‘सूपवा बोले त बोले चलनियों बोले, जेम्मे बाटे बहत्तर छेद’

भोजपुरी साहित्य के सुप्रसिद्ध पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के  संपादक, सुप्रसिद्ध साहित्यकार, व्यंग्यकार के संगे संगे भोजपुरी भाषा के प्रखर पैरोकार श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी उर्फ जे.पी.भइया के लिखल एगो टटका व्यंग रचना के पढ़ीं आ भोजपुरिया बधार में उपस्थित लक्षणा आ व्यंजना के आनंद उठाईं।

का जमाना आ गयो भाया,जेने देखी, भउका भर-भर के गियान बघारल जा रहल बा। गियान बघारे का फेरा में दरोगा, सिपाही से लेके जेब कतरा आ चोरन के सरदारो तक लागल बा लो। अपना लोक में एगो कहाउत पुरनिया लोग क़हत ना अघालें कि ‘सूपवा बोले त बोले चलनियों बोले, जेम्मे बाटे बहत्तर छेद’, एह घरी छेदहिया चलनियों गियान बघारे में लागल बिया। जेकरा में बहत्तर छेद बा, उहे आजु बृहत्तर देखात बा।  ई कुल्हि देख-सुन के मनराखन पांडे के खोपड़िया के चकरघिन्नी बन गइल बा।  कबों एने कबों ओने घुरियात फिर रहल बाड़ें। केकरा के नीमन आ केकरा के बाउर बोलें, उनुका बुझाते नइखे। आ बुझाव कइसे, काल्हु तलक जे मुँह लुकववले डोलत रहल ह,उहो आज दूध के धोवल बनि के मुसुकी मारि रहल बा। गियान उहो बघार रहल बा,जेकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चोरकटई में सरनाम रहल बा। ई देखि के मन आउर खटउर हो गइल कि अबले जे उनुका तरवा चाटत रहल बा, उहो उनही के गरियावत देखात बा।    एगो मड़ई लगा के चिरकुटवा के चउधरी बने के चस्का लाग गइल बा। भलही सिवाने गोड़ राखे भर ठीहा न होखे, खेत-बारी के कवन बात करल जाव। चिरकुटवा अपना संगे 2-4 गो नीमन लोगन के हथजोरिया क के जुटा लेले बा। जेकरा केहुओ पुछनिहार ना होखेला उ लो त अपनही लिहो-लिहो क के जुट जाला। मने रंगवा सियरो हुआं-हुआं करत घुरियाइल बाड़न स। रंगवा सियरा उहे ह जवना के इहाँ के चोथल-बिटोरल आ एने-ओने से छीन-झपट के दोसरा के चिजुइयन के आपन कहे आ बरियारी सियरन के मुखिया बने के पुरान सवख ह। कतनी बेर बारीस भइला पर ओकर रंग उतर गइल बाटे, बाकि गंव लगते केनियों से रंग में नहा के फेरु दाँत चियरले आइये जाला।

राजनीति के मौसम में रंगवा सियार त ढेर लउकेले सन आ बेंग लेखा एनी-ओनी फुदुकबो करेले सन। कब कवना के अतमा जागि जाले, पते ना लागेला। जवना पाटी में हीं-हीं दादी करत,जूठन चाटत, गुणगान करत नाही अघालें, अगिला दिने  अलगा चोला पहिर के ओह पाटी के कोसत भेंटालें, त सुननिहार तुरते कही देवेलन कि बुझाता उहवाँ टिकस ना मिलल होई आ इहाँ मिल गइल। मने जहवाँ चाटे आ लूटे के जोगाड़ उहे नीमन आ बाकी सब बाउर। ई बेमरिया राजनीति से होत पहिलही से साहित्य में पइस गइल बा आ जहां-तहाँ लउके लागल बा। एही से मनरखना के खोपड़िया गरमाइल बा। अब ई बाति मनराखने तक नइखे रह गइल, सभे लउके लागल बा। जेकरा के लोग गम्हीर बुझत रहल ह, उहो चटकारा ले ले चासनी चाट रहल बा। बाति से बाति निकरे ले त ढेर दूर तलक ले जाले। राज मिस्तिरी से कंप्यूटर के प्रोग्राम लिखवाइब त लोगन के नीमन त नहिए नु लागी। बाकि आजु-काल्हु इहे हो रहल बा। सभे आपन-आपन सांतर-बेंवत देखत बा आ अपनन के जोगाड़ लगावत बा। भलही ओकरा नकभेभनी पोंछे के सहुर होखे भा ना होखे।

चिरकुटवा जब तक नोकरी करत रहे, लोग कहेला कि कबों  नीमन से आपन काम ना कइले होखी। गरे में भुक-भुकवा लटकवले एने-ओने घूमत रहे। अपना अधिकारी के ले-देके पटवले रहे। एह घरी चिरकुटवा रिटायर हो गइल बा, खलिहर बा। कहे वाला त इहाँ ले कहेलन कि चिरकुटवा पुरान गिरोहबाज ह। पहिले एगो गिरोह में रहे, जवना गिरोह के लोग एक दिन केकरो गरियावेलन आ अगिला दिने ओकर तरवा सुहरावेलन।  फेर मड़ई छावल  आ ओहमें पाछे से लुकारी लगा के चरचा में बनल रहला के नीमन उपाय लागल, त चिरकुटवा उहे कर रहल बा। चिरकुटवा के ढेर लोग एजेंडाबाज कहेलन आ लागबो करेला। ओकरा से अकल के बाति त मतिए करी, न पहिले रहे न अब ले भइल। एक जना त इहाँ ले क़हत रहलें कि ओकरा के अकलदाढ़ उगबे ना कइल। बाकि चिरकुटवा अपना के सभेले बेसी अक्किलदार बुझेला। अपनही लेखा कुछ अक्किलदार लोगन के जुटावेला आ फेरु दोसरा के फिरकी लेला। ओकरा चक्कर में कई बेर नीमनों लोग फँस जाला, छपिटाला आ बाद में पछतइबो करेला।

एह घरी चिरकुटवा एगो नया एजेंडा लेके आइल बा।अपनही लेखा कुछ लोगन के जोड़ के एजेंडा चला रहल बा। चिरकुटवा के एगो नया संघतिया मंगरुवा जवन अपना के सभेले बेसी  सभ चीजु के बिदवान बुझेला,उहो ओकरा संगे लागल बा। छपास आ देखास के बेमारी ओकरा भितरी ढेर गहिराहे ले पइसल बा। एह घरी मंगरुवा के हुआं में चिरकुटवा आपन हुआं जम के मिला रहल बा। ई दूनों मिलके ओह लोगन का खिलाफ एजेंडा चला रहल बा,जे कबों मंगरुवा के घास ना डालस। एह घरी दूनों मिलके कुछ लोगन मने एगो जाति विशेष के लोगन का खिलाफ एजेंडा चला रहल बा भा कहीं कुछ लोग एहनी दूनों से मिल के आपन-आपन भड़ास निकाल रहल बाड़न।अपने मनही अपना के सबसे बड़का सोचनिहार बूझ रहल बाड़न। ई साबित करे के कोसिस हो रहल बा कि बस एही जात के लोग साहित्य के चोरी करेला भा नीमन से ना परोसेला आ बाकि सभे दूध के धोवल बा। सावन के आन्हर बरहो महीना हरियरी देखेलन,ओहनी के आउर कुछ ना लउके मने सावन फागुन के मिलन समारोहवा तक ले।  रेफरेंस के बाति बढ़-चढ़ के करे वाला लो, दोसरका के लिखलका बाँचे में ना लजालें आ ओकर रेफरेंसों ना देवेलन बाकि गियान जरूर बघारेलन। कई गो लमहर लिखनिहार गजलगो दु-चार गो शबद बदलिके गुरुजी आ बाबूजी बनल फिरेलन बाकि केकरो के ना लउकेलन, विशेषकर मंगरुवा आ चिरकुटवा के त एकदम्मे ना लउकेलन। अइसनका ढेर दुलरुवा जी ,बाबूजी,भइया जी, बबुआ जी आ बहिन जी लोग बा,जे चिरकुटवा के लउकबे ना करे। अब बताईं भला मनरखना के खोपड़िया गरम होखी कि ना। अब ई बतिया रउरा करेजा में धक्क ले लागल होखे भा लागे, त पहिले आपन करेजा सँभारी आ फेर सभे ई कुल्हि देखत-सुनत आ गुनत-गिनत आ आपन कपार पीटत रहीं,मनराखन धइलें आपन रसता।

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
गाजियाबाद

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