बसंत माने प्रकृति के उत्सव

माघ सुदी पचिमी के हमनी सँ सब्द, नाद, सुर, लय, ताल, छंद, राग के धात्री, माता ब्रह्मचारिणी, शिवानुजा, हंसबाहिनी, प्रज्ञा प्रदायिनी, मइया सारदा भवानी के आहवान करेनी जा। आ एकरे संघे सुभागमन हो जाला “रितुपति राज बसंत के।”

बसंत के आवते पूरा चराचर चहक उठेला। बसंत के पहुँच हर जगे रहेला। माँ इड़ा के बीणा के तार के झंकार कन-कन में गुँजे लागेला। चाहे ब्रह्म नाद हो चाहे उमाशंकर के डमरू के नडह निनाद हो चाहे राधाकृस्न को मोहिनी मुरली के सुरली रव हो चाहे पवनसूत के जय सियाराम के जाप हो सभ से बासंतिक राग निकलेला जवन जनमानस में अध्यात्मिक ऊर्जा आ उष्मा के संचार करेला।

बसंत के बंदन आ अभिनंदन वेद , लोक , शास्त्र आ श्रुति सभ कइले बा। संस्कृत से लगाइत सभ भारतीय भाखा के साथे बिदेशी भाखा में। बसंत के बरनन मिलेला।

धानि रंग बधार फगे
पीत रंग कियरिया
हो बसंत अइले ना।
सजे सात रंग सजरिया
हो कि कंत अइले ना।

शास्त्र में बसंत के मधु माधव वैदिक महोत्सव कहलि गइल बा। येह आदि वाच्यन से ई बात स्पष्ट हो जात बा कि ‘बसंत’ इहलौकिक आ पारलौकिक, भौतिक आ अध्यात्मिक, सुहांतिक आ शृंगारिक ऋतु ह।

हमनी के भोजपुरिया लोक में बसंत के बारे में पुरुखा पुरनिया बहुते सरस, सिंगारिक आ भावुक बरनन कइले बारन। हेमंत के सीत-ठार से चराचर के पोरे पोरे कनकना के कठोर हो गइल बा। अंग-अंग अंगरत बा । डाढ़-पात बनरिया गइल बा। जलचर, नभचर, उभचर, सरिसृप सभ तरह के प्रानी पाला के मारे पटुआ गइल बारन। ऊर्जा के अथाह आ अक्षय भंडार सूर्यदेव के किरिन के जोति आ गरमी दुरलभ हो गइल बा।
येहि बीचे भगवान भास्कर दखिनायन से उत्तरायन होत बानी। उहाँ के उजस आ उमस कठुआइल जीवा जनावर के नवजीवन प्रदान करे आ जात बा। अब हिम के अंत हो गइल। धरनी, बननी, बसनी आ घरनी सभे के रूप, रंग, गात, बात, आस, हुलास बदलि गइल आने कि ‘ऋतुराज बसंत’ के आगमन हो गइल।

ठुठ बर में फुनगी फेके अँकुरे जर के अन्त।
आवे तब हिलोल करे पोरे पोरे बसंत।

बसंत दिक दिगंत में अनंत उल्लास भरे खातिर आवेला। अगहन पूख के ठार तुसार से कनकनाइल आ कठुआइल जीवा जनावर गाँछि बिरिछ के गतर- गतर फगुआये लागेला।

प्रकृति करे सिंगार
जग में जन्मे मार
पलना बने बयार
पुर में मनुहार फैलेला
जब बसंत आवेला।

बन में खिले पलास
तन में फगे हुलास
मन में उगे उजास
उर में परकास फैलेला
जब बसंत आवेला।

पिक करे गुँजार
हिय उठे हहकार
जिय जरे रतिजार
मीठ उदगार फैलेला
जब बसंत आवेला।

बसंत के के ना चाहल।

उमाशंकर सियाराम राधेकृष्णा अरिहंत।
साधु-सन्यासी बैरागी गृहस्थ चाहे संत।
राजा रंक परजा पंच गरीब धनी श्रीमंत।
रंगे सभे एकेरंग जब ई आवेला बसंत।

बसंत के चर्चा होखो आ “मदनोत्त्सव” के बाति ना होखो त बसंत अधूरा रहि जाई। बर, पीपर, पाकड़, किंशुक, कास सभ के टूसी हरियरा गइल बा। कली अब जुवान होके फूल हो गइल बाड़ी। पीयर सरसो गभिया गइल बा। लील रंग के अलसी के पुहुप गोलिया के कलसी बनत बा। मटर केराव बूँट में ढेढ़ी लागे सुरू हो गइल बा। गुलाब चंपा चमेली आ गुलदाऊदी के गोभा में मीठ मकरंद लसिआ गइल बा। अलि के झौंर फूलन के पराग चूसि के मतवाला हो गइल बा। कोइलर की कुहुकल आ पपीहा के पीउकल सुनि के बिरहन के सुध बुध खतम हो गइल बा। हियरा में हिरिस हुकुर हुकुर जरि रहलि बा। सजनी आपना साजन के बाट देख रहल बाड़ी। एहि बीचे हुताशिनी (फागुन अमवसा ) के साँझि बसंत के साथे कंत आ जात बारन। मन के टीस तन की हिरिस सभ होलिका के संघे जरि जात बा। साल संबत बदलि जाला। चइत के परिवा के दिन सभे फगुआ मनावेला।

रंग में उमंग में
तुर के तरंग में
अंग में अनंग में
बसेला बसंत।

लाल लाल लोल में
गोरी के कपोल में
हिया के हिलोल में
बसेला बंसत।

खेत से बधार तक
घर से दुआर तक
मौज से बहार तक
रसेला बसंत।

एड़ी से कपार तक
कटि से लिलार तक
गोरी के सेजार तक
बसेला बसंत।

लोक ललका ललाई में लवलीन हो जाला। चंग, मृदंग, मिरिचंग के थाप प वैदिक आ लोक दूनो सुर सरगम सजि जाला लोग नाचे गावे लागेला

यमुना तट, यमुना तट
यमुना तट स्याम खेलतु होरी

भर फागुन, भर फागुन
भर फागुन, बुढ़ऊ देवर लगिहें

बीतेला हेमत रितु आवेला बसंत
गोरिया गोहार करे कब अइहें कंत
जोगीरा सारा रा रा।

 

 

 

 

 

अमरेन्द्र कुमार सिंह

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