टूट गइल कंठी माला

ओह दिन एतवार रहे, आ हरमेशा खा-पीके आराम करत रहनी कि अचानके एगो फोन आईल। जब हम देखनी कि ई हमार एगो खास करीबी मने नाता के भतीजा के फोन बा त ओकर नंबर मोबाइल पर देखके हम ओकरा से बात करे के शुरू कइनी। हमनी चाचा-भतिजा में सर-समाचार भइल तले बात बतकही के बीचे ऊ कहलस कि “चाचा हम छठा महिना में बियाह करतानी”। ई सुनते हमार आंख कान आ मुंह खुलल के खुलल रह गइल। हमरा लागल कि हम कवनो सपना देखऽतानी का भाई? एह से हम पट से पहिले अपना के चिंउटी कटनी, जब हमरा लागल कि हम होश में बानी त हम फोन कान में सटवले सटवले बितल समय में पहुँच गइनी।
हमरा मन परे लागल कि एगो समय रहे कि ऊ हरमेशा कहे कि “चाचा हम बियाह-शादी के फेरा में ना नू परब। ई सब बेकार के झमेला हs, हम समाज सेवा करेब आ संत महात्मा बनेब”। ऊ आपना गरदन में हमेशा तुलसी आ कबो रूद्राक्ष के माला पहिरे। एतने ले ना ऊ कबो कबो ओशो महाराज के कथा कहानी भी सुनावे लागे। खैर ई त ओकर एगो पक्ष रहे दोसरा ओर ऊ एगो मांजल कलाकार भी रहे। जब ऊ बंसुरी के मुंह से सटा के आंख मुंद के बजावे लागे तs ओकरा के सुन के नीमन-नीमन लोग दांते अंगुरी कांटे लागे। जेतना सुन्नर ऊ बंसुरी बजावे ओतने सुन्नर ओकर चित्रकारी भी रहे। एकलेखां से देखल जावऽ त ऊ सर्बगुण संपन्न रहे। बाकिर का जाने काहे बियाह के बात पर ऊ भड़क जाव। अइसे ऊ हमरा से ऊमिर में त बड़ रहे बाकिर पितिया भइला के चलते हम ओकरा के बहुते समुझाईं। बाकिर हमरा समुझवला-बुझौवला के ओकरा पर इचिको फर्क ना पड़े, ऊ बियाह ना करे के बात से टस से मस ना होखे। ओकर एकेगो कहनाम रहे कि “हम सेवा भावना खातिर संत बनेब तs बनेब आ एह दुनियादारी में ना पड़ेब”।
हम ई कुल्ह अबहीं सोंचते रहनी तले हमार मलकिनी हमरा के हिला के कहली कि “केकरा से बतियावत बानी। ओने से हेलो-हेलो होता आ रउआ चुपचाप कान में फोन सटवले का सोंचत बानी”। मलकिनी के ई बात सुनके हमार धेयान टूटल आ हम कहनी कि “ना कुछो ना, ऊ कुछ मन पड़ गइल हs त ऊहे सोंचे लगनी हs”। फेरू हमहूं ऐने से हेलो कह के बतिआवे के शुरू कइनी आ कहनी कि “हं बबुआ बहुते नीक सोचल हs। जवानी में जोश में तऽ कुछ ना बुझाला बाकिर बुढ़ारी में बुझियो के आदमी का करी। बहुत नीमन बात बा। तोहरा माई के सेवा करेला एगो कनिया के आइल जरूरी रहल हs। चलऽ अबेरे से सही बाकिर नीमन सोचलऽ हs”।एकरा बाद ओकरा के छेड़त हम कहनी कि कहऽ “अब तs कंठी माला टूट गइल नूं। बिआह क के फेरू सधुअइबऽ ना नू”। ई सुनके हमार भतिजवा हंसे लागल आ कहलस कि “ना चाचा अब ऊ बात नइखे। हमरा त अब आपन घर-गृहस्थी बसावे ला बस तहरा लोग के आशिरवाद चाहीं”।

 

 

 

 

 

गणपति सिंह गीत
छपरा ,बिहार

Related posts

Leave a Comment

nineteen − five =