‘सूपवा बोले त बोले चलनियों बोले, जेम्मे बाटे बहत्तर छेद’

भोजपुरी साहित्य के सुप्रसिद्ध पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के  संपादक, सुप्रसिद्ध साहित्यकार, व्यंग्यकार के संगे संगे भोजपुरी भाषा के प्रखर पैरोकार श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी उर्फ जे.पी.भइया के लिखल एगो टटका व्यंग रचना के पढ़ीं आ भोजपुरिया बधार में उपस्थित लक्षणा आ व्यंजना के आनंद उठाईं। का जमाना आ गयो भाया,जेने देखी, भउका भर-भर के गियान बघारल जा रहल बा। गियान बघारे का फेरा में दरोगा, सिपाही से लेके जेब कतरा आ चोरन के सरदारो तक लागल बा लो। अपना लोक में एगो कहाउत पुरनिया लोग क़हत ना अघालें कि…

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विजयादशमी : एगो समूहवाची अभिव्यक्ति

विजयादशमी पर्व शक्ति के पर्व ह। एगो अइसन शक्ति जवन अन्याय के विरोध आ न्याय के साथ देवे। एही विजयादशमी पर्व पर भोजपुरी समय पर पढ़ीं भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार आ विद्वान श्री परिचय दास जी के लिखल ई भोजपुरी ललित निबंध  “विजयादशमी: एगो समूहवाची अभिव्यक्ति” विजयादशमी शक्ति क उत्सव ह , मंगल क हेतु. कइसन शक्ति ? जवन अन्याय क प्रतिरोध करे, जवन निर्बल के संबल दे. जवन करुना के समन्वित क के पुरुषार्थ के आधार बनावे. ‘ जे लरै दीन के हेत सूरा सोई ‘ . हर केहू…

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भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता में बाधा काहे- हृषिकेश चतुर्वेदी

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता पर आईं पढ़ल जाव भोजपुरी के विद्वान श्री हृषिकेश चतुर्वेदी जी के ई आलेख: सजाऊंगा लुटकर भी तेरे बदन की डाली को:- जगन्नाथ जी के किताब ‘भोजपुरी गजल के विकास यात्रा ‘ पढत घरी एगो बात जगन्नाथ जी के लिखल पढे के मिलल ह। उहाँ के लिखत बानी कि — “तेग अली ‘तेग’ के बाद भोजपुरी गजल तकरीबन 40-50 साल के शुन्यता से गुजरल । दरअसल इ जमाना हिन्दी निर्माण के रहे । सबका एके धुन एके निसा सवार रहे कि केह तरे हिन्दी के समुन्नत…

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रामनाथ पांडेय के पुण्यतिथि पर ऑनलाइन कवि सम्मेलन में बहल काव्य रसधार

भोजपुरी समय, धर्मेंद्र पाण्डेय, छपराः भोजपुरी के पहला उपन्यासकार आ सुप्रसिद्धभोजपुरी साहित्यकार स्वर्गीय रामनाथ पांडेय के पुण्यतिथि पर सारण भोजपुरिया समाज के संगे-संगे भोजपुरी भाषा के सेवा में लागल तमाम संस्था अपना अपना स्तर पर ऑनलाइन कार्यक्रम के आयोजन कइली सं। एही क्रम में सारण भोजपुरिया समाज के संस्थापक बिमलेंदु पांडेय बतवनी कि संस्था के द्वारा रामनाथ पांडेयजी के निवास स्थान पर एगो श्रद्धांजलि सभा के आयोजन कइल गइल रहल हऽ जहां श्रद्धांजलि दिहला के बाद पांडेयजी के निवास स्थान से दिवाकर उपाध्याय आ लोकगायक शैलेश समदर्शी अपना निर्गुण गीतन…

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जो रे करोना- लघुकथा

फगुआ से कुछे दिन पहिले के बात हऽ, जाड़ अब धीरे-धीरे आपन बोरा-झोरा बान्ह के जाए के तइयारी करत रहे। मौसम में तनी तनी ठंडा रहे आ तनी तनी गर्मी भी। एही में एक रात घर के बहरी कुकुर के भूँकला से आज़िज आ के बिशेसर बाबू अपना कोठरी में से बहरा निकलनी कि तनी ताजा हवा खा लीहीं आ इहो देखीं कि कुत्तवा काहे भूँकत बा। अबहीं ऊ अपना घर के बहरी निकलबे कइले कि तबले उनकर नजर सड़क पर मुंहकुरिये गिरल आदमी पर गइल। ई देखते बिशेसर बाबू…

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भोजपुरी भाषा जागरण के अग्रदूत रामनाथ पांडेय। – डॉ०जौहर शफियाबादी

भोजपुरी भाषा के पहिला उपन्यासकार स्वर्गीय पं रामनाथ पांडेय के आज पुण्यतिथि बा। आजुए साल 2006 में ऊंहां के एह संसार से विदा लिहले रहनी। आज ऊंहा के पुण्यतिथि पर भोजपुरी आ हिन्दी के संगे संगे उर्दू के विद्वान सुप्रसिद्ध साहित्यकार गज़लकार आ डॉ डॉ. पी.एन. सिंह कॉलेज छपरा में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. जौहर शफियाबादी जी अपना लेखनी से आदरणीय पांडेय जी के आपन श्रद्धांजलि अर्पित कर रहल बानी। भोजपुरी भाषा जागरण के अग्रदूत रामनाथ पांडेय। (डॉ०जौहर शफियाबादी) भोजपुरी गद्य साहित्य के नया दशा-दिशा प्रदान करे वाला भोजपुरी के पहिला…

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टूट गइल कंठी माला

ओह दिन एतवार रहे, आ हरमेशा खा-पीके आराम करत रहनी कि अचानके एगो फोन आईल। जब हम देखनी कि ई हमार एगो खास करीबी मने नाता के भतीजा के फोन बा त ओकर नंबर मोबाइल पर देखके हम ओकरा से बात करे के शुरू कइनी। हमनी चाचा-भतिजा में सर-समाचार भइल तले बात बतकही के बीचे ऊ कहलस कि “चाचा हम छठा महिना में बियाह करतानी”। ई सुनते हमार आंख कान आ मुंह खुलल के खुलल रह गइल। हमरा लागल कि हम कवनो सपना देखऽतानी का भाई? एह से हम पट…

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भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

लॉकडाउन के दौरान घर में बइठल बइठल रउआ मन में भी कुछ भाव आवत होखी, जवना के रउआ कविता के रुप में कागज भा लैपटॉप या मोबाइल पर लिखत होखेब। आ अगर रउआ एह में कहीं कवनो परेशानी बा आ चाहे कविता कइसे लिखल जाओ, कविता में बिम्ब के प्रयोग कइसे होखे कि ऊ आउर सुघर बन जाओ। त रउआ खातिर ही ई पोस्ट बा जवन लिखले बानी भोजपुरी के विद्वान आ लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर में भोजपुरी भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष आदरणीय डॉ. श्री जयकांत सिंह ‘जय’ त पढ़ीं…

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महापंडित राहुल सांकृत्यायन

ई दुनिया बड़ बे; बहुत बड़ औरी एतहत बड़हन दुनिया में जाने केतने लोग बाड़ें औरी जाने केतने लोग पहिलहूँ ए दुनिया में रहल बाड़ें लेकिन कुछ नाँव लोगन के मन में ए तरे घुस जाला कि ओकरा खाती समय के केवनो मतलब ना रह जाला। औरी ओह हाल में बकत आपन हाथ-गोड़ तुरि के बइठ जाला। चुपचाप। अइसन लोगन क नाँव औरी काम एक पीढी से दूसरकी पीढी ले बिना केवनो हील-हौल पहुँच जाला। कुछ अइसने लोगन में एगो नाम बा महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जी कऽ जिनकर साहित्य में…

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