चरमरात बेवस्था- उंखड़त साँस

चरमरात बेवस्था- उंखड़त साँस

बेशक आपन देश के पहिचान दुनियाँ जहांन में गाँवन के देश के रूप में ही बा। बाकिर आजादी के सात दशक के बादो गाँव आपन बुनियादी जरूरत चिकित्सा, शिक्षा आदि खातीर जूझ रहल बा। गोरन से त आजादी मिल गइल बाकि अपना देश के आपन लोगन के दबंगई से ना मिलल। राम राज्य के कल्पना खाली सपने बनी के रह गइल। राजनीति जनसेवा ना आपन घर भरे के साधन बनी के रह गइल बा, अधिकतर नेता जी लोग खातीर। कुछ लोग अपवाद हो सकता। सरकारी मुलाजिम में जनसेवा के भावना हइए नइखे उ लोग अपना के जनता के सेवक ना भाग्यविधाता बुझेला लोग। आम लोग के हैसियत कीड़ा मकोड़ा जइसन ही बा, आँकड़ा बनल नियति बनी के रह गइल बा। जय हो लोकतंत्र के। अब्बर के भगवाने मालिक बने।

अधिकांश आबादी के मूलभूत सुविधा रोटी, कपड़ा भेंटा जाव त बड़ भाग समझी। मकान नइखे तबो टूटल कच्चा पक्का में गुजारा होइये जाई। रोजगार मिलल भाग्यशाली के निसानी मानेला लोकमन। ऊपर से मिलल कुल्हिये सुख सुविधा सहायता जनसेवक आ अधिकारी के मिलीभगत से बंदरबांट होके,ऊपरे ऊपर हावा हो जाता। जमिनी स्तर पर खाली कोरम पूरा हो रहल बा। भ्रष्टाचार के दीमक बेवस्था के चाट रहल बा। आम आदमी पीसा रहल बा। सुनेवाला केहू नइखे, गाँव देहात खातीर कुल्हिये बिकाश के सरकारी योजना खाली कागजे में परवान चढेला जमीन पर कुछ पहुँच ही ना पावे। हवा हवाई बनके रह गइल बा कुल सरकारी योजना। भ्रष्टाचार के बरम के भेंट चढ़ जाला। शिक्षा, चिकित्सा के साधन त गूलर के फूल बा गाँव खातीर।

आज कोरोना देश मे कहर ढाह रहल बा। चिकित्सा बेवस्था के पहिलहीं कमी रहे गाँव मे अब त स्थिति अउरी भयावह हो गइल बा। मन मे चिन्ता, गाँव घर मे सन्नाटा, खाली जेब, उखड़त साँस, अस्पताल में चीख-पुकार आदमी के जियते मुआ देता। गाँव मे बाहर से आइल हुजूम के कोरोना प्रोटोकॉल ना मनला के चलते ई बीमारी गाँवन में भी आपन गोड़ तेजी से पसार रहल बा।

दवा, अस्पताल, आईसीयू बेड, ऑक्सीजन, वैक्सीन हर मोर्चा पर कमी साफ लउक रहल बा। कमी के चलते लोग चीख रहल बा चिल्ला रहल बा एकरा बादो जिनिगी से हाँथ धोवे के परता, इहे सच्चाई बा। सरकार अपना स्तर पर कोशिश के दावा करतिया लेकिन ओह कोशिश के सीमा साफ झलकता। सरकारी तंत्र लाचार असहाय लउकत बा। केहू ना सोचले रहे अइसन दिन आईं, बेवस्था भइबे ना कइल।

जीवन के लड़ाई हरला के बादो मुसीबत पाछा नइखे छोड़त। परिजन संक्रमण के डर के वजह से अन्तिम सँस्कार से मुहँ मोड़ लेतारे, बाकि कुछ लोग बा जे आजो पूरा जी जान से दुखियारी के दुख के दूर करे खातीर लागल बा। नमन बा ओह जज्बा के।

कोरोना महामारी से उपजल निराशा के बीच उम्मीद के किरण जगावे वाला जमात भी बा। खाकी के भी तेवर बदलल बा उहो दिन रात सेवा में जुटल बा, जीवनदायिनी दवाई, ऑक्सीजन से लेके अंतिम संस्कार के बेवस्था करे में दिन रात बाझल बा, ओकर ई मानवीय चेहरा अंधियारी रात में दिया जइसन उजाला कर रहल बा। जन साधारण एक दूसरा के मदद करे में लागल बा देख के उम्मीद जागता की, अभी दुनियां में अंधेर नइखे भइल। केहू अपना कार के एम्बुलेंस बना के सेवा में जुटल बा त केहू अपना लगे से धन खर्चा क के बेड ऑक्सीजन के बेवस्था में लागल बा, केहू खान पान के बेवस्था के जिम्मेदारी से निभा रहल बा। आम-खास आदमी, धार्मिक अउरी समाजिक सेवा संगठन, औद्योगिको घराना अपना स्तर पर सभे कोशिश कर रहल बा। सरकारीयो स्तर पर कोशिश हो रहल बा।

संकट के एह दौर में हर केहू अपना के लाचार महसूस करता। असमय मौत के बढ़त आँकड़ा देखी के हिम्मत जबाब दे रहल बा। मानवता के मुँह पर तमाचा बा, एह दुखद समय मे भी लोग जमाखोरी, धोखाधड़ी, कालाबजारी से बाज नइखन आवत। कहाँ भुला गइल बा मानवीय संवेदना। इंसान के अंदर छुपल भेड़ियन से सावधान रहला के जरूरत बा।

ना जाने केतना महामारी दुख तकलीफ के झेल के लड़ी के हमनीके ई बर्तमान युग मे पहुँचल बानी जा। ई दुखो ओराई सकारात्मक रही के एक दूसरा के दुख में सहायता के हाँथ बढाके ही एह दुरूह समय के काटल जाइ । हिम्मत छोड़ला के काम नइखे, साहस के दामन छोड़े के नइखे। नेक काम मे ऊपरवाला के साथ जरूर भेंटाला । साँच मन से नेक कर्म करत रहे के बा। सावधानी ही बचाव बा एकरा के भूलइलो भुलाये के काम नइखे।

तारकेश्वर राय “तारक”
गुरुग्राम, हरियाणा

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