बसंत पंचमी

अभी कुछे दिन त भइल जब ठंडा के ठकुराहट ठोक-पिट पर उतारू रहे। एकरा चपेटा में सभे रहे, का मानुष पोस प्राणी जिया जन्तु चिड़िया चूरूग सभे। कान के जरी से लेके गोड़ के एड़ी तक के हिला के राख देत रहे ई ठंढा। का कहल जाव ठंढा आवते जइसे शरीर कर्फ्यू के चपेट में आ जाला। मजाल बा कि शरीर के कवनो अंग कपड़ा के बाहर तनी झांक लेवे। ताका झाँकी करते ठंडा के लाठी चार्ज शुरू। शीतलहर रूपी लाठी क अइसन प्रहार की नानी इयाद पड़ जाइ तुरन्ते। ठंढ बड़ बुजुर्ग बच्चा जवान सेयान सबके समान रूप से लठियावेले उ बात अलग बा प्रभाव केहु प कम भा बेसी पड़ेला।
गनीमत बा कि ठंढा तनी पतरा गइल बा, काहें ना पतराइ काहें की बसन्त न आ गइल बा। एकरा आवते मौसम में ना जेयादा सर्दी होला, न बेसी गर्मी अउरी न मौसम में ढेर नमी होला। एहीसे शायद वसंत ऋतु के ऋतुअन के राजा कहल जाला। सबके मन भावेला इ मौसम पुरनकी पतइ गिरवला के बाद फेड़ प नाया पतई लाग जाला आ रंग बिरंगा फूलन से भर जाले डहंगी, खेत में सरसों के फूल सोना नियन चमके लागेला त जौ अउरी गेहूँ के बाल बहत बयार में झूमे लागेला। आम मोजराये लागेला त महुवा सिरिजन के ताप से चुवे लागेला।  सुग्गा के झुण्ड फेड के आसे पासे मडराये लागेला।
प्रकृति के ई मनभावन रूप देवता पितर के भी खूबे भावेला उ भी एकर दीदार करे खातिर ललायित हो जालन। एहि चलते बसन्त पँचमी के दिने सरस्वती माई के जन्मदिन के रूप में गाँव गिरांव  से लेके शहर महानगर तक में मनावल जाला।
बसंत पंचमी के काहे होला सरस्वती पूजा
एकरा पाछे एगो कथा प्रचलित बा कि ब्रह्मा जी जब सृष्टि के रचलन त कुल्हिये निमन रहे बाकी कुछ कमी महसूस होखत रहे। अजीब खालीपन रहे। ओह खालीपन के मेटावे ख़ातिर ब्रह्मा जी सरस्वती माई के रचना कइलन, चतुर्भुज हांथे में बीणा आ किताब माला लिहले परगट भइली माई। जब माई बीणा के तार छेड़ली त एह धरा धाम के आवाज मिलल संगीत मिलल। हवा सन-सन त पानी कल-कल बहे लागल। चिड़िया चुरुंग के चहचहाहट मिलल। तब से उनकरा अवतार दिवस बसन्त पँचमी के सरस्वती पूजा के रूप में मनावे के परम्परा चालू भइल। इनकर पूजन के गौरवशाली परम्परा रहल बा हमनीके बघार में। पूजा आस्था त भोजपुरिया के सुभाव में बा। ज्ञान के देवी के पूजा में उ काहे केहु से कम रहो। मूर्ति स्थापना के साथे साथ बिधि बिधान से माई के पूजा करेला बिद्यार्थी कलाकार समस्त समाज हर उमिर के मरद मेहरारु लइका लईकी। हमनीके सांस्कृतिक बिरासत एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी तक पहुँच रहल बा।
शिक्षा के रूप में आमूल चूल परिवर्तन देखे के मिल रहल बा। हमनीके इहाँ पढ़ाई गियान ख़ातिर ना बलुक नोकरी ख़ातिर कइल जा रहल बा ताकि कड़की हिले आ लड़की मिले यानी नीक बियाह हो जाव। शिक्षा प्रणाली बदले भा सुधारे के दिशा में शासन के साँच परयास लउकत नइखे। किताबी गियान के बटोरे में लागल बा बर्तमान समाज। मानवीय गुण दिन प दिन बिसरावत चलल जाता समाज। किताबी गियान तनी कमें भेटाव त चल जाइ लेकिन मानवीय गुण के सीखल ढेर जरूरी बा त अंतिम में माई से ईहे अरदास रही कि हे माई रवुवा हमनीके अइसन गियान दिहिं की हमनीके बोल बचन बेवहार से केहु के दुख न पहुँचे आ हमनीके कर्म सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय होखे। देशहीत में साँच मन से हमनीके आपन करम के अंजाम दिहि सं ए माई।
तारकेश्वर राय
उप सम्पादक

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तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

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