एगो उमेद से भरल कहानी बा “शिकारा”

हिन्दी फिल्म सिनेमा शिकारा

भोजपुरी समय, मनोरंजन डेस्क: पछिला साल जब 5 अगस्त के जब भारत सरकार अपना हिस्सा के कश्मीर से अनुच्छेद-370 आ 35ए के हटवलस त एकरा संगहीं जम्मू कश्मीर के राजनीतिक समीकरण आ परिदृश्य भी बदल गइल।

हालाँकि इहो एगो सांच बा कि तब से लेके अबहीं ले जदि एगो दूगो छिटपुट घटना के छोड़ दिहल जाओ त कश्मीर शांत बा। अइसन में जब उहां के माहौल बदल रहल बा त जाहिर तौर पर ओजा के बारे में लोग के आ देश के में की तरह के धारणा भी बनत बिगड़त बा।

एही सभ के बीच जब कश्मीरी मूल के हिंदी सिनेमा के प्रख्यात फिलिम निर्माता विधु विनोद चोपड़ा के फिलिम ‘शिकारा’ के ट्रेलर आइल तऽ की लोग के बुझाइल कि कहीं निर्माता कश्मीरी मूल के भइला के कारण बाकि आउरी फ़िल्मकारन के लेखां एह विवाद के भंजावे के त प्रयास नइखन करत? बाकिर सिनेमा हॉल से ई सिनेमा देख के निकलला पर सभ कुछ साफ हो जाता।

कश्मीरी पंडितन के नांव पर दशकन से राजनीति चल रहल बा, बाकिर अबहीं तक एह लोगन के सुरक्षित घर वापसी नइखे भइल। 19 जनवरी 1990 के बाद कश्मीर से निकलल भा ई कहीं कि निकालल गइल कश्मीरी पंडित परिवारों में से अधिकांश अपने देश में शरणार्थियन के ज़िनगी जी रहल बाड़न। विधु विनोद चोपड़ा के फिलिम “शिकारा”अइसने दूगो शरनार्थियन शिव कुमार धर आ शांति धर के कहानी बा।

र्दा पर 100 मिनट..

फ़िल्म के प्लॉट में शिव आ शांति 1990 के पहिले के कश्मीरी युवा बाड़न। दुनु जने पंडित हउअन। शिव के पकिया संघाती एगो मुस्लिम लइका लतीफ बाड़न। लतीफ़ के अब्बा(बाबूजी) शिव खातिर भी अब्बा जइसन बाड़ें। जहां लतीफ़ एक ओर कश्मीर से रणजी ट्रॉफी खेलेले उंहई शिव पीएचडी कर रहल बाड़न आ ऊ शौकिया कविता भी लिखेलन। फिलिम में देखावल बा कि कश्मीर में ‘लव इन कश्मीर’ नामके फिलिम के शूटिंग चल रहल बा। एह शूटिंग में हीरो-हीरोइन के ऊपर फिलमावल जा रहल गाना के बैकड्रॉप में कश्मीरी युवा जोड़ी के गुजरत देखावे के बा। एही सीन के शूटिंग में पहिला बेर आ अनायासे  शिव आउर शांति के आपस में मुलाकात होला आ दुनू जने एक दुसरा के नियरा आ जाएले। ई नजदिकी दुनू जने के प्रेम आपसी प्रेम में बदल जाला आ दुनू जने बियाह के बन्हन में बन्हा जाले। इहां तक ई एगो सामान्य आ बहुते औसत कहानी लागेला, बाकिर एह कहानी में मोड़ तब आवेला जब शिव आ शांति के मोहल्ला में दूधवाला मोहल्ला में रहे वाला हाजी के मंशा शांति के सोझा बतावेला। एही जा से जवन हलटल के भूमिका बनेला ऊहे अगिला सै मिनिट ले पर्दा पर उतरल बा। बियाह के बाद से अपना नया घर में रह रहल शिव आ शांति के भी मोहल्ला में जरत घरन आ शहर के बिगड़त हालात के देख के बुझाए लागेला कि अब ओहू लोग के आपन घर छोड़ के पड़ी।

दुख आ दरद से भरल एगो प्रेम कहानी

ङ फिवलिम में देखावल गइल बा कि नायक नायिका के जवन घर बा “शिकारा” ओकरा नेंव में लतीफ के बाबूजी के लियावल पत्थर लागल बा। बाकिर बदलल हालात में शिव आ लतीफ़ के दोस्ती के नेंव हिल जाला। तलीफ़ शिव से कहेलन कि“हम तऽ अपना अब्बू के ना बचा पवनी , बाकिर तुं अपना बाबूजी के बचा लऽ ” एगो दोस्त के नाते लतीफ़ ई बात शिव के समुझावे ले। एह फिलिम में हमनी के सुने के मिलता कि लतीफ़ शिव के इंडिया चल जाए के सलाह देवऽतारे। ई फिलिम एही पृष्ठभूमि आ भूमिका में रचल एगो प्रेम कहानी बा। एह फिलिम में विधु चोपड़ा कश्मीर के इतिहास के बहुते संक्षेप में एगो मोंटाज के जरिए देखलवे बाड़न आ कहानी के  लेके आगा बढ़ गइलव बाड़न। एह फिलिम के देखला पर बुझाता कि एह में कश्मीर में आतंकवाद के पनपे आ उहां(कश्मीर) के हालात बिगड़े के बारे में निर्माता आ निर्देशक कवनो विस्तार में नइखन गइल।  1989-90 के कश्मीर में चल रहल उथल-पुथल के ऊ संक्षेप में देखवले बाड़न। एह फिलिम में पूरा संवेदना के संगे कश्मीरी पंडितन के घाटी छोड़के जाए के  चित्रण कइल गइल बा, बाकिर एह घटना के पाछा जवन नफ़रत बा तवना के एक ओर छोड़ दिहल गइल बा। एङ फिलिम में कतहूं आतंकवादियन के मुंह नइखे देखावल बस फिलिम में कुछ एक चलत-फिरत परछाईं मियर लउकता जवना के चलते लोग के आपन घर-दुवार छोड़के  जाए के मजबुर होखे के पड़ता।

मुंह पर दरद के चिचिरी

एह सभ से मजबुर आ लाचार कश्मीरी जरुर लउकतारे। एह लोगन के देख के एगो दर्शक के रुप में दुख त होता बाकिर मन में केहू के प्रति घृणा आ हिंसा के भाव नइखे आवत। चोपड़ा के एह बात के तऽ परशंसा करे के पड़ी कि पंडित लोग के पक्ष के कहानी कहत घरी मुस्लमान के दुश्मन आ खलनायक नइखन बनवले, जवन कि आउरी फिलिम अमूमन हो जाला। ऊ दोसरा तरफ के लतीफ़, हाजी आ जमीन- जायदाद के किने-बेचे वाला दलाल के मन भी सटीक संदर्भ में रखले बाड़े। अगर ई कहल जाओ कि फिलिम “शिकारा” शुद्ध रुप से एगो अइसन प्रेम कहानी बा जवना के पृष्ठभूमि में कश्मीर आ कश्मीरी पंडितन के घाटी से निकलल बा त तनिको गलती ना होखी। इतिहास के  किताबन में से निकलल दूगो पात्रन शिव आ शांति का जरिए हमनी के उनका माहौल आ अतीत से गुजरत समय आ तत्कालीन परिस्थितियन से मुलाकात होखेला।  शिव आ शांति के विस्थापन आ प्रवास के घटनवन से उपजल संच्चाई एगो कठेस रुप में रोक जाला। एही कठेस आ रोकल संच्चाई से संकुचात उनकरा व्यक्तित्व में जवन एगो दुख आ पीड़ा बा ऊ झलकत आ सुनाई दे रहल बा। हंसी-खुशी आ आनंद के बेरा भी एह दुनू पात्रन के चेहरा पर जवन दरद लउकता, इहे एह फिलिम के खुबसुरती बा। फिलिम में विधु विनोद चोपड़ा नायक-नायिका के तौर पर आदिल खान आ सादिया का रुप में दूगो नया कलाकारन के चुनले बाड़न , जवन कि दर्शक के फिलिम के दुनू किरदारन के आउर नजदीक ले जाए में सफल रहता, आ पूरा संजीदगी आ बारिकी से अपना अपना भूमिका के परदा पर उतारल एह दूनू पात्रन के आउर ज्यादा विश्वसनीय बना रहल बा। पात्रन के  दुख, दुविधा आ उनकर गतिशीलता के दुनू लोग बहुत बढियां तरीका से अपना भीतर उतरले बा लोग। फिलिम में आइल सहयोगी कलाकारन आ शरणार्थियन के भीड़ फिलिम के अस्थानीय रंग में रंगे में सफल भइल बा। अगर फिलिम के गीत संगीत के बात कइल जाव तऽ ई फिलिम के मोताबिक एकदम फिट बा। इरशाद कामिल के लिखल गीत आ नज्म़ किरदारन के परस्पर पेयार आ पीड़ा के भावपूर्ण शब्द दे रहल बा। अपना जड़-आ जमीन से कटल शरणार्थियन के जिनगी में देश में आइल पॉप कल्चर के असर आ ओकर एगो प्रतिकात्मक चित्रण बहुत बढिया ढंग से भइल बा।

एगो उमेद

फिलिम में एगो बियाह के सीन देखावल गइल बा जवना में आधुनिक संगीत सुना रहल बा जवन कि कश्मीरी रिवाजन के संगे कंट्रास्ट में बा। फिलिम के अंत में कश्मीर के कुछ मुसलमान लइकन के शिव के लगे उनका से मिले आइल देखावल बा, जवना में ओह लइकन में से एगो लइका जवन लीडर बा तवन शिव से कहऽता कि “ मास्टर जी हई कश्मीरी पंडी जी के नइखे देखले”। एहीजा फिलीम एगो उमेद आ दोस्ती के संगे खत्म होता, आ हमनी के एगो ई एहसास करावता कि शाएद शिव कश्मीर वापस लउट गइल बाड़न आ अब ऊंहा के लइकन के पढ़ावे के तइयारी कर रहल बाड़न।

राम प्रकाश तिवारी

सम्पादक, भोजपुरी समय

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One Thought to “एगो उमेद से भरल कहानी बा “शिकारा”

  1. राम

    बहुत शानदार समीक्षा

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