नायक के कमी से जूझत भोजपुरी सिनेमा के एगो खेवनहार के तलाश

लगभग साठ साल से अधिक समय से भोजपुरी फ़िल्म हमनी के देश में बन रहल बाड़ी सन लेकिन अचरज के बात ई बा कि हमनी के आज तक ले एगो स्थापित भोजपुरी फ़िल्म जगत के कलाकार ना खोज पवनी जा । लोक कलाकारन के खान मानल जाए वाला बिहार आ उत्तर प्रदेश के धरती त हजारन कलाकार उपराज दिहली लेकिन एको कलाकार अइसन ना भइलें जे तमिल के रजनीकांत लेखा भोजपुरी में आपन उपस्थिति दर्ज करवा सके । अइसन एको जाना ना भइलें जिंहिका एक आवाज़ प लोग बाग एक जगे जुट जास । समय समय प एहिजा फिलिम बनत रहली सन लेकिन ओकर दायरा खाली सिनेमा हॉल तक ही सिमट के रहि गईल, एकर कारन बुझला ई रहल की भोजपुरी फिलिम में काम करे वाला कलाकार लोग अपना आप के समाज से ना जोड़ल लोग । बाकी के लोक विधा लेखा ओकरा के समाज अपना अंदर तक काहे ना अपना पवलस एह प आज तक ले केहू चर्चा भी ना कइलस । भा कहल जाव त एह मुद्दा प बात बिचार करे के केहू के चिंता फिकिर नइखे ।
देश के पहिलका राष्ट्रपति महामहिम राजेन्द्र प्रसाद जी के पहल प शुरू भईल ई भोजपुरी फ़िल्म जगत कई बार उतार चढ़ाव देखलस , ओहि उहापोह के स्थिति के बीच में ही गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो , गंगा , नदिया के पार तक बनली सन बाकी सचिन से लेके कुणाल सिंह तक अपना के एह ढांचा में ना ढाल पावल लोग की जावना के लेके भोजपुरी फ़िल्म के असली समाज के दर्पण कहल/समुझल जाव, जईसे की बाकी के भाषा मे बने वाली फिलिमन के बा । मराठी, बंगाली , तेलुगु , मलयालम , तमिल , असमिया से लेके बाकी के क्षेत्रीय सिनेमा के आपन एगो दर्शक वर्ग बा, एगो स्तर बा , भले ही उ आबादी में कम बाड़ें बाकी ई सिनेमा के प्रति ओह सभ दर्शक लोग के समर्पण ही बा जे ओह सिनेमा व्यवसाय के ज़िंदा रखले बा । बाकी भोजपुरी के विडम्बना इहे बा कि २५ करोड़ से बेसी के आबादी ख़ातिर बने वाली फिलिम आज तक कहियो ५ करोड़ के भी व्यवसाय ना कइलस । सदी के सबसे बड़का हिट भोजपुरी फ़िल्म कहाए वाला ससुरा बड़ा पैसावाला भी आपन निमन छाप ना छोड़लस जवन की आपेक्षित रहे । भले ही आज ई भोजपुरी सिनेमा जगत के सालाना व्यवसाय लगभग २००० करोड़ के भ गईल होखे ।
अइसनो बात नइखे की एह डूबत उत्तरात भोजपुरी फिलिम व्यवसाय के केहू सम्हारे के कोसिस ना कइलस ! बाकी ओह लोग के अकेलापन आ संसाधन के कमी के वज़ह से ई मुहीम अपना मुक़ाम प पहुंचे से पहिलहीं दम तूर दिहलस । जब एकइसवी शताब्दी में मोहन जी प्रसाद , आ सुधाकर पाण्डे जइसन निर्माता लोग के आगमन भईल त भोजपुरी फ़िल्म जगत के भाग्योदय जइसन बुझाइल , ओह समय के स्थिति परिस्थिति के अनुसार कुछ बढ़ियां सिनेमा भी बनली सन बाकी ओकरा के ओह निर्माता लोग के अलावा सभे भंजावल , बलुक कहल जाव त ओकरा के खाली मनोज तिवारी , रवि किशन आ निरहू जइसन अभिनेता मिलके लूट लिहलें , बाकी इंडस्ट्री के सुधार करे के केहू कोसिस ना कइलस । परिणामस्वरूप आज के तारीख में सिनेमा के टेक्नोलॉजी ( तकनीक ) भले रील से डिजिटल भ गइल होखे , बड़े बड़े लाइट लागे लागल होखे , आज के तकनीक 4K भ गइल बा। साउंड डिजिटल डॉल्बी हो गइल बा बाकी सिनेमाघरन के हाल अबहियों १९७०/८० वाला ही रह गईल बा । अइसन में केहू ( माने की परिस्थिति के अनुसार प्रभाव वाला लोग ) खाली आपन बगली भरल छोड़के सिनेमाघर के स्थिति प तनिका धेयान दे देले रहित त आजु ले भोजपुरी फिलिम जगत भी बाकी भाषा के फिलिम लेखा जन जन तक चहुँपल रहित ।
अइसन बात नइखे की दोष खाली अभिनेता स्तर के ही बा । एह फिलिम इंडस्ट्री के डुबावे में क्षेत्रीय सरकारन के भी दोष बा । बिहार, झारखंड आ उत्तर प्रदेश के मिला दिहल जाव त लगभग भोजपुरी ही का हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी काम करे वाला लोग के एगो पूरा जमात भरल बा एह इलाका के लोगन से । नीरज पांडे, प्रकाश झा, मनोज वाजपेयी, विनय पाठक , संजय मिश्रा , अमित झा, प्रियंका चोपड़ा, अनिल अजिताभ, कीर्ति प्रकाश झा, पंकज त्रिपाठी, इम्तियाज अली , अनुराग कश्यप, अंजुम राजबली, सुधीर मिश्रा ई कुल्हि लोग के सरोकार भोजपुरिया इलाका से रहल बा बाकी ई लोग तनिको ध्यान भोजपुरी सिनेमा प ना देके खाली हिन्दी आ दोसरे भाषा के फिलिम में अझुराइल रहि गईल । कुछ लोग कोसिस भी कइलन त ओह लोग के मेहनत के मुताबिक़ सफ़लता ना मिलल । जईसे की नितिन चंद्रा भोजपुरी में एगो फिलिम बनइलें देसवा जावना के भोजपुरी में रिलीज़ करे वाला लोग ना मिललें त उ बाद में जाके हिंदी में ओकरा के वन्स ऑपन आ टाइम इन बिहार के नाम से रिलीज़ कइलन ।
बाकी ई भोजपुरी फिलिम के कमाई से फर्श से अर्श प चहुँपल लोग मनोज तिवारी , पवन सिंह , निरहू , रवि किशन , अभय सिन्हा , डॉक्टर सुनील , बिनय बिहारी , सुजीत तिवारी , जइसन लोग भी आपन मूल जड़ मजबूत करे के प्रयास कइल छोड़ के खाली दू साँझ के रोटी के चक्कर/आ झूठा परसिद्धि पावे के चक्कर मे भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री के बदहाल स्थिति में छोड़के अपने घमण्ड में अझुराइल रह गइलन । एगो लमहर समय से उपेक्षा झेलला के बाद अब कुछ दिन से उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश में शूटिंग होखला प कुछ फिलिमन के अनुदान दे रहल बिया जवन की बिहार में अबहियों नइखे । झारखण्ड के गठन भले बिहार के तूर के भईल होखे बाकी ओहिजो के सरकार बिहार से तेज निकलल आ ओहिजा त ई स्थिति बा कि लगातार कई गो फिलिमन के शूटिंग धड़ाधड़ हो रहल बा ।
तकनीकी पक्ष से देखल जाव त भोजपुरी फिलिम के आपन सेंसर बोर्ड अबहियों नइखे । आज भी ई भोजपुरी फिलिम हिंदी सिनेमा के सेंसर बोर्ड के एगो समिति किंहाँ से ही पास होके निकलेले । एकरे कमी के वजह से आज भोजपुरी फिलिम में फूहड़पन के बढ़ावा मिलल बा । काहे की विशुद्ध भोजपुरी के जानकार लोग के अनुपस्थिति में हिंदी वालू लोग कुछ घुस कमीशन लेके कइसनो गीत गाना वाली फिलिम के सर्टिफिकेट दे देबेला । परिणाम की एगो सभ्य समाज के तबका भोजपुरी फिलिम से खुद के दूर क लेले बा । आज के युग में एक देने जहाँ दुनिया के सिनेमा भविष्य के योजना प काम कर रहल बाड़ी सन ओहिजे हमनी के इंडस्ट्री आज भी १८८०/९० के दशक के हिंदी/दक्षिण भाषा के फिलिमन के अधकचरा मिक्सचर बना के सिनेमा के नाम प खाली फूहड़पन परोस रहल बिया । जवन भोजपुरिया इलाका के कहानी प इतिहास लिखा जाए/लिखाईल बड़ी सन , जहवाँ के रहे वाला बाबू वीर कुंवर सिंह, भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिसिर रहलें , जहां से स्वतंत्रता संग्राम के।नेतृत्व भईल , जहां से महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह शुरू भईल ओहि माटी के देखावे ख़ातिर भोजपुरी फिलिम में आजतक भोजपुरिया संस्कृति के एको झलक ना लऊकल, आ नाहिएँ एको ई सब घटना के समावेषयुक्त फिलिम । एको अइसन फिलिम हमनी के संस्कृति प आधारित ना बनल जावना के देख के हमनी के सीना चाकर क के कह सकीं जा की हं हई देखीं ई नवका जुग के हमनी के भोजपुरी सिनेमा ह ।
भोजपुरी फिलिम इंडस्ट्री में क़ायदा से देखल जाव त मुख्य अभिनेता के रूप में काम करे वाला एकहूँ अभिनेता लोग के अभिनय के क ख ग से वास्ता नइखे ( रवि किशन के छोड़के )। कारण ई बा कि ई कुल्हि लोग एस्टेज प के गवइया ह ( प्रोफेशनल सुर के साधक ना ) आ मनोज तिवारी के तात्कालिक सफ़लता देखके कुछ पइसा वाला पार्टी पकड़ के झांसा में लेके ओह लोग के निर्माता त लोग बना देल आ अपने हीरो बन गईल ! आ इहे कुल्हि अनियमित कलाकार पब्लिक डिमांड के नाम प जम के उल्टा सीधा गीत गवनई गावल लोग ,कुछ दोयम दर्जा के निर्माता भी मसाला फिलिम के नाम प खुलेआम अश्लीलता के बढ़ावा देल । बाद में जब एह लोग के तनी मनी फिलिम चल गइली सँ तब धीरे धीरे ई लोग के कपार प स्टारडम चढ़ि गईल आ फिर सिनेमा के प्रति असहयोग बढ़त चल गईल । बाद में इहे असहयोग अहंकार में बदलत चल गईल आ एगो/कई गो अनियमित व्यवसायी फिलिम निर्माता बन के अज्ञान में परके आपन पूंजी लुटवा के बरबाद हो गइलन । काहे की स्थापित निर्माता भीरी आज के सुपर स्टार कहाये वाला लोग भी मेहनताना ख़ातिर मूंह ना खोले लोग आ नया निर्माता के खून चुसे में भी एह लोग के कवनों हरजा ना ह । आ स्थापित निर्माता लोग एह नयका सुपरस्टार लोग के शुरुआती दौर में ही एह लोग के भंजा के जम के कमाई कइल लोग , इहे कारण ह की भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री में निर्देशक भले रिपीट हो जालन बाकी एको नया निर्माता ना रिपीट भइलें । अब इहे सोंचे वाला बात बा कि जावना इंडस्ट्री में सिनेमा के प्रति समर्पण, रचनात्मकता के अभाव होखे , हर तरफ़ लूटपाट के माहौल होखे ओइसन में रउवा निमन काम के उम्मीद कहाँ से कर सकतानी ? काहे की बॉलीवुड के फोकस पुलर एहिजा डीओपी बन के चानी काटत्तरें, हिंदी फिलिम के तीसरा भा कह लिहीं त चउथा असिस्टेंट के रूप में काम करे वाला लोग एहिजा आके सीधे बड़का निर्देशक बन गइलें , म्यूज़िक के जेकरा सारेगामा तक नइखे पता उ संगीतकार बनल बा । जेकरा सिलाई मशीन तक ना चलावे आवे उ फिलिम के फैशन डिजाइनर बनल बा ! जे एक्शन करे वाला लड़िका बा उ फाइट डायरेक्टर बनल बा त फिर रउवा का उम्मीद कर सकतानी की भोजपुरी में मुग़ल ऐ आज़म काहे नइखे बन जात !
अइसनो बात नइखे की भोजपुरी जाने वाला क्षमतावान/प्रतिभावान लोग फिलिम इंडस्ट्री में नइखन ! बाकी ओह लोग के गिनती भी सिर्फ गिनती गिनवावे लायक रह गईल बा । कुछ स्थापित लेखक लोग बा त उ लोग टीवी सीरियल में अझुराइल बा, कुछ बड़का नाम वाला निर्देशक लोग बा त उ भोजपुरी में बनावल नइखे चाहत ,भोजपुरी जानेवाला संगीतकार लोग हिंदी पकड़ के बइठल बाड़ें । ओइजे कुछ नवका खून के निर्देशक लोग बा त उनकरा के स्थापित निर्माता लोग काम देबे में हिचकिचाता जबकि ई नयका लोग शॉर्ट फिलिम/डाक्यूमेंट्री के जरिये आपन प्रतिभा समय समय आ जगह जगह प देखा रहल बा । बढ़ियां अभिनेता लोग बा त उ लोग हिंदी के प्रति त जागरूक बा काहे की ओहमें गोट मोट पइसा मिलता बाकी उ लोग भी भोजपुरी फिलिम के प्रति उदासीन बा । कुछ नया लोग आपन छोट मोट प्रयास से ई विकट स्थिति के बदले में भी लागल बाड़ें बाकी ओह लोग के भी सहयोग के कवनों दीर्घकालिक परिणाम तबे निकली जब सउसें समाज एकट्ठा होके साथ मे प्रयास करी । हर केहू के कवनों विधि थोर बहुत मदद करे के चाहीं तब जाके स्थिति में कुछ सुधार आवे के गुंजाइश बन सकता । आमजन के मन में सिनेमा के प्रति लगाव उत्पन्न करे के जागरूकता पैदा करे के जरूरत बा । पूंजीगत आभाव के स्थिति में क्राउड फंडिंग ( चंदा वसूली ) कर के भी कुछ निमन सिनेमा बनावे के पड़ी । जवन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर बंदी के कगार प ठाढ़ बाड़ी सन ओहनी के स्थिति में सुधार के कोशिश करे के पड़ी । तब जाके कुछ स्थिति में बदलाव के उम्मीद कइल जा सकता । सरकार के चाहीं की एहिजे चेन्नई / हैदराबाद के तर्ज़ प भोजपुरी के आपन सेंसर बोर्ड बनवावे , ओहमें भोजपुरी के जानकार लोग के रखे जे हर विधा से परिपूर्ण होखे । बिहार उत्तरप्रदेश में ही शूटिंग से संबंधित सारा सामान , लाइट , कैमरा बाकी के समान सहित उचित दर प उपलब्द्ध होखे । एहिजा व्यवधान रहित शूटिंग ख़ातिर एगो बढ़ियां फ़िल्म सिटी के निर्माण होखे। साथ मे निमन सिनेमा के प्रोत्साहन देबे ख़ातिर आ आमजन में सिनेमा के प्रति जागरूकता पैदा करे ख़ातिर समय समय पऽ सरकारी कार्यक्रम कइल जाव, आ बढ़ियां फिलिम पऽ सरकारी अनुदान के संघे सामाजिक फिलिम के कररहित करे के भी पहल होखो।। तब ही उम्मीद बा कि कुछ बेहतर परिणाम निकल के सामने आ सकेला।

अभिषेक तिवारी

अभिषेक तिवारी

भोजपुर, बिहार के निवासी। गाँव से बारहवीं ले पढ़ाई। ओकरा बा फ़िल्म मेकिंग सह डिजिटल इफेक्ट बीएससी। IBN7 न्यूज चैनल में इंटर्नशिप। कईगो पत्र-पत्रिका में लेखन।

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