बदलत परम्परा

ए जमुना? जमुना…. कहाँ बाड़े रे बचवा?

ई त बड़की माई के आवाज ह। आव बड़की माई आ जो… गोड़ धरतानी ये बड़की माई ।

अरे ! छोटकू तू कब अइलsह बचवा ? बाड़ न ठीक ठाक दुल्हिन आ बाल बच्चा के ना ले अइल हs ?

बड़की माई सभे आपन पढ़ाई लिखाई आ काम धन्धा में बाझल बा । अम्मा के तबियत खराब के समाचार मिलल ह देखे आ गइनी हs ।

बड़ा निमन कइल हs ये बचवा । भगवान जीव जाँगर बनवले राखँस… बड़की माई कहलस ।

जीजी साहब गोड़ धरतानी…. अम्मा कहलस

चल न परामपत घरे सुनली हं उनकर छोटकी लइकीयाके तलाक हो गइल बा, आइल बिया। चल मिली आवेके ।

रुंकि….. चलतानी… कहिके अम्मा हाँथ के काम ओरियावे चली गइल।

बड़की माई तोहन क त अस्सी बरिस के उमिर भइल पुरनिया भइली स, अब के लोग नावा बा हमनीके त केहरो के नइखीं जा ना पुरनका रीति रिवाज कुल्हिये छूटता ना नवका कुल्हिये मन भावता । ना एनिये की ना ओनिये के ।

उफर परो आजुकाल के रीति रिवाज। हमनीके एगो समय रहे । मेहरारून के दुनियाँ नइहर ससुरा ले बस फइलल रहे । नइहरो पग बहुरे में कई कई बरिस बित जात रहे । कार परोजन परले पर बेटी बहिन बोलावल जात रहली ना त मन के पत्थर कइके ससुरे में रहे के परत रहे । भाई बाप चाचा पीती से तीज खिचड़ी बा नेवता हकारी के रहता में भेंट हो जात रहे ।
ई रिवाज त ठीक नहीये रहे ये बड़की माई । लइकीयो के अंदर एगो जीव बा भावना बा पियार दुलार बा अपना नइहर ख़ातिर । ससुरइतीन होखते उ खून के रिश्ता खतम थोरे हो जाला ।

ई कुल पुरान बात हो गइली स बचवा । अब त एक गोड़ ससुरा रहता त एक गोड़ नइहर । ससुरा अब बाँचले कहाँ बा की एक गोड़ रही । ससुरा त उ होला जहाँ सास ससुर के राज रहेला । अब कहाँ कवनो लइका घरे रहता अपना नोकरी भा रोजी रोजगार के चलते उ बहरा रहता एहि चलते बियाह आ ककन छूटते लोग बाहर के राह ध लेता । शहर में उनकर उ आपन घर रहता ना सास ननद आ ना त देवर भसुर जेठान एकदम छुटा छड़गाँ । केहु टोके-टाके वाला ओहिजो त बा ना ।

समय के अभाव बा ये बड़की माई नोकरी प जाये के जल्दबाजी के कारण सास के आपन नवकी दुलहिन के सिखावे के मोका कहाँ भेटाता की उ ऊंच नीच समझाँवस । ईहे आजु के समय के माँग बा । एह हावा बयार के नतीजा का होता ? आज के पतोह, सास के घर मे नइखे रहत, आपन घर मे रहतिया । कुछ पतोह त नोकरी क के आपन पैर पर भी खाड़ बिया । नइहर के लोग के सोचे के नइखे परत बेटी के घरे आवे में । एहि मजमा के बीच रहला के कारण ससुरा के इयादो नइखे आवत ।
ठीक कहताल ये बचवा ई नावा जुग के हावा बा बहुते कुछ नीमन हो गइल । सुख सुविधा घरे घरे हो गइल । निक डाकडर बैद हो गइलन खड़बीडवा दवाई खत्मे हो गइल । खाये पिये पहिने के निक निक भेटाये लागल । लेकिन अब बात केहु के केहु सहत नइखे । छोटी छोटी बात पर बात के बतंगड़ बन जाता । सास ससुर अपना पतोह के बहुत कुछ कहल आ बतावल चाहतान बाकी ई पतोह त ओह लोग के कवनो मोका देते नइखी स । अब बुढ़ बूढ़ी के दूर बइठ के टूकुर-टुकुर ताकल मजबूरी बन गइल बा ।

सहनशक्ति के कमी तुनकमिजाजी आ तालमेल के कमी के चलते आज बहुते बियाह जइसन अटूट बन्धन भी टूट जाता । हर मामिला में लइकिये के दोष नइखे । कुछ निर्दयी हत्यार नशाखोर मानसिक रोगी भी बाड़न जेकरा साथे जीवन काटल आसान ना नामुमकिन बा ओइसन रिश्तन से मुक्ति जरूरी बा । लेकिन हर रिश्ता के मोका देवे के चाही बिशेषकर जब बाल बच्चा होखे त । ई कइगो जीनिगी के सवाल बा । हर रिश्ता जरुरी बा परिवार के खुशहाल राखे खातिर।

एतना कहि के बड़की माई अम्मा के संगे परामपत काका के घर की ओर चली देहलस। हमरा मन में कइगो सवाल तीना होके खाड़ होके के कोशिश में लागल रहँस।

तारकेश्वर राय ‘तारक’

तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

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