खेत बघार में हेतना मायूसी, काहे?

agriculture in India

हमनीके देश के पहचान गाँवन के देश के रूप में ही होला आ देश के अधिका आबादी के ठाँव आजो गाँवे बाटे । जिये खाये के साधन ह खेती भा ओकरा पर निर्भर रोजी रोजगार। खेती हमनीके ताकत ह अउर एह ताकत के बनवले रखला के काम बा। धीरे धीरे परिवार के बढ़ला से जोत के जमीन में कमी एगो कड़वा सच्चाई बा। गाँव के बैकल्पिक रोजगार के जरूरत बा। समूचा दुनियाँ में दूसरा नम्बर के खेती लायक जमीन बा हमनीके पास। कईगो फसल के उत्पादन में त हमनीके पहिला भा दूसरा पायदान पर खाड़ बानी जा लेकिन प्रति एकड़ उत्पादन के मामिला में चीन आ ब्राजील से अबहींयो पछहीं बानी जा। आजो अधिकतर खेती मानसूने पर निर्भर बा। उपज होइला के बादो वाजिब दाम ना मिलल एगो बड़ियार समस्या बा। कृषि ऋण तक आजो आम खेतिहर किसान के पहुँच नइखे। गाँवन के एगो अउरी हरित क्रांति के जरूरत बा ।

रोजगार के बैकल्पिक साधन के समय से विकसित ना होखले के चलते 60 फीसदी से अधिका खेतिहर चाहत बान की उनकर बाल बच्चा खेती जीन करस । पिछला दु दशक में तेज आर्थिक प्रगति भइल बा एकरा बावजूद अपना देश मे भूख आ कुपोषण के बोलबाला बा। बेमार हेमार भइला पर दवाई बीरो के पइसा भी ना रहे खेतिहर के लगे। पइसा बचावे के बात होला त भोजन कपड़ा में कटौती ही करे के परेला। सस्ता सुलभ चिकित्सा सुविधा गाँव गिरांव तक आज ले नइखे चहुँपल । कहेके त गाँवे गाँवे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बा आशा दीदी बाली जिला अस्पताल बा लेकिन खाली देखावे खातीर कुल्हिये सुविधा भ्रष्टाचार के बलिवेदी पर शहीद हो जाता। गरीब के भेटाता ठनठन गोपाल। चिकित्सा सुविधा सुलभ बा के अधिकतर दावा खाली कागजी बा । झोलाछाप के चाँदी बा । दिन पर दिन कर्जा के मकड़जाल में फँसत जाता खेतिहर मजूर।

खेती पर आश्रित जमात के भलाई खातीर सरकार नावा कृषि कानून लियाइल बिया। लेकिन किसान के डर बा की ई कानून से ओकर भला ना होई । एह कानून के विरोध में दिल्ली एनसीआर में देश के किसान करीब महीना दिन से धरना प्रदर्शन कर रहल बान । दिल्ली के हाड़ कपावे वाली ठंढी में भी किसान के संख्या दिन प्रतिदिन बढ़त ही जा रहल बा उ आर पार के लड़ाई के मूड में लउकता। उ चाहता कि कानून के संशोधन ना वापिस लिहल जाव।

किसान आंदोलन के लम्बा खींचे अउरी अधिका पसरे के दावा के बीच,सरकार से कई दौर की बातचीत फेल हो चुकल बा। है। सरकारो झुके के मूड में लउकत नइखे। किसान अड़ल बा की नावा कृषि कानून वापिस होखे के चाही।

नावा चीझ के अपनावल कठिने होला । अपना देश मे सुधार के विरोध कवनो नावा बात नइखे। लोकतंत्र अधिकार देला आपन बिरोध दर्ज करावे के लेकिन सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान क के ना। नावा बदलाव के विरोध त होखबे करेला। राजीव गाँधी सरकार जब देश मे कम्प्यूटरीकरण करे के विचार कइलस त देश मे खुबे बिरोध भइल बेरोजगारी के आशंका जतावल गइल इहे हाल जीएसटी के रहल । शुरुआत में कुछ परेशानी आइल, सरकार एकर ढांचा में परिवर्तन कइलस आ जब जइसन सुधार के जरूरत पड़ता सरकार ओकरा के करे खातीर तैयार बिया । दुनो के परिणाम सभकरा सोझा बा । बहुत सारा सुविधा उद्योग ब्यापार जगत के जीएसटी से मिल रहल बा । सबसे बड़हन सुविधा मालवाहक ट्रक के निर्बाध परिचालन हो रहल बा अउरी इंस्पेक्टर राज से निजात मिल गइल बा ।

पुरान अनुभव के देखत सरकार के नावा कृषि कानून के लेके किसान के मन मे जवन अविश्वास रहे ओके समय रहते दूर करे के जरुरत रहे जवना में सरकार बिफल रहल जेकर परिणाम स्वरूप देश किसान आंदोलन के रूप में दंश झेले के मजबूर बा ।

आजादी के सात दशक से अधिका हो गइल लेकिन आजो उपभोक्ता के दिहल कीमत के बीस फीसदी ही किसान के भेटाला बकिया बिचौलिया ढोवाई टैक्स आ खराब मौसम के खाता में चली जाला। ई हिस्सा कइसे बढ़ी मूल सवाल ई बा। किसान के हिस्सा बढ़े के बिरोधी उहे ताकत बा जेकर हिस्सा काट के किसान के मिली । उ कबो ना चाही की ओकर बखरा काट के किसान के दियाव । पँजाब के मंडी आढ़ति के यथास्थिति टुटल दुस्वप्न नीयन बा। ओहन लोग के वर्चस्व खत्म हो जाई। एहिसे उहे तबका एह आंदोलन के हवा दे रहल बा बिपक्ष त बटले बा। किसान के हित के बात क के ना जाने केतना लोग नेता बन गइल सत्ता पा गइल लेकिन किसान के हालात जस के तस बा । किसान के समझे के जरूरत बा की उनकर हित कवना चीज में बा । गाँव गरीब किसान के लेके जवन बहस राजनीति अउरी मीडिया में होखे के चाही उ त होत नइखे खाली आंदोलन के पक्ष बिपक्ष में भा कवन पार्टी आ नेता का कहलन एहि पर बहस जारी बा, किसान के असली हित के मामिला के कगरी हटा दिहल गइल बा।

बिहार झारखंड अउरी पंजाब हरियाणा के किसान के एक ही तराजू में नइखे तौलल जा सकत । सरकार के किसान सम्मान निधि योजना बिहार झारखंड के किसान खातीर उपयोगी बा लेकिन हरियाणा पंजाब के किसान खातीर केतना आकर्षक बा ? एकर आकलन के जरूरत बा।

किसान आंदोलन के जेतना जल्दी हो सके समाधान निकलल जरूरी बा । किसान के भी आपन अड़ियल रवैया छोड़ के समाधान की ओर हाँथ बढ़ावे के जरूरत बा । अड़ियल रुख से देश आ खेतिहर दुनो के नुकसान छोड़ फायदा ना होइ।

ई त निश्चित बा कि किसान आंदोलन जवने करवट बइठो अपना देश के खेती बारी से जुड़ल बुनियादी सवाल अपना जगह पर कायम रही एकरा में कवनो संशय नइखे, ओकरा में कवनो बदलाव के उम्मीद त हइये नइखे।

 

 

 

 

तारकेश्वर राय ‘तारक’

तारकेश्वर राय ‘तारक’

एगो बहुराष्ट्रीय संस्थान में प्रबन्धक के रूप में गुरूग्राम में कार्यरत। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला के सोनहरीया गाँव में जनम। लालन पालन शिक्षा दीक्षा महानगर में भइला के बादो गाँव गिरांव आ माटी से जुड़ल भोजपुरी रचनाकार।

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