेले दे •••• का भइल माई । पापा के ई बात सुनी के हमार दादी कहस ” देखs बबुआ , ई अभी सेयान नइखे भइल, ” खइले पियले जवनिया हलूक, अइले गइले गोड़वा हलूक ” अपनी माई के भोजपुरी कहावत सुन पापा ठठा के हंस पड़ले , दादी के इ बतिया सुन के ओइजे बइठल हमार माइयो मुस्कुरइला बिना नाहीं रह पावल। ओ बेरा त हम दादी के एह बात के मतलब ना समुझ पवनीं। बाकिर आज जब हम एकरा तह तक गइला के बाद  समझ गइल बानी किभोजपुरी कहावत में कतना गहराई बा। आजो जब हम अपना दादी के बात याद करेनी त हमार दिल खुशगवार खुशनुमा हो जाला। स्मरणीय तथ्य गांव में ही हमनी सभन के जड़ बा ,  लोकभाषा बा , संस्कार बा, विरासत बा , धरोहर बा, जेकरा हमनी केसंभाल के रखे के बा ।

लेखिकाः अंजू ओझा , पटना।

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