भोजपुरी भाषा के इतिहास

भोजपुरी बोली/भाषा वैदिक “ब्रीही”संस्कृति क उद्भव जउन क्षेत्र में भइल ओही क्षेत्र में शुद्धोधन क यशस्वी पुत्र गौतमबुद्ध,पालिभाषा के”भात”संस्कृत क्षेत्र में आपन चारिका पूर्ण कइलं,जेके आधुनिक भाषा में “भोजपुरी क्षेत्र”कहल जाला। हालांकि ग्रियर्सन,उदय नारायण तिवारी, डा०बुकान्न वगैरह बिहार स्थित भोजपुर नामक गाँव के नाम पर भोजपुरी भाषा क नामकरण स्वीकार कइले हं।भोजपुर गाँव, भोजपुर नगर अउर भोजपुरी राज्य के नामकरण क आधार इ सब विद्वान धारा नरेश राजा भोज के वंशकरन द्वारा आवर्त मान के भोजपुर नामक स्थान से भोजपुरी भाषा क पैदाइश मनले हं। भाषाई विश्लेषण से ज्ञात होला कि कउनो व्यक्ति के नाम पर कउनों क्षेत्र क भाषा क निर्माण नाहीं होला जइसे ब्रज, अवधी, बुन्देली अउर मागधी वगैरह। भाषा (बोली) क्षेत्र विशेष क प्रवृति इया राजनैतिक,सामाजिक,आर्थिक, अउर धार्मिक विशेषता के आधार पे जन्म लेला। क्षेत्र विशेष में प्रचलित लोक जीवन क दैनिक शाब्दी परम्परा में भुजिया,भोज,भोजन,भूजा,भड़भूज,भूजना,भात-भोज, भोजी,भोज्य,भोग,भूख आदि शब्दन से संकेत मिलेला कि जउन क्षेत्र में भुज से बनल शब्दन क दैनिक प्रयोग, वैदिक कालीन “भुंजिथा” शब्द से लेके आज ले होला त भूजा अउर भुजिया क प्रयोग करे वाले लोगन क भाषा के “भोजपुरी” कहल जा सकेला।आर्यभाषा परिवार में मौजूद सगरो प्रांतीय अउर क्षेत्रीय भाषा क मूल उत्स वैदिक भाषा में निहित बा। भोजपुरी भाषा क मुख्य श्रोत इया कहीं निकास त वैदिक ही ह। ईशोपनिषद में”भुंजीय”शब्द क मूल धातु “भुज”ह। जेमे भोजन, भोज्य(भोज),भुजिया, भूजा, भड़भूज आदि अनेक शब्दन क विकास जउन क्षेत्र में भइल वही भोजपुरी क्षेत्र कहल गइल।अपने आर्थिक हालात के दबाव से भुजिया भूजा क प्रयोग करे वाले लोगन क बोली भोजपुरी कहल गइल हो त कउनो ताजुब नाहीं।

भोजपुरी जाने समझे वालन क विस्तार दुनिया के सगरो महाद्वीप में बा। एकर कारन बरतानी हुकूमत के दौरान उत्तर भारत से गोरन द्वारा ले गइल गिरमिटिया मजदूर हँ, जेकर पूर्वज ओही जगहीं जहाँ उ गइल रहलं ठहरलं, वहीं रच बस गइलं ,उनकर वंशज ओही जगही आजू फूलत फलत बढ़त हं।एमन सूरीनाम, गुआना, त्रिनिदाद टोबैगो अउर फिजी ,मारीशस आदि देश प्रमुख हं। भारत क जनगणना (२००१)आंकड़ा के तईं भारतवर्ष में तकरीबन ३.३ करोड़ लोग से अधिक लोग भोजपुरी बोलेलं। सगरो दुनिया में भोजपुरी जाने बोले वालन क संख्या चार करोड़ से अधिक ह। हालांकि द टाइम्स आफ इण्डिया के एकगो लेख में इ बतावल गइल बाकि सगरो संसार में भोजपुरी बोले वालन क संख्या १६ करोड़ ह। “उत्तर अमेरिकी भोजपुरी संगठन”के अनुसार भोजपुरी बोले वालन क संख्या १८करोड़ ह। वर्तमान में सोचे विचारे वाले विचारक ४०करोड़ ले इ संख्या के ले जालं। बोले वालन के इ संख्या अनुमान क अंतर क वजह इ हो सकेला कि जनगणना के टाइम में लोगन द्वारा भोजपुरी के आपन मादरी जुबान न बतावल लिखावल गइहल हो। भोजपुरी प्राचीन समय में कैथी लिपि में लिखल जात रहल ,जउन आज लुप्तप्राय लिपि बा। आजु भोजपुरी क ग्राह्य लिपि देवनागरी लिपि ह।

कउनहू देश क लोकसाहित्य उ देश के जनता के हृदय क उद्गार होला। उ उनके हार्दिक भावना क सच्चा प्रतीक होला। अगर कउनो देश के सभ्यता क अध्ययन करे के हो त सबिके पहिले ओकरे लोक साहित्य क अध्ययन कइल जरुरी ह। लोकसाहित्य आडम्बर अउर बनावट से दूर रहेला। भोजपुरी लोकसाहित्य में लिखित कुछ भी नाहीं बा जेतना भी बा वाचिक, मौखिक रुप में बा। कबो कबो त एहू ना फरियाला कि एकर रचनाकार के ह? बकि पीढ़ियन क सफर तय करके भोजपुरी साहित्य आजहू जिन्दा बा। भोजपुरी साहित्य में पांडित्य ज्ञान अउर अहंकार क बिल्कुल अभाव मिली।। जउन मिली इंहा क सरलता, सहजता अउर निश्चलता मिली। जेकर दर्शन इहां होई उ अउरो कहीं नाहीं मिली। क्षेत्र विशेष के लोक में पले वाले लोक गीतन के नाम से ओकर नामकरण होला -जइसे बुन्देलखण्ड क बुन्देली लोकगीत, अवध क्षेत्र क अवधी, भोजपुर क्षेत्र क भोजपुरी लोकगीत वगैरह। भोजपुरी गीतन में चित्रित संसार क सम्बन्ध गांव से ह। भोजपुरी गीतन क प्राण तत्व ह रस। एक एक गीत रस से लबालब भरल मिली।

भोजपुरी क्षेत्र के स्थान भेद के अधारे पे भोजपुरी भाषा बोल क रुप सरुप में भी अन्तर मिलेला।एही बोलचाल व वाचिक अन्तर के नाते एके कई उपक्षेत्रीय नाम से भी जानल जाला। जइसे मल्ली, बनारसी, काशिका, छपरहिया, नगपुरिया, बक्सरिया, गोरखपुरी, मधेशी, सरबरिया, बंगरही वगैरह। जे तरह से अवधी के तुलसीदास, ब्रजभाषा के सुरदास, मैथिली के विद्यापति क सौभाग्य प्राप्त भइल बा वइसही भोजपुरी के गोरखनाथ अउर कबीर पे गर्व बा। कबीर पढ़ल लिखल नाहीं रहलन,त अपने मातृभाषा में रचना कइल उनके खातिर सहज सुभाविक रहल। भोजपुरी क सबसे पुरान नमूना कबीर के पदन में पाइल जाला। “कवनो ठगवा नगरिया लूटल हो,” “मायामहा ठगिनी हम जानी “,”मन न रंगायो रंगायो जोगी कपड़ा “आजो जन जन के जुबान पे बा। हजारी प्रसाद द्विवेदी भी भोजपुरी के ही कबीर क भाषा स्वीकरले हं।

गोरखनाथ तथा कबीर के परम्परा के आगे बढ़इले क कार अन्य संत कवि भी कइले हं। धरनीदास, भीमासाहब अउर लक्षमी सखी जइसन अनेक रचनाकारन क नाम इ लिहाज से लिहल जा सकेला जे आपन रचना भोजपुरी भाषा में कइले हं। गांव गिराव में सारंगी पे भक्त पूरनमल,राजा भरथरी क व्याख्यान आजो जोगियन के जुबान पे बा। “पूरनमल क खिसा सुनाइबो गाइके, सुनि ल ध्यान लगाइके ना “। भरथरी अउर गोपीचन्द जइसन अनेक रचना भोजपुरी क्षेत्र में आजो गावल जाला।अबके त नाहीं बकि पहिले क किसान संझिया के कत्तो बइठ के कथा कहानी कहत सुनत रहलं। गीत गवनही उनका लोग क चरित गा गा के किसान आपन जिनगी क अभाव के कष्ट के कुछ देर भुलाये क कोशिश करत रहलं। एह प्रकार कुल मिलाके इ स्पष्ट बाकि भोजपुरी साहित्य में एकरे रचयितन क “सर्वभूत हिताय अउर सर्व जन सुखाय” क भावना सकल मात्रा में पावल जाला। गोरखनाथ, रामानंद, रैदास, कबीर,अउर नाना प्रकार क राग रागिनियन में निबद्ध गीत भोजपुरी क ही रस ग्रहण कइके समृद्ध भइल बांटे। भारतेन्दु, प्रेमचंद, राहुल सांस्कृत्यायन, तेग अली, भिखारी ठाकुर, मोती बी०ए०,रामजियावन दास बावला जइसन लोग भोजपुरी भाषा अउर संस्कृति के एक नयी ऊंचाई देहले हं। त हम सब क भी फर्ज होला कि आपन मातृभाषा भोजपुरी के हम सब मिलिके सहेजीं। भोजपुरी क मिठास अउर लाठी में वीरता क प्रतिध्वनि गूंजे देईं– माथे पे पगड़ी हाथ में लट्ठ। तब देखीं भोजपुरिया क ठट्ठ।। अब आलेख क समापन हम कबीर के शब्दन में कइल चाहब – बोली हमरी पूरबही हमें लखे ना कोय। हमको तो वाही लखै जो धुर पूरब का होय।।

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”

गोरखपुर, (उ०प्र०) भारत

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