भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता में बाधा काहे- हृषिकेश चतुर्वेदी

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता पर आईं पढ़ल जाव भोजपुरी के विद्वान श्री हृषिकेश चतुर्वेदी जी के ई आलेख:

सजाऊंगा लुटकर भी तेरे बदन की डाली को:-

जगन्नाथ जी के किताब ‘भोजपुरी गजल के विकास यात्रा ‘ पढत घरी एगो बात जगन्नाथ जी के लिखल पढे के मिलल ह। उहाँ के लिखत बानी कि —

“तेग अली ‘तेग’ के बाद भोजपुरी गजल तकरीबन 40-50 साल के शुन्यता से गुजरल । दरअसल इ जमाना हिन्दी निर्माण के रहे । सबका एके धुन एके निसा सवार रहे कि केह तरे हिन्दी के समुन्नत कइल जाउ । एहि से भोजपुरी लेखन पुर्णतया उपेक्षित रहल। “

हम कबो कबो सोचेनी कि देवाक्षर चरित, बदमाश दर्पण, बिरहा नायिका भेद सन् 1900 से पहिले आ गइल रहे , एगो नाटक रहे एगो गजल रहे आ एगो काव्य संग्रह रहे फेरु अइसन का हो गइल कि भोजपुरी में धुंआधार रचना भइला के बादो ओतना लाइमलाइट में ना आइल ? गजल में त बहुत लम्बा समय ले सन्नाटा रहे बाकिर अउरी क्षेत्र में ओतना लाइम लाइट ना मिलल जबकि बटोहिया, फिरंगिया, बिदेसिया से ले के असंख्य रचना भोजपुरी में एह दौरान मिलल।

कतना दुःखद बात बा कि एगो भाषा जवना के लमहर आ पुरहर इतिहास बा ओह भाषा (भोजपुरी ) के लोग आपन मय लगा दिहल एगो भाषा (हिन्दी) के सजावे सरिहारे में आ आज ओह सजल संवरल भाषा के कमाई खाए वाला लोग, आज भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के नाव प झुठ प झुठ लिख रहल बा ?

ना खाली तथ्यात्मक झुठ लिखा रहल बा बलुक फ्राडगिरी हो रहल बा हिन्दी के नाव पर आ इहे ना , हिन्दी के बाघ कहि के हिंसको बना रहल बाड़न स जबकि भोजपुरी के बकरी कहि के उसुका रहल बाड़न स । बिल्कुल जवन खप खपा दिहल गइल उ खप-खपा दिहल गइल बाकिर आज भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता पुरहर विकास आ बेहतर बनावे खातिर भोजपुरिया लोगन के मांग पर काहें कुछ लोगन के मांग धोआ जाता ?

सुप्रसिद्ध हिंदी आ भोजपुरी साहित्यकार स्व. डॉ. विवेकी राय जी लिखत बानी कि “एह भाषा ( भोजपुरी ) में जतना पत्र-पत्रिका किताब आदि के प्रकाशन हो रहल बा उ अव्यावसायिक रुप से विशुद्ध सेवा-भाव से हो रहल बा । दुसर बात कि कइ गो सरकारी मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय भाषा के तुलना में गुणात्मक, गरिमा से भरल, परिमाण विस्तार बेसी बा। अलग अलग विषयन पर नाना प्रकार के दर्जनन गो से बेसी पत्र पत्रिका आ कइ हजार किताबिन के प्रकाशन एह भाषा के जीवंतता के देखा रहल बा। एहि जीवन शक्ति प आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी एह भाषा के “सोगहग भाषा” कहले बानी त डॉ. शिव प्रसाद सिंह जी “कड़ेर भाषा” कहले बानी। “

बांस बहुत लचीला होला, बहुत कड़ेर होला आ बांस सोगहग भी होला। भोजपुरिया क्षेत्र में बांस के लउर , बांस के बीचे गेल्ह के चीकन करेला। ओह लाठी पर भोजपुरिया लोग करुआ तेल चीखावत रहेला। ग्रियर्सन ओहि लाठी के भाषा के बात अपना ऐतिहासिक रिसर्च में कइले बा‌ड़े।

जब अतना कुल्ह आंखि के सोझा बा तबो खुलेआम बेईमानी काहें हो रहल बा ? आखिर कब ले लोग गुंगी कछा के रही ? कब ले रसरी आई जाई आ आपन चिन्हासी छोड़त रही ? का भोजपुरी के करम जिनगी भर रगराये के बा ? का भोजपुरी के नावे हिन्दी के सजावे संवारे के ही लिखाइल बा ? इ त करम फूटल कहाई नू ?

भोजपुरी आ हिंदी के विद्वान मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध’ जी अपना किताब में लिखले बानी कि “भोजपुरी लोककथाओ की तुलना हम वैदिक उपाख्यानो से कर सकते हैं । बहुत संभव है कि वैदिक उपाख्यानो की उत्पति इन लोककथाओ से हुई हो । भोजपुरी लोककथाओ में गद्य-पद्यमय चम्पूशैली वैदिक उपाख्यानो का ही अनुकरण है।”

का एह कुल्ह तथ्यन के तोपि दिहल जाउ ? का जवन सोझा आ रहल बा लउकत बा ओह से मुह फेर लिहल जाउ ? सवाल नया घर बनावे के नइखे , सवाल बा कि जवन हवेली , कई मंजिला इमारत खाड़ भइल बिआ एह के ढाहि दिहल जाउ ? इ त भोजपुरिय लोगन के सोचे के बा। आखिर उ लो भोजपुरी के कहाँ देखल चाहत बा लो ? भोजपुरी के नाव प पिंडा पारल चाहत बा लो कि भोजपुरी के विरोध करे वाला सोच के पिंडा पारल चाहत बा लो।

 

 

 

 

 

-हृषिकेश चतुर्वेदी

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