हास्य – व्यंग्य भोजपुरी का आगे बढ़ी !

आज के एह भाग-दौड़ भरल समय में जब लगभग एक बरिस से बेसी के समय कोरोना जइसन महामारी केडर के साया में निकल गइल। आज जब हमनी के जीनगी से हंसी खुशी एक तरह से गाएब हो गइल बा। त अइसन में भोजपुरी समय अपना पाठक लोग खातिर समय-समय पर अपना माईभाखा भोजपुरी के विद्वान आ वरिष्ठ साहित्यकार लोग के हास्य-व्यंग्य के रचनन के संगे उपस्थित बा। एह क्रम में आज रउआ सभे पढ़ीं बिहार के सीवान से वरिष्ठ साहित्यकार श्री जीतेन्द्र वर्मा जी के ई हास्य-व्यंग्य के रचना।

भोजपुरी का आगे बढ़ी

एक बेर के बात हवे । हमार एगो इयार हमरा घरे अइले आ सांय-सांय कहले- ‘‘देख ! तहरा के हम आज एगो रहस्य के बात बतावतानी ।’’ हमरा बुझाइल कि ऊ कवनो खजाना के रहस्य बतइहें । हम उनका लगे घुसुक गइनी । ऊ कहले- ‘‘देखऽ भोजपुरी में लिखे-पढ़े के बा त भोजपुरी सम्मेलन में आवे-जाये के चाहीं । एह से जान-पहचान, जात-पहचान बढ़ेला । रचना छपे में सुविधा होला । राता-राति भोजपुरी के महान कवि, कहानीकार, नाटककार, उपन्यासकार, आलोचक भा आउर कुछ बने के संभावना हो जाला ….. तू लोला खानी लिखते रह जइब । एह से कही तहार नाम- चरचा ना होई । सम्मेलनन में भोजपुरी के बड़का-बड़का साहित्यकार…… ना….. ना…… भोजपुरी के भाग्यविधाता लोग जुटेला । कहीं तहरा पर ओह लोग के नजर पड़ गइल त जान जइह कि तहार भाग्य खुल जाई ।’’

हमार ई इयार हमार बड़ी शुभचिंतक हउवें । ऊ हमरा के जबरन एगो भोजपुरी सम्मेलन में लिया गइले । ओजवाँ भोजपुरी के बहुते बड़-बड़ साहित्यकार…. ना…. ना भोजपुरी के भाग्यविधाता लोग आइल रहे । हमार इयार एगो भाग्यविधाता जी के हमरा से परिचय करावत कहले-‘‘इहाँ के भोजपुरी के महाकवि हई । इहाँ के भोजपुरी में एक झोरा किताब लिखले बानी ।…….।’’

अबहीं हमार इयार आगे आउर कुछ कहे वाला रहस बाकी ओकरा पहिलहीं ऊ भाग्यविधाता जी खिसिया के कहे लगनीं-‘‘एक झोरा ! अरे हम त एक बोरा ग्रंथ लिखले बानी । तू एक झोरा कह के हमार अपमान करतार । फलनवाँ के गुट में चल गइल बाड़ऽ का ?’’

हमार इयार माफी माँगत कहले-
‘‘हमरा से गलती हो गइल हवे । माफ करी । राउर गोड़ धरतानी । अब से हम दू बोरा कहेब ।’’
‘‘अब का खाक कहब । फर्स्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन । तू त एह नवही का नजर में हमार भैलूए खत्म कर दिहलऽ । तहरे जइसन लोग का मारे त भोजपुरी आगे नइखे बढ़त ।’’
ऊ डाँटत रहले तले हम चुपचाप दोसरा ओर खिसक गइनीं । हम आगे बढ़ली त एगो भोजपुरी पत्रिका के संपादक जी भेटइनीं । उहाँ गद्दा पर आपन आसन जमवले रही । उहाँ के अगल-बगल उहाँ के चेला-चाटी लोग बइठल रहे । उहाँ के कहत रही-‘‘हमरे पत्रिका बिया कि भोजपुरी जियतिया । हम पत्रिका ना निकलति त लोग भोजपुरी भुला गइल रहित । हम अपना खून-पसेना के कमाई एह में फूक रहल बानी । बिना पइसा लिहले हम केहू के पत्रिका देवे के कहो रचनो ना छापिले ।’’

संपादक जी हमरा हाथ में दू-तीन पत्रिका देख के आँख तरेरत पूछनीं-‘‘भोजपुरी सम्मेलन में हिंदी पत्रिका लेके घूमतार । नया-नया आइल बाड़ऽ का ? चलऽ हमरा पत्रिका के गाँहक बनअ ।’’

हम कहनीं-
‘‘हिंदी के ना ई सब भोजपुरी के पत्रिका हई स ।’’

उहाँ के चिहात कहनी –
‘‘भोजपुरी के ! हमरा के उल्लू बनाव तारऽ ।’’

उहाँ के एगो चेला हमरा हाथ से सब पत्रिका झपटा मार के छीन लिहले । पत्रिका भोजपुरी में बा- ई देख के संपादक जी मुँह बिचुका के कहे लगनीं-

‘‘हमरा लगे त ई लोग भेजबे ना करे । केतना खराब जमाना आ गइल बा । हम कवन-कवन परेशानी उठा के भोजपुरी के ढो रहल बानी । बाकिर लोगहमरो के एगो पत्रिका नइखे देत । भोजपुरी का विकास करी !’’

हम सुझाव दिहनीं-

‘‘रउवा एह पत्रिकन के गाँहक बन जाई भा आपन पत्रिका एह पत्रिकन के संपादक का लगे भेज दी । ई सब पत्रिका रउवा लगे आ जाई ।’’

हमार सुझाव ओजवा केहू के नीमन ना लागल । एगो चेला बमक के कहले-

‘‘अबही रउवा हमनी के संपादक जी के जानत नइखी । नया-नया नूँ आइल बानी । इहाँ के भोजपुरी माई के कतना सेवा करतानी । इहंे का करते भोजपुरी के केहू जानता । आ रउवा गाँहक बने भा पत्रिका बदलएन करे के कह तानी । कान खोल के सुन ली इहाँ के लगे जे मँगनी में आपन पत्रिका, किताब ना दी ओकरा के हमनी भोजपुरी इतिहास में जगहे ना देहब । चाहे कुछो लिखो लोग, कुछो छापो लोग । समुझनी-बुझनी ।’’अब हम ओह ग्रुप में वइसही हो गइल रही जइसे हंसन के पाँत में कउवा । हम ओजवाँ से हट जाये में आपन भलाई बुझनीं । आगे बढ़नी तले हमार इयार भेटा गइले । ऊ कहले-

‘‘अच्छा भइल हवे कि तू भाग गइलऽ हउव । हम त घेरा गइल रहनी हई । बड़ी जबर कवि हवें । बड़ी मुश्किल से पिंड छूटल हवे । चल तहार परिचय आउर भाग्यविधाता जी लोग से करा दी ।’’

अबकी हमार इयार जइसही भोजपुरी के दोसर भाग्यविधाता जी से हमार परिचय करवले ऊ भड़क गइले-

‘‘तू ही फलाना हउव । बहुत लिख तारऽ ! अइसही भोजपुरी लिखाला । पहिले भोजपुरी लिखे के सीखअ । ना त ठीक ना होई । कह दे तानी ।’’

हम डेराते पूछली-

‘‘कइसे भोजपुरी लिखाला ? हम कवन गलती बात लिखले बानी ।’’ हमार बात सुनते ऊ अपना आप से बाहर हो गइले-
‘‘ई त बड़ा मनबढ़ुआ बुझाता । बड़-बुर्जुग से कइसे बोले के चाही- एकर लूरे नइखे । कइसे लिखाई ! मुँहे लागतारऽ । अबही हमरा के ठीक से जानत नइख । हमरा से बिगाड़ क के तू भोजपुरी में ना उजियइब ।बुझल-समुझल ।’’

हमार इयार ओह भाग्यविधाता जी के बहुते हाथ-गोड़ जोड़ले । हमरा किओर से माफी मँगले । तब जाके भाग्यविधाता जी के पारा नीचे उतरल । उहाँ के कहे के शुरू कइनी-
‘‘हम तहरा के भोजपुरी लिखे के सीखवऽतानी एह से हम तहार गुरू भइनी । आउर केहू तहार गुरू बने के कहो त तू मत सकरिह ।’’

हम त सुनले रही कि गुरू के तलाश में बहुते भटके के पड़ेला बाकिर भोजपुरी सम्मेलन में त सेतिहें में गुरू जी भेटा गइले । इनका बात से त बुझाता कि एजवा आउर गुरू जी लोग भेटा सकता । हमार गुरू जी भोजपुरी लिखे के मनतर दिहनीं-

‘‘जइसे संस्कृत लिखे के फर्मूला बा कि हिंदी लिख के ओह पर स्याही छिडि़क द जहाँ-तहाँ अपने विसर्ग, हलंत लाग जाई आ हो जाई पकिया संस्कृत। अइसही भोजपुरियो के एगो फर्मूला बा । जवन शब्द हिंदी में दीर्घ से लिखाता तवन हसर््व से आ जवन हसर््व से लिखाता तवन दीर्घ से लिखाए के चाही । जहवाँ ‘श’ के प्रयोग होला उहवाँ ‘ष’ भा ‘स’ के प्रयोग होखे के चाही आ जहवाँ ‘स’ के प्रयोग होला उहवाँ ‘श’ भा ‘ष’ के । स्टेशन के ‘इसटेसन’, स्कूल के ‘इसकोल’ लिखाए के चाही । इहे भोजपुरिया प्रकृति हवे । हिंदी के अनुसार भोजपुरी ना चली । समुझल-बुझल ।’’

भोजपुरी प्रकृति के समुझ-बुझ के हम आगे चलनी । एक जगे एगो भोजपुरी पत्रिका के संपादक जी अपना रंग-बिरंगी पत्रिका का संगे बइठल रहीं। उहाँ के आवे-जाये वाला लोग से आपन पत्रिका देखा-देखा के कहत रही-

‘‘हम त भोजपुरी खातिर आपन कैरियर बर्बाद कर दीहनी । केतना जोगाड़ क के हम भोजपुरी के रंग-बिरंगी पत्रिका निकाल रहल बानी । आ हमरा के भोजपुरी के इतिहास में अमर नइखे कइल जात । ई केतना भारी अन्याय होता, रउवे बताई । हम एह अन्याय के खिलाफ चुप ना बइठब । हम एह मुद्दा के मानवाधिकार आयोग, सुप्रीम कोर्ट, संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाएब ।….. खेलवाड बात नइखे नूँ । भोजपुरी के फेर में ना पड़ल रहीति त अबले आई.ए.एस. भइल रहीति । रुपया के गाँव लगा दिले रहति ।’’

हम पूछनी-

‘‘आखिर रउवा अमर होखे में दिक्कत कहाँ बा ?’’ संपादक जी बतवनी-

‘‘दिक्कत ! आरे पूछी मत । कुछ लोग कहता कि रउवा पत्रिका में भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति भा समाज से संबंधित रचने नइखे रहत । अब रउरे बताई ई शर्त लगावल केतना गलत बा । आरे रचना, रचना होला । कुछ लोग के आदत एतना खराब बा कि हमरा पत्रिका में छपल रचना के बारे में कहता कि ई रचना दस साल पहिले फलाना पत्रिका में फलाना के नाम से छपल रहे, हई रचना फलाना हिंदी अखबार में छपल रचना के अनुवाद हवे, हउ रचना फलाना हिंदी पत्रिका में छपल बा । …..आउर अइसने केतना बात । अब रउरे बताई कि अइसन लोग का रहते भोजपुरी का आगे बढ़ी ! हम त सुनले रही कि भोजपुरी में एको फर्मा के गं्रंथ छपवा देला पर लोग अमर हो जाला । हम त एगो प्रूफ रीडर के जानतानी । ऊ अपना प्रूफ रीडरी का बले भोजपुरी साहित्य के इतिहास में कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार आ ना जाने आउर केतना ‘कार’ के मालिक बन गइले । आ हमरा के अमर नइखे बनावल जात । बाप रे बाप ! दादा हो दादा ! हमरा के जल्दी से अमर बनावल जाव । तनी रउवा हमार पैरवी क दी । ….. बाप रे बाप….. ।’’
हम घूमत-घामत दोसरा ओर गइली । भोजपुरी के एगो भाग्यविधाता जी अपना मंडली का संगे बइठल रही । उहाँ कहत रही-

‘‘हमहूँ भोजपुरी में एगो पत्रिका निकालिले । ओह में अरुआ-घसुआ लोग के रचना ना छपे । हम रचना बड़ी ठोक बजा के छापिले । ….. तू लोग आपन-आपन प्रतिनिधि रचना सुनाव । हमरा पसंद परी त अपना पत्रिका में छापब ।’’

ओजवाँ बइठल लोग आपन-आपन कविता सुनावे लागल । एक जना के कविता सुन के संपादक जी कहनी-

‘‘देखअ ! तू जवन सुनवल हउव ऊ साहित्य ना, राजनीति हवे । हमरा पत्रिका में राजनीति ना छपे । साहित्य छपेला । सत्यं शिवम् सुंदम ।’’

एह पर ऊ कवि उहाँ के पत्रिका के ताजा अंक खोल के कहले-

‘‘बाकिर रउरा पत्रिका के हई रचना त फलाना पार्टी के पक्ष में बा । देखी । हम पढ़ के सुना दे तानी ।’’

संपादक जी खीसे काँपे लगनी । उहाँ के दाँत पीसत कहनी-‘‘चुप ! मुँहजोर ! संस्कारहीन ! ….. तू जा एजवा से । हमरा लगे तर्क ना होला । आरे फलाना पार्टी के जितावे के चाही । एह से ओइसन रचना छपल बा । ई राजनीति नानू हवे । तूहूँ ओह पार्टी के पक्ष में लिखअ, छपी । खूब छपी । समुझल-बुझल ।’’

हम एजवाँ से आगे बढ़नीं तले फेर हमार इयार भेटा गइले । ऊ कहले-

‘‘कहाँ-कहाँ बउवा तार । चलअ एगो गोष्ठी होता । बहुते महत्त्वपूर्ण विषय बा । एगो ऐतिहासिक पेपर पढ़ल जाई । बहुते विद्वान लोग जुटल बा ।’’

गोष्ठी में आठ आदमी रहे । एगो विद्वान जी बीस-पच्चीस पन्ना के आलेख पढ़नी । ओह में उहाँ के कहनी कि फलाना किताब कविता आ कहानी दूनो हवे । एह पर बहस में भाग लेत एगो विद्वान जी कहनीं-

‘‘एह आलेख में बहुते कमी बा । एह में फलाना किताब के खाली कविते आ कहानी के किताब कहल गइल बा जबकि ऊ कविता, कहानी आ निबंध तीनों के किताब हवे ।’’

एक जना दबले स्वर में कहले-

‘‘हमरा विचार से कवनो रचना कविता, कहानी आ निबंध एके संगे ना हो सके । कवनो एकेगो हो सकता ।’’

‘‘तब रउवा पता नइखे । हम साबित क दे तानी । देखी एह रचना के फलाना लाइन कविता खानी बुझाता कि ना । फलाना प्रसंग कहानी खानी बुझाता आ हई लाइन निबंध खानी । रउवा कहतानी……..।’’

‘‘छोड़ी ! इहाँ के अबही भोजपुरी साहित्य के महान परंपरा के बारे में ज्ञान नइखे । एही से इहाँ के अइसन बात कह देनी हई ।…… हमरा बुझाता कि ई रचना कविता, कहानी, निबंध त निर्विवाद रूप से हइये हवे संगे-संगे नाटको हवे ।’’

‘‘ठीक कहनी ।’’
‘‘एकदम ठीक, हमनी के एह पर ध्याने ना जात रहल हवे ।’’
गोष्ठी खत्म भइला पर हम बहरी घूमे लगनी । कुछ लोग बड़ी खिसियाइ रहे । एगो कवि जी कहत रहनी –

‘‘बताई हमरा जइसन भोजपुरी के महाकवि के अइसन समय में कविता पढ़े के बोलावल गइल जब श्रोता लोग जा चुकल रहे । भोजपुरी का आगे बढ़ी !’’

‘‘अरे रउवा के बोलावलो गइल । हम त काल्हे से कहत रही कि हमरा के भले खियाई-पियाई लोग मत बाकिर कविता जरूर पढ़वाई । बाकिर अंत-अंत ले हमरा जइसन महाकवि के मौका नाहिए दिहल ह लोग । सम्मेलन में हमार आइल बेकार हो गइल । अब भोजपुरी डूब जाई !’’

‘‘कवि सम्मेलन के अध्यक्षता त फलाना जी करत रहल हउवे । चल के उनके से पूछाव ।’’
‘‘अरे ऊ का कहिहें । सब खचड़ई संचालकवा के रहल हवे । अध्यक्ष जी त माटी के मूरत रहले । उनको सब केहू के चल गइला का बाद टाइम मिलूए। बेचारू !’’

अंत में सब असंतुष्ट लोग के राय भउए कि खाइल-पीयल आ सब गोष्ठियन में भाग ना लेके एगो कवि सम्मेलन कइल जाव । जवना में कवनो तरह के रोक-टोक ना होखे । सभे हींक भर कविता पढ़ सको । भोजपुरी के डूबे से बचावे खातिर आ भोजपुरी के विकास खातिर अइसन कइल एकदम जरूरी बावे।

सभे एगो बड़ कमरा में जमा भइल । सभका कविता सुनवला बिना पेट फुलत रहे । सभे पहिले हम, पहिले हम करत रहे । नया लोग पहिले आपन हक जतावे त पुरान लोग पहिले आपन । खैर एह समस्या के समाधान जल्दिए निकल गइल । सभे एके संगे आपन-आपन कविता पढ़े लागल । केहू के कविता सुनवला बिना रहाते ना रहे । बूढ़-जवान सभे गला फार-फार के कविता पढ़त रहे । जवन हाँव-हाँव काँव-काँव मचल कि जान जाई कि ओकरा आगे मछरी बाजार फेल रहे । कुछ साफ ना सुनाई देत रहे । तीन-चार घंटा ले ई कवि सम्मेलन चलल । जेकर मुँह दुखा जाव ऊ बहरी आ जाव । सभे खुश लउकत रहे । आइल स्वारथ हो गइल । एगो कवि जी गदगद भाव से कहनीं-

‘‘खूब भइल । इहे नूँ भोजपुरी के असली कवि सम्मेलन भइल हवे । कुछ लोग हमनी के कविता ना होखे देवे खातिर साजिश रचले रहल हवे । हमनी के ओकरा के विफल कर दिहनी । जय हो ! जय हो !

लेखक: जीतेन्द्र वर्मा

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