स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति

इतिहास साक्षी बा आजादी के बादो राजभाषा हिन्दी के पूरा देश मन से सुविकार ना कइलस। हिन्दी के बढ़ावा देखे खातीर समय समय पर सरकार पखवाड़ा प्रोमोशन इनाम जइसन कदम उठावते रहेले। एकरा बावजूद देश के दक्षिणी हिस्सा एकरा के अपना पर बलजोरी थोपले मानेला आ गाहे बगाहे बिरोध के स्वर उठवते रहेला। अइसन माहौल में पश्चिम बंगाल के चुनावी सरगरमी के केंद्र में हिन्दी आ ओहसे जुड़ल मुद्दा बा, त ई संकेत बा बदलाव के। गैर हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी से जवन सौतिया डाह रहे ओमें कमी आ रहल बा भा ई कहीं चुनावी माहौल के असर बा त दिखावे के पुरजोर कोशिश चल रहल बा ।

हिन्दुस्तानी शब्द से राउर पहचान होखे त ई त हिन्दुस्तान में रहे वाला खातीर त गर्व आ फक्र के बात बा। लेकिन हर समय ई बात साँच ना होला ई बात हम अपना अनुभव से कह सकत बानी। पलायन भोजपुरिया समाज के नियति रहल बा। नथुनिया के लागल धक्का बलम गइले कलकत्ता जइसन गीत के बोल के साथ जवान भइनी जा। दसको पहिले रोजी रोटी के तलाश के ठीहा बंगाल ही रहे । राजनीतिक कारण से आज तनी कम हो गइल बा। आजो संख्या बल के मामिला में धनी बा गैर बांग्ला भाषा भाषी जमात पश्चिम बंगाल में।

बंगाल के स्थायी बासिन्दा के पहिचान भद्र लोग के रूप में ही होला हिन्दुस्तान में। लेकिन ई भद्रता सभकरा प्रति एक जइसन ना रहे विशेषकर गैर बांग्ला भाषी के प्रति। ई उ जरूर महसूस कइले होखी जे ओहिजा रहल बा। हम अपना जिनिगी के कई दसक बंगाल में गुजरले बानी अगर रवुरो समय गुजरले होखब भा गुजारत होखब बा त जरूर ह बात से सहमत होखब । उत्तरप्रदेश बिहार झारखंड भा गैर बांग्ला भाषी के पश्चिम बंगाल में “हिन्दुस्तानी” भा “मेड़ो” के नाम से ही बोलावल जाला, इहे उपाधि से विभूषित कइल जाला।

सिनेमा में आम जन के सोंच के ही छाप मिलेला । बांग्ला फ़िल्म में भी ई कथित हिन्दुस्तानी के दरबान, रेकसावाला, ठेलेवाला मन्दबुद्धि के रूप में ही देखावल जाला । बंगाली समाज मे मेहनतकश के रूप में ही पहचान बा यूपी बिहार के। कमतर देखावे के बंगाली समाज के अवचेतन मन के भावना मन दुखवा देला कथित हिन्दुस्तानी समाज के। अब ओही समाज के कल्याण के बात कइल, बतावता की कवनो स्वारथ त जरूर बा। लइको बता दिही,स्वार्थ बा वोट के।

देश के केंद्र में सत्ता रूढ़ दल जानता कि बंगाल में ओके सत्ता के सीढ़ी पर चढावे में गैर बांग्ला भाषा भाषी अहम भूमिका अदा करीहन। ओही से उनकर मुद्दा के चुनावी मुद्दा बना रहल बा, हिन्दी भाषी के महत्ता वाला दल ह त एमा कवनो आश्चर्य नइखे आश्चर्य एह बात पर हो रहल बा कि 2011 में माँ माटी मानुष के स्लोगन के साथे बर्तमान में सत्ता पर काबिज होखे वाला दल भी हिन्दी के फिकिर कर रहल बा हिन्दी भाषा भाषी के फिकिर कर रहल बा।

हिन्दी भाषी जमात के लुभावे खातीर “हिन्दी अकादमी” के स्थापना भइल। पार्टी में हिन्दी प्रकोष्ठ बनावल गइल,जवन हिन्दी भाषी के हित के धियान राखी आ समय समय पर आपन सुझाव सलाह दिही। जय हो राजनीति के।

केंद्र में सत्ता पर काबिज राजनीतिक दल के बंगाल में बढ़त वर्चस्व हिन्दी भाषी वोट बैंक के अहमियत के बढ़ा देले बा। एक बात त साफ़ झलकता की भाषा के महत्व तबे मिलेला जब एके बोलेवाला बतियावे वाला राजनीतिक आ आर्थिक रूप से बडियार होखे।

राजनीतिक दल अपना मन लुभावन वादा से पश्चिम बंगाल में हिन्दी भाषी मतदाता के खिंचे के पुरहर प्रयास में लागल बाड़न। तुलसी बाबा पहिलहीं लिख चुकल बान “सुर नर मुनि सब की यह रीति l स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।।” एहि बहाने कुछ फायदा हो जाव।

कहल मुश्किल बा ऊँट कवन करवट बइठी, हिन्दी भाषी जमात केकरा पर भरोसा करि कइसन भूमिका अदा करी ई त समय के साथ साफ होइ । लेकिन एतना त साफ बा कि रउवा कहीं रही कवनो भाषा बोली लेकिन पहिचान राउर जड़ ही बा । असलियत के छुपाई जिन फक्र करि गर्व से कहीं की हमार मातृभाषा अमुख ह। ना त पहिचान पर संकठे बुझी।

तारकेश्वर राय ‘तारक’

तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

Related posts

Leave a Comment

one + 9 =