कोरोना महामारी के चलते बिलखत प्रवासी मेहनतकश

**कोरोना महामारी क़े चलते बिलखत प्रवासी मेहनतकश **

ई रोटी इंसान से का का ना करवावेले एहि रोटी के पाछे आदमी कबो गिरमिटिया बनी जाला त कबो झरिया के कोइला के खाद्दान में कुछ पइसा खातिर जिनिगी के दाव पर लगा देला, त कबो दिल्ली, सूरत, मुंबई, पंजाब अउरी दुनिया जहान में छीटा जाला आपन घर परिवार के निमन जिनिगी खातिर l आफत बिपत कबो अकेले ना आवे उ अपना साथे लेले आवेला अउरी तरह तरह के समस्या । लेकिन सभकर धियान मूल समस्या की ओर जियादा रहेला ओहि के सभे तबज्जो देला ओकरा से जुड़ल समस्या के हमनीके प्राय अनदेखा क देहिनी जा भा अनजाने में हो जाला, ओइसने कुछ भइल कोरोना महामारी के चलते लॉक डाउन के घोसना से ।

महानगर में शान से खाड़ भब्य गगनचुम्बी इमारत के बनावेवाला, जेकरा मेहनत पसीना के चलते बनल घर में शान्ति से बंद होके हमनीके समय के काटतानी जा, उहे तबका जवन मेट्रो के सपना के सकार कइलस । उहे मेहनत मजूरी के आपन पूंजी मानेवाला जमात कपार पर आपन आधा अधूरा गृहस्थी के समान उठवले पैदल अपना गांव घर की और जात लउकत बाण । झुण्ड के झुण्ड जवान मर्द मेहरारू अपना बाल बुतरू के गोद में लेले बाबू माई कान्ह पर लइका माथ प गठरी आ दिल में एह समस्या से लड़े के जज्बा लेले देश के कोना कोना से अपना गांव की ओर कदम कदम बढ़त डेग । बंटवारा के बाद आजाद देश में एगो बिल्कुले नावा तस्वीर लउकता । आजादी के सत्तर साल बादो पूर्वांचल के लोग सबसे अधिका दूरी के तय करेलआपन रो मजी रोटी के जोगाड़ में । स्थानीय निवासी के हेय दृष्टि आ बरियारी के सहे के मजबूर बा अधिकांश लोग ।

22 मार्च,2030 के जनता कर्फ्यू एगो ट्रेलर रहे । कोरोना वायरस के चलते उपराइल हेल्थ इमर्जेंसी के चलते 24 मार्च से देश में 21 दिन खातिर संपूर्ण लॉकडाउन क दिहल गइल जवन 14 अप्रैल के खत्म हो गइल, लेकिन महामारी क बढ़त ग्राफ सरकार के बाध्य क दिहलस लॉकडाउन के दुसरा चरण लागू करे खातिर जेकर अवधि 19 दिन के बा अर्थात ३ मई 2020 तक । सरकार की ओर से आश्वासन भी दिहल गइल की बुनियादी जरूरत के समान के कवनो कमी ना होखे दियाई । लेकिन लागता की समाज के निचला पायदान पर खाड़ जनता के बचावे अउरी उनकरा तक मदद के भरोसा पहुंचावे में कवनो चूक रही गइल । रोज इनार खोने आ रोज पानी पिए वाला मेहनतकश मजूर तक ई आश्वासन पहुंचबे ना कइल बा पहुंचला के बादो उनकरा दिल में सरकारी वादा के प्रति बिश्वाश ना जागल । नतीजा ई भइल कि कुछ दिन बीतते उनकर हिम्मत टूट गइल । उ तबका के अब लागता की लॉकडाउन के अवधि में वे उ घर के भीतर बेमौत मर जइहन । अइसन समय में जब बस ट्रेन के आवाजाही पूरा ठप्प बा, एहीसे हजारों के संख्या में ई लोग पैदले सैकड़ों किलोमीटर के दूरी तय करे के इरादा से निकल गइल बाण जा, एह भावना के साथे की कोरोंना से बचल जाइ त भूख मार दिहि, जब मरे के बटले बा त काहें ना अपना घर जवार में जा के मरीं कम से कम अपनन के बीच मरल जाइ , ओह लोगन के बीच जा के मरल जाइ जहां हमनीके मरला पर केहुके जिनिगी प फर्क पड़ी आ आपन के कान्ह नसीब होखी मुवला के बाद ।

एह तबका के अधिकांश लोग मात्र दस से पंद्रह हजार रुपये महीना के तनख्वाह पर भा दिहाड़ी मजदूरी के बल पर महानगर में आपन जिनिगी के जियत गांव में छूटल माई बाबू आ परिजन के लगे पइसा भेजे के अघोषित नियम पर अमल करेला l जाहिर बा की ई तबका के तपस्या क के दुःख तकलीफ के झेल के जिनिगी काटे के पाछे गांव के उ परिवार-समाज बा जेकरा के छोड़के उ एहिजा रहे खातिर मजबूर बा । अइसना में ई स्वाभाविक बा कि जीवन संकट में घेरात देखि के उ अपना गांव पहुंचे खातिर अबुता गइल बा । इहे उ तड़प ह जे सडक पर सपरिवार पैदल चल रहल ओह हुजूम के आगे बढ़े खातिर ऊर्जा दे रहल बा ।

हालांकि एह पलायन से खतरा त बटले बा । लेकिन एह खतरा के कवनो परवाह नइखे लउकत भीड़ में सामील अदमी के चेहरा पर । इहो साँच बा कि सोशल डिस्टेंसिंग के एह तरह से धज्जियां उड़ावे क खमियाजा खाली एह भीड़ के ना बल्कि इनका साथे-साथ दूसरो के भी भुगते के पड़ सकता। दूसरा ओर जे एह दरद से अनभिज्ञ बा उ ई कुल के एगो गैर जिम्मेदाराना हरकत के रूप में देख रहल बा । उनकरा समझे में नइखे आवत की ई लोग काहें अपना जिनिगी के खतरा में डालत बा ? ई प्रवासी मजूरन के जीवन से एगो पहलू बा जेपर धियान अगर ना दियाई त वो लोग के साथे बहुते नाइंसाफी होइ । लेकिन बहुत मजदूर अइसन बाड़न जेकर न काम के ठिकाना बा न रहे के । एह मजदूरन खातिर लॉकडाउन जीवन-मरण के सवाल बन गइल बा। जबसे लॉकडाउन के घोषणा भइल बा , ओह दिन से उनकर सांस फूले लागल । अगर इनकरा जीवन में झांक के देखि त पता चली ना रहे के निक ठिकाना बा ना भोजन पानी के बेवस्था । सचाई इहो बा कि इहन लोग के लगे कवनो सरकारी मदद पहुंचे त कइसे, एह लोग के कवनो स्थाई ठिकाना त बा ना । बिना वजह के जनले बेवकूफी के तगमा दे दियाता लागता जइसे सभे भुला गइल बा की जवना आरामदेह घर में बइठ के कोरोना के खिलाफ लड़ाई के मजबूती दे रहल बानी ओह घर के आकार देवे वाला खाड़ करे वाला इहे लोग ह ।

समय के मांग बा प्रयोग के तौर पर ही सही, एह साल मानव श्रम के मौका दियाव । एकरा खातिर जरूरी बा कि कोरोना के खतरा के मद्देनजर सारा सावधानी क़े बरतत, आवश्यक दूरी हर हाल में बनावत, मशीन के बदले मजदूरन क़े खेती के काम में लगावल जाव । अभी ई लोग क़े काम क़े बहुते जरूरत बा । अस्थायी ठिकाना के पास कवनो गाँव बा ओहिजा अगर मजदूरन के जरूरत बा त एह लोग के काम पर लगावल जा ।

बहरहाल, सरकार के धियान आपन एह त्रुटि की ओर चल गइल बा आ भूल के सुधारे के कोशिश के शुरुआत भी हो गइल बा । हर संभव तरीके से उ लोग के बतावल जाता की सरकार के भी वो लोग के चिंता बा एहि से रहे, खाये से जुड़ल सारा व्यवस्था करे में जी जान से जुटल बा सरकारी महकमा । जे घर से निकल निकल गइल रहे आ कहीं रास्ते में रहे , उ लोग जहां बा ओहि के आसपास ठहरावे के इंतजाम हो रहल बा । सरकार के फरमान बा जे जहाँ बा ओहिजे रहो रहे खाये के जिम्मेवारी स्थानीय प्रसासन के बा । अब उ इंतजाम केतना निक भा जबून बा ओकर पाता त कुछ दिन के बादे चली , लेकिन ई जरूर राहत के बात बा कि सरकार एह दिशा में प्रयास शुरू क देले बिया । कुल्हिये काम सरकारे ना करी कुछ काम हमनियों क़े करे क़े परी, आप हम सभकर कर्तब्य बा की कम से कमआपन आस पास देखल जाव की कवनो आदमी भूखे पेट ना सुते । अगर सामर्थ्य बा त दान दिहल बहुते पूण्य के काम होइ।

✍️तारकेश्वर राय “तारक'”
गुरूग्राम, हरियाणा

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