भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

लॉकडाउन के दौरान घर में बइठल बइठल रउआ मन में भी कुछ भाव आवत होखी, जवना के रउआ कविता के रुप में कागज भा लैपटॉप या मोबाइल पर लिखत होखेब। आ अगर रउआ एह में कहीं कवनो परेशानी बा आ चाहे कविता कइसे लिखल जाओ, कविता में बिम्ब के प्रयोग कइसे होखे कि ऊ आउर सुघर बन जाओ। त रउआ खातिर ही ई पोस्ट बा जवन लिखले बानी भोजपुरी के विद्वान आ लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर में भोजपुरी भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष आदरणीय डॉ. श्री जयकांत सिंह ‘जय’ त पढ़ीं आ आपन प्रतिक्रिया जरूर दिहीं।

भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

अभिव्यक्ति का प्रक्रिया में सत्य विलोपित हो जाला। ओकरा के कहल ना जा सके, सम्प्रेषित कइल जा सकेला। एकरे के पच्छिम के विद्वान लारिंस डरेल अपना भासा में कहलें कि ‘ टूथ डिसेपियर्स विथ द टेलिंग ऑफ इट। इट कैन वोनली बी कन्वेड नॉट स्टेटेड। ‘ सत्य के प्रकृति बड़ी बारीक होला। एही से कला में अमूर्त्तन व्यापार के चलन भइल। अमूर्त्तन का गहराई के अनुपात में सामाजिक सक्रिय सहभोग जरूरी ह। जहँवा अमूर्त्तन आ सहभोग का बीचे फांक रह जाई, उहँवा कविता के सत्य निष्क्रिय हो जाई। बेजान पड़ जाई। एही से अज्ञेय कहलें कि ‘ शब्द अधूरे हैं, क्योंकि उच्चारण माँगते हैं। ‘ उचारन मतलब प्रेषणीयता। ई प्रेषणीयता कविता के अनिवार्य शर्त्त ह। बिना एकरा कवनो कविता बेजान-परान के खाली शब्द भर बन के कठुआइल रही। कविता का भाव-बोध के सवाद, साधारणीकरण खातिर शब्द के उचारन देवे के पड़ी। विविध संदर्भन के देवे के पड़ी। एह से कि कविता में शब्द आपन प्रमुख अर्थ परोसेला। अर्थ के सउँसे सम्भावना जहँवा ना खुली, उहँवा सउँसे अर्थ शक्ति अँखुअइबे ना करी। शब्द के उचारने ना मिली।
कविता के भासा गद्य के भासा से अलग होला। बोलचाल के भासा गद्य भासा से इतर होला। एने आके भोजपुरी साहित्य में काव्य भासा के संजोजन हो रहल बा। बाकिर बहुत लोग आ खास करके मंचीय जोकरनुमा तुक्कड़ कवि के नाम पर बोलचाल के भासा में तुक भरके बेतुका काम करत भोजपुरी काव्य परम्परा के मोल-मरजाद माटी में मिला देलें ; जइसे –

‘सुअरी बिआन बाटे गीलू गीलू
बाल बाचा होख ता पीलू पीलू
तबहूँ तूं बोलत बाड़ ईलू ईलू।’

बोलचाल का एह तूक्कड़ई भा तुकबंदी से काव्य भासा ना उभर सके। बोलचाल के भासा सामान्य भासा होला। गद्य के भासा में साहित्यिक तरास आ जाला। भासा के प्रमुख अर्थ चरम व्याकृत काव्य भासा में होला। एह बोलचाल का तुकबंदी से भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान के संघटना ना हो सके। गद्य आ काव्य के भासा में फरक होला। कविता के भासा में बिम्ब-विधान के भइल जरूरी होला। बिम्ब योजना काव्य भासा आ कविता के सिंगार ह। कविता के भासा पढ़निहार चाहे सुननिहार के मन में बिम्ब मतलब भाव-छवि/चित्र उरेहेला। उहे भाव चित्र जवन कवि अपना हिरदय में भावात्मक ढ़ाँचा के रूप में सजवले बा। जवना के पूरहर उचारन देके सजवले बा।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘ कविता क्या है ‘ शीर्षक निबंध में बतवले बाड़न कि कविता में बोध के दूगो स्तर प्राप्त होला। मतलब कि कविता पढ़ला भा सुनला से पढ़निहार भा सुननिहार का अर्थ ग्रहण होला कि बिम्ब ग्रहण। अर्थ ग्रहण मतलब खाली सूचना। अभिधात्मक बरनन से खाली अर्थ ग्रहण मात्र बरनन ह, जवना से सहज संकेतिक अर्थ उजागर होला। बिम्ब ग्रहण से काव्य भासा के पूरा-पूरा दोहन होला। शब्द का भीतर के सम्भावित अर्थ शक्ति के निचोड़ के गाड़ दिहल जाला। बिम्ब ग्रहण में कवि एकरा से एगो अइसन भाव चित्र उरेहेला जवन सउँसे संश्लिष्ट होला। काव्य भासा के माध्यम से एगो भाव छवि के सोबरन आख्यान हो जाला। ई भाव छवि प्रत्यक्ष चित्र से अलग होखेला।
संवेदना के जमीन पर कवि के मन में उपजल भाव चित्र के उजागर करेके बेंवत एही बिम्ब में होई कांहेकि बिम्ब सोबरन-सउँस होला, संश्लिष्ट होला, अपना सउँसे परिवेश का संगे हाजिर होला। एही बिम्ब भा भावचित्र के सम्प्रेषण आ साधारणीकरण कवि के मूल काम ह। एजरा पाउंड ठीके कहले बाड़न कि ‘ सउँसे जिनगी में एगो भावचित्र के निरमान कर सकल, कहीं नीमन बा मोट- मोट ग्रंथ लिखे का तुलना में। ‘
अंगरेजी में बिम्ब भा भावछवि के समानार्थी शब्द ‘ इमेज ‘ के बेवहार होला। इमेज माने बिम्ब आ इमेजरी माने बिम्बमाला। भावचित्र में कवि प्रतीक का रूढ़ परिवेश के खंडित करके जरूरी आ इच्छित परिवेश के रचना करेला। सामान्य शब्द से प्रतीक रचना होई आ प्रतीक के रूढ़ि खंडित क के भावचित्र के संरचना होला। प्रतीक के माध्यम से आंशिक भाव तत्त्व उरेहल जा सकेला। भावचित्र भा बिम्ब में कवि प्रतीक के ध्वस्त क के भावचित्र के रूप में अपना परिवेश के रचना करेला। प्रतीक आ भावचित्र के फरक उपमा आ रूपक के माध्यम से समुझल जा सकेला। उपमा में समग्र स्थिति के कवनो एगो खास अंश के तुलना प्रस्तुत कइल जाला जबकि रूपक में सउँस समग्र स्थिति के अंकन अपेक्षित परिवेश का संगे होला। रूपक के जइसन बिम्ब में आरोपन ना होखे। बिम्ब रूपक के तरह सउँसे स्थिति के आलेखन करेला। बिम्ब के उदय कवि के गहन अनुभूति के छन में होला। एही से कहल जाला कि बिम्ब विधान कविता के अनिवार्य तत्त्व ह।
प्रतीको से भाव समृद्ध होला। प्रतीक का भीतर के संभावना उजागर कइला पर ऊ बिम्ब मतलब भावचित्र में बदल जाला। इहे कवि के सफलता ह। बाकिर जहँवा कवि में असमर्थता बा ओहिजा प्रतीक भा मोटिभ भर बनके रह जाला। प्रतीक आ भावचित्र के संरचना के दिशा एक तरह से होई शब्द संदर्भ- प्रतीक, भावचित्र चाहे कथानक रूढ़ि काव्य भासा, मतलब कि भावचित्र चाहे बिम्ब में एक शब्द से सउँसे स्थिति आ परिवेश सामने आ जाला। संवेदना के धरातल पर बिम्ब संरचना संभव बा। बिम्बे कविता के केन्द्रीय तत्त्व ह। भावचित्र का संगठन के आधार पर कवि के सफलता-असफलता के आंकल जा सकेला।
भोजपुरी भासा में काव्य भासा रचा रहल बा। लोक साहित्य आ शिष्ट साहित्य में बहुत अन्तर होला। दूनों के अन्तर भासा प्रयोग के विभिन्नता में झलकेला। लोक साहित्य में सृजनात्मक ( क्रियेटिव) ना होखे। लोक कवि भा गायक भावचित्र के संघटन ना कर सके। लोक साहित्य में दैनिक बोलचाल के भासा बेवहार में आवेला। इहँवा शब्दन के अर्थ निचोड़े के प्रक्रिया गौण रूप में बा। एही से राम स्वरूप चतुर्वेदी कहत बाड़ें कि ‘ लोकगीतों की सरसता गायक के कंठ में होती है, मुद्रित रूप में वे अपना प्रायः समूचा प्रभाव खो बैठते हैं। ‘ (भाषा और संवेदना, पन्ना -42 )
भोजपुरी साहित्य में काव्य रचना बहुत ढ़ंग से हो रहल बा। एकरा बिम्ब विधानन के देखि के अचरज होला। आईं, भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान के विश्लेषण खातिर कुछ कविलोग के कविता में झांकल जाव। उनइसवां सदी के पूर्वार्ध में कासी के मुसलमान कवि तेग अली तेग ‘ बदमास दरपन ‘ लिखलें। लाला भगवान दीन के अनुसार, ‘ काव्य का बहुत प्रौढ़ रूप ‘ बदमास दरपन ‘ में व्यक्त किया गया है।( भोजपुरी के कवि और काव्य – दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह; पन्ना- 136) । बदमास दरपन में बिम्ब के कहीं कहीं आलेख उभरल बा। आँखि में सुरमा लगावल सिंगार के आयोजन ह। सोरहा सिंगार में एगो सिंगार आँखि में काजर भा सुरमा लगावल ह

कहली के काहे आँखी में सुरमा लगावल,
हँस के कहलें छुरी के पत्थर चटाइला।

एह शेर में अलंकार के योजना त बड़ले बा, आँखि में सुरमा के सिंगार ओही तरह के बा जइसे पत्थर पर छुरी के धार तेज कइल जाए। मतलब कि नजरिया पर सान चढ़ावे खातिर आँखि में सुरमा लगालव गइल। एह भाव के उजागर करे खातिर छुरी आ पत्थर के बिम्ब रचल गइल बा। छुरी पत्थर चटवला के बाद तेज-तरक हो जाला। एगो दोसर शेर देखीं

पुतरी मतिन रक्खब तुहे पलकन के आड़ में।
तोहरे बदे हम आँखी में बइठक बनाइला।

एहिजा आँखी में बइठक बनावे का शब्द- योजना से भावचित्र रचाइल बा। बइठक ऊ होला जहँवा पुरुष वर्ग के बइठकी होए। अपना प्रिय के पुतरी के तरह पलकन के आड़ में छूपा लेवे के काव्य संवेदना आँखी में बइठक बनाइला शब्द से बिम्बित हो जाता। एकरा माध्यम से कवि प्रिय के प्रति आपन अनन्य प्रेम भाव प्रकट कर ता। प्रिय के सुरक्षित राखे के अपूर्व भावना एह बिम्ब में झलक ता।
बाबू रामकृष्ण वर्मा ‘ बलवीर ‘ के नायिका रूप का भार से लदाइल बिआ। अपरूप रूप के बड़ा मनोहर बरनन बलवीर जी कइले बाड़न। जोबन के बोझ से दबल नायिका के देह यौवन ओइसहीं झलमल कर तिआ; जइसे चकवा के देहयष्ठि। एकरा के एगो बिम्ब से ऊ कइसे प्रकट करत बाड़ें

चकवा सरिस तोरा जोबना लसत देह,
दीपे मानो सोना के मसाल।

नायिका के सुन्दर कंचन काया के अभिव्यक्ति सोना के मसाल से कइले बाड़ें। एह बिम्ब में सब ओर सौन्दर्य झलक ता। सोना के मसाल, ओकरा में के जोति सब नायिका का उपटल जवानी के अभिव्यक्त करे में सक्षम बा।
भोजपुरी के सुख्यात कवि भिखारी ठाकुर का कविता में कहीं कहीं बिम्ब उतर आइल बा

अमवाँ मोजरि गइलें लगलें टिकोरवा से
दिन-पर-दिन पियराय रे विदेसिया।
एक दिन बहि जइहें जुलुमी बेयरिया से
डाढ़-पात जइहें भहराय रे विदेसिया।

भिखारी ठाकुर का नायिका के यौवन मोजरा गइल बा। ओकरा में टिकोढ़ो लाग गइल बा। नायिका के जवानी के आवाई पति का अभाव में अपूर्व सांसत में पड़ल बा। आम, मोजर, टिकोढ़ा, आम के पिअराइल, जुलुमी बेयार के बहल आ ओकरा जोर से डाढ़-पात के भहराय के बिम्ब रचल गइल बा। नायिका प्यारी सुन्दरी किशोरावस्था के देहरी लांघ के यौवन के ओर अग्रसर भइल। ओकर यौवन ओही तरह से दिन-पर-दिन पिअराय लागल, जइसे टिकोढ़ा आम के गाछ पर अपना चरम विकासावस्था में पहुँच के पियराय लागेला। एह पिअराय में नायिका का सोबरन सोनहुला काया के बिम्ब भी झलकता। जदि एह कंचन काया पर उतरल यौवन के भोग पति विदेसी के द्वारा ना होई, पति के द्वारा यौवन सुरक्षित ना रह पाई त जुलुमी बेयार यौवन का आम के गाछ पर लटकल रसाह गोपी आम टूट -भहराके गिर जाई। यौवन के सोगहग स्वरुप छितरा जाई।
एह बिम्ब का माध्यम से भिखारी नायिका का मन के बेदना उजागर करत बाड़न। जवन यौवन आ उत्फुल्ल कंचन काया विकसित भइल बा ऊ प्रियतम के समर्पित बा, निवेदित बा। जदि समय से प्रियतम ना आ सकलें त बाहरी असामाजिक तत्त्व एह यौवन के उपभोग कर लीहें चाहे ई व्यर्थ चल जाई, अकारथ हो जाई। यौवन का विकास के बहुते मजबूत बिम्ब भिखारी ठाकुर का एह रचना में उतरल-उभरल बा। भिखारी द्वारा प्रस्तुत एगो रसाह बिम्ब के साक्षात्कार करीं

तोर नयना गोरी बुनिया मिठाई,
तनी हेनियो चलइहे हमार किरिये।

नायिका के कटाक्ष कटारी के रसमय मार बुनिया मिठाई के रस में डूबल बा। एह रसमय बिम्ब से हर हिरदय के संवेदना जुड़ा जाई, अघा जाई।
भोजपुरी रतन डॉ. राम विचार पाण्डेय के ‘अँजोरिया’ कविता अपने आप में सुप्रसिद्ध बा। पाण्डेय जी एकरा में अद्भुत बिम्ब रचले बाड़न। कृस्न आ राधिका का मिलन के उद्भावना अद्भुत बिम्ब से भइल बा। अधे राति खाँ राधिका के मन में सिरी किसुना के देखेके टिसुना जाग गइल। मनोहर अंगयेष्ठि आ ओहि पर आभूषण के आरोप से राधिका जी अँजोरिया के भावचित्र में उतर के कृस्न से मिलत बाड़ी। कृस्न अपना कृस्नता के कारन अमवसा में प्रतीकित बाड़ें। एहिजा अमावस्या आ पूर्णिया के अँजोरिया जइसन प्रतीक से कवि अद्भुत सौन्दर्य बिम्ब के रचना कइले बाड़न

टिसुना जागलि सिरी किसुना के देखे के त
आधी रतिये खाँ राधा चलि भइली गुजरिया।
चान नियर मुँह चमकेला राधिकाजी के
चम चम चमकेला जड़ी के चुनरिया।।
चकमक चकमक लहरि उठावे ओमें
मधुरे मधुरे डोले कान के मुनरिया।
गोखुला के लोग एहि देखि के चिहइले कि
राति में अमासवा के उगली अँजोरिया।।

अइसने एगो अजगूत बिम्ब तब उभरता जब कृस्न अइलीं राधे अइलीं राधे बोल उठलें –

एनें फूलल कमल ओने चढ़ल अँजोरिया।

एह बिम्ब में असंगति दोष बा। कांहेकि अँजोरिया में कमल खिलल दुर्लभ बा। लोक विरूद्ध बा। एह से एह अद्भुत बिम्ब से पाण्डेय जी भले राधा कृस्न का रात्रि मिलन के अजगूत रूप-स्वरूप अंकित कर देस, असंगति दोष त एहि में बनले रही।
डॉ. जितराम पाठक के प्रसिद्ध कविता ‘ रूप ‘ के आस्वादन रउरा बिम्ब विधान के लक्ष्य से करेके चाहीं। डॉ. पाठक के कविता में बिम्ब के बड़ा सघन समायोजन भइल बा-

रूप / गांजा ह / आँखि के चीलम लहकाईं / आ पीहीं सभे / जिनिगी भर / जीहीं सभे।

एह कविता में रूप नीयन सूक्ष्म बस्तु के अभिव्यंजना स्थूल बिम्ब विधान से कइल गइल बा। रूप के व्यंजना बड़ा कठिन बा। ओकर व्यंजना स्थूले के माध्यम से संभव बा। रूप के आख्यान करे खातिर डॉ. पाठक गांजा, चीलम, गंजेरी आदि के परिवेश जीवन के पृष्ठभूमि पर उतरले बाड़न। गंजेरी लोग चीलम पर गांजा चढ़ावेला। सलाई के एगो काठी मारके दम लगावेला आ चीलम से लाफ उठा देला। ओइसहीं जइसे कवनो कंचन काया के लपक पसर जाए। गँवाई जीवन के असरदार बिम्ब एह कविता में साफ-साफ फरीछ आ गइल बा। गंजेरी के जेतना आकर्षण, प्रेम गांजा, चीलम वगैरह से होला, ऊ सब एह भावचित्र में समाहित हो जाता। घुरमुड़िआ के गांजा के लालच में बइठल आ तब तक बइठल रहल जब तक गांजा के कली में हिरदय के लली ना उतर आवस। रूप के चस्का आ गांजा के मस्का बहुते बड़िआर होला। बाकिर दम लाग गइल तब? ‘ गंजेरी इयार किसके, दम लगाये खिसके।’ रूपलोभी कार्यसिद्धि के बाद घसक जालें। एही तरह से – ‘ रूप रंगनी के कांट ह, रूप साहु के लहना ह, गोरिया के गहना ह ‘ आदि में बेजोड़ बिम्ब उरेहल गइल बाड़ें स। ‘ रूप रोपेया के भाई ह ‘ में रूपाकर्षण ओही तरह से बिम्बित कइल गइल बा जइसे रामचरित मानस में – ‘ कामी ही नारी पियारी जीमी, लोभी ही प्रिय जीमी दाम। ‘ में संयोजन बा। दूनों में एके भाव जागृत बा। जवन बाह्य के अपेक्षा आंतरिक अधिक बा। अंत में पाठक जी कहत बाड़ें – ‘ रूप रोपेया के भाई ह, रूप बबुआ के माई ह।’ बबुआ के माई अपना पुत्र के माता के रूप में अपूर्व संघटन बिम्ब विधान से एजवा कइल गइल बा।
पाठक जी का आउर कवितन में एही तरह के बिम्ब विधान लउकी। जइसे

सावन साध सहेजि के, चढ़ल टिकुलिया चान।
माखन मन सपना सटल, गोरिया भगल जवान।

सावन के माध्यम से एह कविता में साध के अपारता चान के माध्यम से नायिका के सिंगार के प्रति रूचि आ सिंगार से ओकरा सुन्दरता के बढोतरी मक्खन जइसन कोमल मन में जीवन के अनेक रंगीन सपना के संयोग देखा के नायिका के यौवन सम्भार प्रदर्शित कइल गइल बा।
रामेश्वर सिंह काश्यप के ‘ भोर ‘ कविता सांग रूपक आ बिम्ब विधान के अपूर्व संयोग प्रस्तुत कर ता। भोर में अँजोर उतर आवेला। एह स्थिति के बरनन काश्यप जी गोरकी बिटियवा के माध्यम से कइले बाड़न। एह बिम्ब में टिकुली लगावल, तालाब नहाइल, नजर के जादू चलावल, चुनरी के आँचर उड़ावल, नुपुर बजावल आदि द्वारा एगो नायिका के सोबरन पूरहर स्वरूप अंकित कइल गइल बा। एह कविता में अपूर्व आनंदमय मधुर मनोहर बिम्ब प्रस्तुत बा –

गोरकी बिटियवा टिकुली लगा के
पूरूब किनारे तलैया नहा के
चितवन से अपना जादू चला के
ललकी चुनरिया के अँचरा उड़ा के
तनिका लजा, तब बिहँस खिलखिला के
नुपुर बजावत किरिनिया के निकलल
अपना अटारी के खोललस खिरिकिया
फइलल फजीर के अँजोर।

राति के अंहरिया भोर का अँजोर में धूल गइल। अंहरिया खातिर काश्यप जी करियकी बुढ़िया के बिम्ब सजवले बाड़ें। भोर के गोर बिटिउआ अंहार के करिअकी बुढ़िया के डंटलस, धिड़वलस। बुढ़िया तरेगन के गहना समेट के खंडहर में भाग गइल। चंचल बिटिउआ , उत्पाती धिया चिरइन के जगा दिहलस, मुर्गा के डेरवा दिहलस, बदरी के बछरू पगहा तुड़ा के भाग गइल। भोर का पर्वत के सोना बना देता आ अंत में भोर के अँजोर छप्पर पर आइल, ओसारा में चमकल, आँगन में उतरल, कोहबर में सूतल बहुरिया के चिहुकवलस आउर साजन का संगे सटल बहुरिया लाज का लहंगा में लिपट गइल। प्रियतम का बांहि से छोड़ा के काम-धाम के ओर बढ़ल। पनघट के ओर घइला लेके चलल। फजीरे-फजीरे अँजोर केलिगृह में केंकुरल बहुरिया के संवेदनशील बना देता। सास-ननद के लोक-लाज के चादर ओढ़ा देता –

छप्पर पर आइल, ओसारा में चमकल
चुपके से गोरी तब अँगना में उतरल
लागल खिरिकियन से हँस हँस के झाँके
जहँवा ना ताके के, ओहिजो ई ताके
कोहबर में सूतल बहुरिया चिहुक के
लाजे इंगोरा भइल , फेर चिपके
अपना सजनवा से बंहिया छोड़ा के
ससुआ ननदिया के अँखिया बचा के
घइला कमरिया पर धर के ऊ भागल
जल्दी से पनघट के ओर।

काश्यप जी का एह कविता में बिम्ब के बड़ा सजोर संजोग जुटावल बा। एह बिम्ब में आनंद के अनुपम महाभोज प्रस्तुत बा। अनेक मधुर प्रसंग के माध्यम से जवन बिम्ब उभारल गइल बा, ओकरा में इन्द्रियजन्य सुख के अलावा आनंद के अपार श्रोत उत्पन्न भइल बा। सांग रूपक के जमीन पर रचल बिम्ब विधान भोजपुरी काव्य भासा के अनुपम उदाहरन बा।
भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान के जोगाड़ बहुत कम लउकता। कारन कि भोजपुरी आलम्बन अपारदर्शी बाड़ें। उनकर स्थिति विशेष बनल रह ता। ऊ विशेष नायक, नायिका भा आलम्बन बन के रह जात बाड़ें। उनकर सामान्यीकरण नइखे हो पावत। सामान्यीकरण ना भइला के चलते आंतरिक भाव बोध के चित्र भा बिम्ब कम उभरत बा।

 

 

 

 

 

डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’

‘प्रताप भवन’ महाराणा प्रताप नगर, मार्ग सं.- 1(सी),

भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर – 842001(बिहार)

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One Thought to “भोजपुरी काव्य में बिम्ब विधान – डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’

  1. अमरेन्द्र

    बिम्ब विधान पर सुन्दर आलेख बा।
    जयकांत बाबू के बधाई ।

    छनन छनन छन बरछी बाजे
    सन सन सन तेगा तलवार

    भूख जगा दे सोन्ह खखोरी
    मादक गंध भरे गुलनार

    तातल रोटी नीमन लागे
    बुढ़ऊ पीयसु फूक के चाय

    रवि रश्मियाँ चकमक करे
    नयन जुड़ाये सुर्ख गुलाब

    माड़ भात पर टपके लार
    पागल कर दे मुर्ग पुलाव

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