महामारी से कर्म स्थल पर बदलाव

सागर से मिले खातीर अपना उद्गम के स्थान से सागर की ओर बहत नदी के धारा के गति के कवनो बाधा रोके में कामयाब त होखबे ना करे । बाधा केतनो बड़ियार होखे उ आपन रास्ता खुदे बना लेले । हँ बाकी जवार भाटा के चलते नदी के बहाव के दिशा में परिवर्तन जरूर देखें के भेटाला। लेकिन समय के पहिया के गति के दिशा में बदलाव सम्भव नइखे। उ आगहीं मुहें बढेला , चाहे समय केतनो कटाह बा मुश्किल होखे, बीतेला जरूर।

देंखि ना हँसत बिहँसत सामान्य जीनिगी के कोरोना नाव के महामारी अइसन ना ध के दबवलस के धनी, गरीब, ज्ञानी, मूरख आम खास सभे के जिनगी के हिला दिहलस झंकझोर दिहलस। जीवन के आपन अलगे गणित होला ओहिजा दू आ दू के जोड़ हमेशा चार ना होखे । कबो अदमी के सामाजिक जीव के संज्ञा एह से दियात रहे कि उ समूह में रहत रहे आ सुख दुख के मिलजुल के काट लेत रहे लेकिन अब ओही पर पाबंदी बा । कोरोना त रोक टोक के अम्बार लगा के ध देले बा । हई करी हई मत करीं। छोटी चुकी वायरस में एतना ना शक्ति बा की अपना के तुर्रम ख़ाँ समझे वाला के भी अलग थलग निर्वासित जीनिगी जिये के मजबूर क देता। एस एम एस समाजिक दूरी,मास्क, सेनेटाइजर के अपना के ही एह बीमारी के रोकल जा सकत बा । वैक्सीन के नावा उम्मीद लउकत त बा । समय बताई कामयाबी के। कुल परिभाषा ही उलट पुलट हो गइल।

कबो पोजटिव भइल प्रंशसा आ सम्मान के कारण रहे आज ई शब्द दहशत के पर्यायवाची बनी के रह गइल बा। देश मे अइसन ना हावा चलल बा की हर पॉजीटिव अदमी बीमारे लागत बा। राम बचावं एह बेमारी से।

हमनीके जेकर रोजी रोजगार नौकरी बा ओहि से घर के चूल्हा जरेला आ समाजिक दायित्व के निर्वहन होला । कुल चिझन नीयन एहू में बदलाव के आँच लगले बा।

कार्यालय में सदेह उपस्थिति : देंखि ना पहिले केंहू सोंचलहुँ ना होखी के घरे बइठ के भी कार्यालय के काम काज हो सकत बा । हम त सपनो में ना सोचले रहनी। लेकिन जब कपारे परल त करहीं के परल । समय होखते घर के कोना ऑफिस बन गइल । शुरू हो गइल कामकाज । इंटरनेट ईमेल ज़ूम एप ,स्काइप एप,जइसन आधुनिक संचार के माध्यम अउरी कम्प्यूटर के माध्यम से काम के गति मिलल । ज़ूम स्काइप मीटिंग रूम के जगहा ले लिहलस सभे मीले बोले बतियावे आ आपन बिचार के आदान प्रदान करे लागल। जे एह बिद्या में कमजोर रहे नोकरी बचावे खातीर सीखे के परल। बॉस के आदेश अउरी देखरेख में काम होखे लागल। एगो नावा रास्ता भेटाइला काम करे के।

एच आरएडमीन के काम : पहिले जहां उपस्थिति बायोमेट्रिक तरीका से लिहल जात रहे ओकरा में बदलाव भइल । अब लॉगिन आधार बनल उपस्थिति दर्ज करावे के । एडमिन के ऑनलाइन एक्टिव यूजर के देखत रहे के काम भेटाइल । समय पर फाइल के निपटान हो जाव ओकरा खातीर रिमाइंडर के एगो नावा बिधि चालू भईल । कम्प्यूटर आ तकनीकी सहायता खातीर आईटी टीम के साथे एडमीन टीम भी मुस्तैद नजर आवे लागल।

कार्यशैली में बदलाव : पहीले जहाँ कागज के मौजूदगी के अहमियत दिहल जात रहे ओकर जगह लीहलस सॉफ्ट कॉपी । एहि से काम होखे लागल। स्कैन कॉपी मान्य हो गइल हर काम खातीर। चेक के जगह पर ऑनलाइन सीधे बैंक खाता में भुगतान के आवश्यक बनावल गइल । समय पर काम करे के नावा बिधि चालू भइल ।

लेकिन बदलाव त भइबे कइल कम्पनी के संचालन के खर्चा जइसे बिजली के बिल, लंच आ स्नैक्स के खर्चा, आवागमन आ यात्रा के खर्चा में भारी कमी आइल,ठेका पर काम करेवाला सहायक, सफाई कर्मी, ऑफिस ब्वाय, पेंट्री ब्वाय, कैंटीन सहायक अउरी रसोई में काम करे वाला के आपन रोजगार से हाँथ धोवे के परल । कैंटीन ब्यवस्था त आजो कायम नइखे हो पावल। कारखाना में काम बहुते बाधित भइल । स्थायी कर्मी के तनखाह त मिलल लेकिन इंसेटिव ओभर टाइम जइसन अतिरिक्त आय से मरहूम रहे के परल ।
ठेका पर भा दिहाड़ी मजदूरी करेवाला के त ढेलो ना भेटाइल।

अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ल रिक्सा ऑटो टैक्सी ड्राइवर कम्पनी के सामने खोमचा रेहड़ी लगावे वाला के रोजगार पर ताला लाग गइल । स्थायी आय ना रहला के चलते पइसा पइसा के मोहताज हो गइलन दिहाड़ी स्वरोजगार करेवाला लोग। उनकर दुख त अनदेखा आ अनसुना ही रह गइल। उनका ओर के धियान देव ? उ लोग केहू के गिनती में रहबे ना कइल।

अब लीक पर से हटल जीनिगी फिर से अपना पुरान जगह पर काबिज होखे खातीर जद्दोजहद में जुटल लउकत बा। अपना पर बा न बिसवास ? बिसवास जीवन में अहम भूमिका अदा करेला। लेकिन केकरा पर केतना ? करम करे में विचार करे में संगी साथी बनावे में बिसवास करे में बहुते सावधानी के जरूरत बा बन्धु। कदम कदम पर मकड़जाल लागल बा। लालच देके केंहू ऑनलाइन फ्रॉड करता त केंहू लूट खसोट जइसन नीच काम की ओर झुकता। जवन ठीक त हइये नइखे। जानकार लोग कहेला की अपना बुद्धि बिवेक पर भरोसा करीं जगत के मलिकार पर भरोसा करीं। जीवन पर धरम के अंकुश जरूर लगाई एह से हिया बुरा करम करे के रोकी पाप ब्यसन से दूर खींची। अनुचित काम मे ऊर्जा ना खराब होखी। राउर कुल्हिये करम मलिकार के नजर में बा, उनका से के छुपा सकता आ का छुपा सकता? समय बड़का मरहम ह बड़ से बड़ घाव के भरे के असीम क्षमता होला एकरा पास । दिन बदली फिर जीनिगी हँसी मुसकाई अउरी सरपट धउरी । बस बिश्वास से सत्कर्म करत रहला के काम बा।

 

तारकेश्वर राय ‘तारक’

तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

Related posts

Leave a Comment

16 + 9 =