राष्ट्र एकीकरण के चुनउती – ५: जूनागढ़ का एकीकरण

जूनागढ़जूनागढ़ का एकीकरण

अभी तक ले हमनी के देखनी जा कि कईसे लार्ड माउंटबेटेंन, सरदार पटेल अउरी वी.पी. मेनन के टीम पाहिले त्रावनकोर ओकरा बाद जोधपुर आ जैसलमेर के एकीकरण करे में सफल भईले जा। 15 अगस्त 1947 के देश के आजादी मिल गईल, लेकिन आजादी से बाद भी कुछ राज्य जईसे जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल आदि फैसला अभी तक ना हो पाईल रहे। एह कड़ी में मूल रूप से जूनागढ़(वर्तमान में गुजरात के स्वराष्ट्र वाला हिस्सा) के एकीकरण के कहानी के बारे में चर्चा होई

जूनागढ़ मूल रूप से गुजरात के दक्षिण में समुद्री तट के पास के एगो राज्य रहे। एकर पूरा इलाका भारत के बाउंड्री से मिलत रहे पाकिस्तान से कवनो प्रकार के जमीनी जुडाव ना रहे। खाली समुद्री जुडाव पोर्ट वेरावल से कराची तक रहे सबसे आश्चर्य वाला बात इ रहे कि ओहिजा के राजा मुस्लिम रहन अउरी प्रजा 1941 के जनगड़ना के हिसाब से 80% से ज्यादा हिन्दू रहे। चुकी एकरा पीछे कारण इ रहे कि सालन पाहिले लगभग चौदहवी शताब्दी में ओहिजा के राजा राजपूत ही रहले। लेकिन अहमदाबाद के सुल्तान मोहम्मद बेगडा आक्रमण करके जीत लेले रहन। लेकिन आजादी के तुरंत बाद के तत्कालीन नवाब रहले महाबत खान साहब। एह राजा के दू गो चीज में बहुत रूचि रहे| पहिला कुकुर में आ दूसरा गुजरती नृत्य में। नवाब महाबत खान साहेब कुकुर से बेपनाह मोहब्बत करत रहन। उनकर मोहब्बत के छोट झांकी एगो घटना से मिलेला जहाँ उ दू गो कुकुर के आपस में खूब धूमधाम से शादी कईले। इहे ना उ ओह शादी के ख़ुशी में सरकारी छुट्टी के भी एलान कईले रहले। ओह शादी में खूब धन दौलत भी लुटईले रहन।

अगर उ पाकिस्तान में मिले के मूड ना बनईते, एह सब चीज से केहू के गुरेज ना होईत। ना ही सरदार पटेल आ नहीं नेहरु के। लेकिन गलती उनका ले उहे भईल कि शाहनवाज भुट्टो(बेनजीर भुट्टो के बाबा) जईसन लोगन के छाप छोप कईला से उ पाकिस्तान के डोमिनियन में मिले के एलान कर दिहले। शाहनवाज भुट्टो ओह घरी मुस्लिम लीग के कराची के नेता रहन। साल के शुरुआत में ओहिजा के दीवान अब्दुल कादिर उनका के कराची से जूनागढ़ मंत्रालय के स्टेट काउंसिल ज्वाइन करे खातिर बोलईले रहन। हालाँकि साल के अप्रील महिना में जूनागढ़ के नवाब प्रेस के माध्यम से स्वतंत्र राज्य बनावे के एलान करके, भारत में विलीनीकरण करे वाला प्रश्न के पूर्ण विराम दे दिहले। आजादी के एक महिना पाहिले जुलाई महिना में जहाँ लार्ड माउंटबेटेन सारा लोगन के भाषण देले रहले, ओह में जूनागढ़ के तरफ से प्रतिनिधित्व नबी बक्श कईले रहले। नबी बक्श, दीवान अब्दुल कादिर के भाई अउरी नवाब के सैवाधानिक सलाहकार रहन।

नबी बक्श, लार्ड माउंट बेटे के साथ मुलाकात के समय खूब सवाल जवाब कईले रहले। भारत में विलीनीकरण के लेके माउंटबेटेंन द्वारा उनका के पूरा जवाब देवेल गईल रहे। उनकर इच्छा इहे रहे कि नवाब के सलाह देवल जाव कि उ स्वतंत्र राज्य के जगह भारत में विलीनीकरण करस। लेकिन कहानी में मोड़ तब आइल जब नवाब के दीवान अब्दुल कदीर स्वस्थ समस्या के निदान खातिर विदेश चली गईले। उनका विदेश गईला के वजह से दीवान के पद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के दादा शाहनवाज भुट्टो के हाथ आ गईल। पॉवर शाहनवाज भुट्टो के हाथ आईला के वजह से दू प्रभाव पडल। पहिला इ कि सलाहकार नबी बक्श के प्रभाव लगभग ना के बराबर हो गईल, जे जूनागढ़ के भारत में मिलावे चाहत रहे एकरा अलावा दूसरा प्रभाव इ पडल कि चुकी शाहनवाज भुट्टो के मुस्लिम लीग के नेता होखला के चलते नवाब के खून में मुस्लिम लीग के प्रति प्रेम रूपी आयरन दउड़े लागल एहिजे से नवाब के मूड पाकिस्तान में विलय करे के बने लागल। ओहिजा के लोकल क्षेत्र जईसन नवानगर अउरी धरंगढ़रा के महराजा के मदद से इ बात वी. पी. मेनन के कान में पडल कि एह लोग के नियत अब पाकिस्तान दने झुक रहल बा।

ओकरा तुरंत बाद इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेसन के एगो कॉपी उनका लगे भेजल गईल ताकी आप प्रतिक्रिया व्यक्त करस। आजादी के तीन दिन पाहिले तक यानी कि 12 अगस्त तक जब नवाब के तरफ से कवनो जवाब ना मिलल तब उनका के एगो रिमाइंडर मेसेज भेजाइल कि भारत में विलय करे के अंतिम तिथि 14 अगस्त बा। ओकरा पाहिले आप प्रतिक्रिया दे देस। 13 अगस्त के नवाब के नया दीवान शाहनवाज भुट्टो के तरफ से इ जवाब आइल कि मामला प अभी चर्चा हो रहल बा, निर्णय नइखे लिआइल। ओही दिन शाहनवाज भुट्टो कांफ्रेस बोलईले जहाँ हिन्दू नागरिक के हित खातिर एगो मेमोरेंडम, भुट्टो के सामने पेश करके भावी खतरा के बारे में आगाह कईल गईल। ओह मेमोरेंडम के सार इहे रहे कि भारत में विलय कईला में ही जूनागढ़ के भलाई बा। लेकिन एह मेमोरेंडम प शाहनवाज खिसिया गईले अउरी एगो निर्देश देले कि जनता के हाथ में कवनो पावर नइखे एह विषय प, राजा के लगे विलीनीकरण के लेके विशेषाधिकार बा। जहाँ उनकर इज्जाजत होई ओहिमे विलय होई।

एही गहमागहमी में ओकरा ठीक अगला दिन यानी भारत के आजादी के दिन 15 अगस्त के पाकिस्तान में विलय होखला के एलान कर दिहले। एह बात के पता सरकार के अख़बार के माध्यम से अगिला दिन लागल भारत सरकार खातिर इ सरप्राइज से कम ना रहे। जवन बात के डर रहे उहे हो गईल। जूनागढ़ जवना के आर्थिक अउरी प्रशासनिक इकाई भारत में समाहित रहे उ पाकिस्तान से जुड़े के एलान कर दिहलस। समाज में दंगा होखे के आशंका बढ़ गईल जवन एगो स्टेबल समाज रहे| हमार समझ से पाकिस्तान के कवनो ख़ास चाहत ना रहे जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलावे खातिर। जूनागढ़ के एगो मोहरा बनावल चाहत रहे जवना के बल प कश्मीर के अपना में मिला सको। एही चलते इ खेल जूनागढ़ में पाकिस्तान खेलत रहे। एकरा पीछे हम इहे तर्क देब कि जूनागढ़ के राजा मुस्लिम अउरी एहिजा के प्रजा बहुसंख्यक हिन्दू रहे। जबकी कश्मीर में एकरा ठीक उल्टा रहे। ओहिजा के राजा हरी सिंह हिन्दू रहले अउरी प्रजा बहुसंख्यक मुस्लिम। त एकदम फैक्ट बात रहे कि भारत जूनागढ़ के एह निर्णय प आप विरोध जरूर दर्ज करी।

ओह विरोध के पीछे भारत का कारण बताई? इहे नु कि जूनागढ़ के प्रजा हिन्दू बहुसंख्यक बा एह से जूनागढ़ के भारत में मिले के चाही। तब पाकिस्तान इहे कही कि ठीक बा तक एह थ्योरी के मुताबि मुस्लिम बहुसंख्यक प्रजा वाला कश्मीर पाकिस्तान के नु होखे के चाही। एही बात के कबो-कबो जनमत संग्रह वाला मामला प जे.एन.यु. के प्रोफेसर निवेदिता मेनन अपना भाषण में कहेली जवना बात के मीडिया द्वारा भी मिसइन्टरप्रेट करके चलावल जाला कि उ कश्मीर के पाकिस्तान के हिस्सा बतावेली। एही घटना के उ जिक्र करेली। खैर, एह मामला के लेके भारत पाकिस्तान के साथे बातचीत कईल चाहत रहे लेकिन पाकिस्तान के तरफ से कवनो जवाब ना मिलल। जूनागढ़ के एह फैसला प नेहरु, पटेल, मेनन अउरी माउंटबेटेन के बीच मीटिंग भईल जहाँ पटेल के साफ़ साफ़ कहनाम रहे कि अगर मिलिट्री एक्शन ना कईल गईल त एकर कीमत कश्मीर अउरी हैदराबाद में चुकावे के पड़ जाई। लेकिन माउंटबेटेन ना चाहत रहले। लेकिन पटेल माउंटबेटेन के एह बात खातिर मना लेले कि मिलिट्री एक्शन ना सही कम से कम नाकाबंदी अउरी चाक चौकसी त बढावले जा सकत बा। 

ओह मीटिंग में एगो अउरी बात तय कईल गईल कि मेनन जूनागढ़ जाके पूरा मामला के जायजा लिहे अउरी अंतिम प्रयास करिहे ताकी नवाब भारत में मिले के मन बना सकस। दिल्ली से जईसही उ राजकोट पहुचले, उनका के रिसीव करे वाला स्थानीय राजा एह बात से आगाह कर दिहले कि नवाब से भेट हो पावल मुश्किल बा। काहे कि उनका के कोई से मिले नइखे देवल जात। अगिला दिन जईसही मेनन, नवाब से मिले के कोशिश कईले ठीक उहे भईल। सबसे पाहिले उनकर मुलाकात दीवान शाहनवाज भुट्टो से भईल| बहाना बना दिहले कि उनकर तबियत पिछला दस दिन से नासाज बा कोई से नइखन मिल सकत। मेनन कहले कि कैबिनेट के तरफ से बहुत ही महत्वपूर्ण अउरी पर्सनल मेसेज बा खाली एह मिनट खातिर मिला दी। लेकिन उनकर त इच्छे ना रहे मिलावे खातिर। फिर बहाना बनईले कि उनकर तबियत अतना ख़राब बा कि एको मिनट खातिर नइखे मिलावल जा सकत।  

हालाँकि शाहनवाज झूठ एक जगहा अउरी बोलले रहल कि नवाब के सलाहकार नबी बक्श नवाब के पाकिस्तान के साथे मिले के सलाह देले रहले। जबकी वी.पी. मेनन पर्सनल मीटिंग करके एह बात से नबी बक्श से पूछले तब जवाब देले कि हम भारत में मिले खातिर कहले रही। जब बात के प्रूफ करे खातिर बात आगे बढ़ईले तब शाहनवाज भुट्टो इ कहके मना कर दिहले कि अब जूनागढ़ रियासत में काम ना करेले। तनी सोचे वाला इहो बात बा कि अगर उ पाकिस्तान में विलय के बात करते त काहे हटावल जईते? लेकिन वी.पी. मेनन लौटे से पाहिले दू गो छोट छोट राजान के भारत में विलय करवावे खातिर साइन ले चुकल रहन। एह से भईल का कि नवाब उत्तेजित होके ओह दुनो राजा लगे आपन फ़ौज भेजे के तईयारी करके लगले। एह सब के वजह से सरदार पटेल भी आपन फ़ौज भेजे के जब बात कईले तब फिर माउन्टबेटेंन नकारे लगलन। UN में जाए के सलाह देवे लगले। लेकिन फ़ौज से नाकाबंदी खातिर लार्ड माउंटबेटेंन के जरूर मना लेले रहन।

जईसे अगिला दिन एह बात से एलान भईल कि भारत जूनागढ़ में फौजी कार्यवाई करी तसही जूनागढ़ के नवाब सबकुछ छोड़-छाड़ के कुत्ता बीबी सहित कराची भाग गईले। बाच गईले शहनवाज भुट्टो उनका प पूरा राज्य के जिम्मेवारी आ गईल। पाकिस्तान से सैन्य मदद मंगले जरूर लेकिन जिन्ना के तरफ से कवनो मदद ना मिलला के वजह से उहो घुटना टेक दिहले अउरी भारत में विलीनीकरण खातिर राजी हो गईले। जईसे कि पहिलही कहले रही कि जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलावे के, पाकिस्तान के कवनो इंटरेस्ट ना रहे। अगर रहित त सैन्य मदद जरूर करीत। जूनागढ़ मोहरा रहे जवना से कश्मीर जीतल जा सको। एही क्रम में हैदराबाद के विलीनीकरण के चर्चा अगिला कड़ी में. 

 

 

 

 

गौरव सिंह

ब्लॉगर: Discovery of Dream India

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